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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 984 में से

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पृष्ठ 524

द्वितीय तरंग ३८९ पाकोन्मुखशरच्छालीच्छन्नकेदारमण्डले । मासि भाद्रपदेऽकस्मात्पपात तुहिनं महत् ॥१८॥ महा अकाल : १८. भाद्रपद¹ मास में पकते हुए शरद् कालीन शालियुक्त क्षेत्र मण्डल में अकस्मात् महान् तुहिन पात हुआ ।

वाले ईसाई पर्यटकों ने उसका वर्णन किया है। उनके पढ़ने से रोंगटा खड़ा हो जाता है । श्री पिनोइस्ट डी गोइम् जो सम्राट् अकबर के निवेदन पर कश्मीर गये थे, वर्णन करते हैं : कश्मीर में इस अकाल के काल में हमने देखा कि बहुत सी माताएँ बे घर बार की हो गयी थीं । अपने बच्चों को कुछ खिलाने में असमर्थ हो कर उन्हें खुले ग्राम बाजारों में बेचने लगी थीं । बहुत से बालकों को पादरियों ने खरीद कर उनका बपतिस्मा कर उन्हें ईसाई बना लिया । एक मुसलमान अपना एक बच्चा बेचने के लिये लाया । पादरी ने बच्चे की माँ को कुछ धन देकर बच्चा इसलिए वापस कर दिया कि वह बड़े होने पर कश्मीर में ईसाई होकर नहीं रह सकता था । दूसरे दिन लड़के की माँ पुनः पादरी के यहाँ आई । उससे बोली कि बच्चा मरने ही वाला है । उसके घर चलकर उसका बपतिस्मा कर दिया जाय । पादरी कुछ पुर्तगालियों के साथ बच्चे के घर गया । उसके पिता की अनुमति लेकर उसका बपतिस्मा किया । मरने पर लड़के का पिता बच्चे का खतना करना चाहता था परन्तु पादरी ने खतना नहीं करने दिया और ईसाई धर्मानुसार उसे गाड़ दिया । इसी प्रकार कुछ द्रव्य लेकर एक दूसरी स्त्री अपने बच्चे का बपतिस्मा कराने के लिए ले आई । बच्चे का बपतिस्मा ज्यों ही समाप्त हुआ बच्चा मर गया । (अकबर एण्ड जिस्यूस्टा पृष्ठ ७८ ) आइने अकबरी—इस राजा के समय सूर्य जब सिंह राशि में था उस समय इतना हिमपात हुआ कि पूरी फसल नष्ट हो गई । उससे देश में भयंकर अकाल फैल गया ।

पाठभेद : श्लोक संख्या १८ मे 'च्छन्न' का 'छन्ने' तथा 'छत्रे' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १८ (१) भाद्रपद अकाल : काश्मीर का मुख्य अन्न शाली है । भारत में वर्षाकालीन फसल है। धान कई प्रकार के होते हैं । कोई साठ दिन में होता है और कोई भाद्र कार्तिक और अगहन मास तक तैयार होता है। शरद कालीन धान को भारत में अगहनिया धान कहते हैं । कश्मीर में भाद्रपद में शाली पुष्ट होने लगती है। वह पकने लगती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने को अच्छा माना जाता है । सितम्बर अक्टूबर में वह काट ली जाती है । काश्मीर के ग्रामीण क्षेत्रों में जाने का यह सबसे अच्छा समय है । फल भी हो जाते हैं । सेव, बबूगोशा अखरोट से वृक्ष लद जाते हैं । खेतों में सुवर्ण वर्ण शाली अत्यन्त सुहावनी लगती है । काश्मीर उपत्यका की मुख्य उपज शाली है । उष्ण तापमान ९४ डिगरी से ऊपर नहीं जाता । वर्ष में लगभग २६ इंच वर्षा होती है। उत्तर पूर्व का भाग उत्तर पश्चिम की अपेक्षा कम ऊँचा है । दस इंच से कम जहाँ वर्षा होती है, उसे इस समय खुश्क, दस से २५ इंच तक वर्षा वाले को खुश्कवार तथा २५ इंच से अधिक जहाँ वर्षा होती है उसे मरतूब कहते हैं । कश्मीर उपत्यका की जल वायु खुश्कवार प्रचलित कश्मीरी भाषा में कही जायगी । उसे मातदिल भी कह सकते हैं । सूर्य की रश्मि

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