राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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[बायाँ स्तम्भ] आवास रहता है। जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण में (४:२६:१) नरक का उल्लेख मिलता है 'मनो नरको वाङ्नरकः प्राणो नरकश्चक्षुर्नरका श्रोत्रं नरकस्त्वङ्नरको हस्तौ नरको गुदं नरकः शिश्नः नरकः पादौ नरकः' पुनः इसी ग्रन्थ में उल्लेख मिलता है (४:२५:६) 'दश पुरुये स्वर्गनरकाणि तान्येनं स्वर्गं गतानि स्वर्गं गमयन्ति नरकं गतानि, नरकं गमयन्ति' । विष्णु तथा भागवत पुराण में नरकों का विशद वर्णन मिलता है। भागवत पुराण (५:२६:५) नरक त्रिलोक में है। दक्षिण दिशा तथा पृथ्वी के नीचे किन्तु जल के ऊपर स्थित है। विष्णु पुराण नरकों की स्थिति जल एवं स्थल दोनों के नीचे मानता है। (२:६:१) नरकों की संख्या निश्चित नहीं है। विष्णु पुराण ७ नरको की कल्पना करता है। किन्तु भागवत में यह संख्या २८ तक पहुँच गयी है। प्रायश्चित स्वरूप यातनाओ के भोगने के स्थान नरक के २८ नाम है (१) तामिस्र (२) अंध तामिस (३) रौरव (४) महारौरव (५) कुंभीपाक (६) काल- सूत्र (७) असिपत्रवन (८) सूकरमुख (९) अंध कूप (१०) कृमि भोजन (११) संदंश (१२) तप्त सूरिम (१३) वज्रकंटक शाल्मली (१४) वैतरणी (१५) पूयोद (१६) प्राणरोध (१७) विशसन (१८) लाला- भक्ष (१९) सारमेयादन (२०) अवीचि (२१) अयः- पान (२२) क्षारकदम (२३) रक्षोगणभोजन (२४) शूलप्रोत (२५) दंदशूक (२६) अवनिरोधन (२७) पर्यावर्तन तथा (२८) सूचीमुख । सूर्यपुत्र यमराज नरक का शासन सूत्र चलाते हैं। मरणासन्न प्राणी को यम के दूत संयमनी पुरी में ले जाते हैं। चित्रगुप्त उनके पाप पुण्य का लेखा जोखा उपस्थित करते हैं। पुण्यात्माओं को उनके पुण्य फल भोगने के लिये स्वर्ग तथा पापियों को नरक में भेजते हैं ।
[दायाँ स्तम्भ] अपने कर्मों के अनुसार जिन्हें मुक्ति नहीं मिलती ये पुण्य का फल स्वर्ग तथा पाप का फल नरक में भोगकर पुनः पुण्य-पाप रूप कर्मों के साथ इस लोक में जन्म लेते हैं। यहूदी लोगों के नरक की कल्पना पुरातन बाइ- बिल में है। उसे 'शिउल' कहते हैं। वह मृतात्माओं का आवास है। ईसाई मान्यता के अनुसार मनुष्यों की रचना से पूर्व भगवान् ने स्वर्गदूतों की सृष्टि की थी। उन स्वर्गदूतों के एक वर्ग ने ईश्वर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। वे विद्रोही नरकगामी हुए। उनका नेता शैतान बन गया। इस नरक अर्थात् हेल में पापी मनुष्य भी पहुँच जाते हैं। मुसलमान लोग नरक को दोजख कहते हैं। यह शब्द जहन्नुम अरबी शब्द का पर्याय है। यह वह स्थान है जहाँ अग्नि धधकती रहती है। अल्लाह पर विश्वास न लाने वाले तथा उसके आदेश को न मानने वाले, दूसरे देवता की पूजा करने वाले दोजख में जाते हैं। दोजख में दण्ड भोगने के पश्चात् वे एराफ में भेज दिये जाते हैं। पारसी धर्म के नरक की कल्पना के अनुसार यह उत्तर दिशा में अत्यन्त शीतल स्थान है। उसे 'द्रजो देमन' ( द्रुजोश्मन ) कहते हैं। यह अत्यन्त दुर्गंध पूर्ण अन्धकारमय असह्य शीतल क्रन्दनपूर्ण है। (२) प्रकार: यहाँ कल्हण ने 'प्रकार' किंवा 'प्रकारो' शब्द का प्रयोग नरक के विशेषणरूप में किया है। 'प्रकार' का पाठभेद 'प्राकारो' भी मिलता है। श्रो स्टीन ने इसका अनुवाद नरक के एक प्रकार किंवा भेद के अर्थ में किया है। श्रो पण्डित ने प्रकार शब्द का अनुवाद 'स्ट्रोंग होल्ड अर्थात् दुर्ग' किया है। प्राकार का अर्थ नगर की रक्षा के लिये निर्मित परकोटा, चहार दिवारी अथवा शहर पनाह होता है। अनेक अनुवादकों ने इस का विभिन्न अर्थ किया है। मैंने मूल शब्द प्रकार ही रख दिया है। प्रकार शब्द हिन्दी में प्रचलित और बोधगम्य है।