भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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द्वितीय तरंग ३९३ पत्नीप्रीतिं सुतस्नेहं पितृदाक्षिण्यमातुरः । कुक्षिम्भरिः क्षुदुत्तप्तो विसस्माराखिलो जनः ॥२१॥ २१. कुक्षिम्भरि' एवं क्षुधातप्त निखिल आतुर जनों ने पत्नी-प्रेम, सुत-स्नेह तथा पितृ समादर को विस्मृत कर दिया था। क्षुत्तापाद् व्यस्मरल्लज्जामभिमानं कुलोन्नतिम् । अशनाहंक्रियाघ्रातो लोकोऽलक्ष्मोकटाञ्चितः ॥२२॥ २२. दारिद्र्य दृष्टि ग्रस्त एवं अशन हेतु ही क्रिया प्रवृत्त लोक, क्षुधा ताप से लज्जा, स्वाभिमान, एवं कुल गौरव को विस्मृत कर दिया था। क्षामं कण्ठगतप्राणं याचमानं सुतं पिता । पुत्रो वा पितरं त्यक्त्वा चकार स्वस्य पोषणम् ॥२३॥ २३. क्षाम' तथा कण्ठगत प्राण वाले याचना करते पुत्र को पिता ने, क्षामादियुक्त पिता को पुत्र ने त्याग कर, अपना ही पोषण किया। स्नाय्वस्थिशेषे वीभत्से स्वदेहेऽहंक्रियावताम् । अभूद्भोज्यार्थिनां युद्धं प्रेतानामिव देहिनाम् ॥२४॥ २४. स्नायु एवं अस्थि मात्रावशिष्ट वीभत्स स्वदेह निमित्त क्रिया करने वाले भोज्यार्थी प्राणियों का प्रेतों तुल्य युद्ध होता था। रूक्षाभिभाषी क्षुत्क्षामो घोरो दिक्ष्वक्षिणी क्षिपन् । एक एको जगज्जीवैरियेष स्वात्मपोषणम् ॥२५॥ २५. कटुभाषी, क्षुधा-क्षाम एवं भयंकर दिशाओं में दृष्टिपात करने वाला एक-एक व्यक्ति जगत् जीवों से आत्म पोषण की इच्छा करता था। तस्मिन्महाभये घोरे प्राणिनामतिदुस्सहे । ददृशे लोकनाथस्य तस्यैव करुणार्द्रता ॥२६॥ २६. प्राणियों के उस अति दुस्सह एवं घोर महाभय में केवल उसी लोकनाथ (राजा) की करुणार्द्रता देखी गयी। पादटिप्पणियाँ : मिलता है । २१ (१) कुक्षिम्भरि : उदर पूति की चिन्ता पादटिप्पणियाँ : मात्र जिनको रहती है, उनको कुक्षिम्भरि अर्थात् २३ (१) साम : अत्यन्त दुर्बल, भूख से कृश कुक्षि भरने वाला कहा जाता है । हुए, कंकाल मात्र प्राणियों के लिये क्षाम शब्द का पाठभेद : प्रयोग किया गया है । श्लोक संख्या २२ में 'स्मरत्' का 'व्यस्मरन् तथा पाठभेद : 'लोकोऽलद्मी' का पाठभेद 'लोको लदमो' मिलता है। श्लोक संख्या २६ में 'मतिदुःसहे' का पाठभेद : , श्लोक संख्या २३ में 'पुत्रो' का पाठभेद 'गुतो' 'मितिदुःसहे' मिलता है। ५०