भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 531

३९४ राजतरंगिणी निवारितप्रतीहारः स रत्नौषधिशोभिना । दर्शनेनैव दीनानामलक्ष्मीक्रममच्छिनत् ॥२७॥ २७. प्रतिहार¹ रहित उस राजा ने रत्नौषधि² के सदृश शोभायमान दर्शन मात्र से ही दीनों के दारिद्र्य कष्ट को दूर किया । सपत्नीको निजैः कोशैः संचयैर्मन्त्रिणामपि । क्रीतान्नः स दिवारात्रं प्राणिनः समजीवयत् ॥२८॥ २८. अपने तथा मन्त्रियों के भी संचित कोषों द्वारा अन्न खरीदने वाले सपत्नीक उस राजा ने रात-दिन प्राणियों को जीवित किया। अटवीषु श्मशानेषु रथ्यास्वावसथेषु च । क्षुत्क्षामः क्ष्माभुजा तेन नहि कश्चिदुपेक्ष्यत ॥२९॥ २९. अटवी में, श्मशान में, रथ्या में, गृह में, किसी भी क्षुत्क्षाम¹ की उस राजा ने उपेक्षा नहीं की । श्लोक संख्या २७ में 'शोभिना' का पाठभेद और औषधि, रत्न की ओषधि आदि अनुवाद किया 'शोभिनः' मिलता है। गया है। यह भ्रामक है। पादटिप्पणियाँ : रत्नौषधि आयुर्वेद के अनुसार पार्थिव औषधि २७ (१) प्रतिहार : इस शब्द का अर्थ द्वार- है। रत्न स्वतः औषधि होता है। ज्योतिष में ग्रहों पाल, दरबान तथा साथ चलने वाला भृत्य होता है। की दशा ठीक करने के लिये विभिन्न प्रकार के रत्नों यहाँ पर राजा की सज्जनता, सरलता, सहृदयता और को धारण करने की व्यवस्था की गयी है। इसी वह प्रजा पीड़ा से कितना दुःखी हो गया था, इसका प्रकार आयुर्वेद के अनुसार विभिन्न बीमारियों से उल्लेख कल्हण ने किया है। राजा बिना किसी के नीरोग होने के लिये रत्न पहनने का विधान किया साथ लिये, अकेला अपनी प्रजा के पास जाता था । गया है। मेरे एक मित्र को पथरी की बीमारी थी । उनके दुःख में दुःखी होता था। दारिद्र्य पीड़ित प्रजा, उन्हें दहाने फिरंग पहनने को कहा गया। उससे उसके दर्शन मात्र से सन्तोष प्राप्त करती थी । उन्हें अभूतपूर्व लाभ हुआ । यह स्मरण कराता है, महात्मा गान्धी की रत्नौषधि का कर्मकाण्ड में भी विधान है। नोआखाली तथा पूर्वीय बंगाल सन् १९४७ ई० की मकान की नींव तथा कूप के तल में, घट में रत्नों यात्रा का । महात्मा गान्धी एकाकी नाव पर, पैदल, को रखते हैं, उस पर मकान तथा कूप रचना करते विपद ग्रस्त ताड़ित जनता में विचरण करते थे । हैं। इस रत्न की संज्ञा ही रत्नौषधि दी गयी है । उस महान् विभूति को देखकर अनायास विपन्न पूर्व पाठभेद : बंगाल के हिन्दुओं में आत्मविश्वास तथा सन्तोष श्लोक संख्या २९ में 'दुपेक्ष्यत' का पाठभेद उत्पन्न हो जाता था। 'ह्रपेक्ष्यते', 'दुपेक्ष्यत' तथा 'दुपेक्ष्यते' मिलता है। (२) रत्नौषधि : अनुवादकों को रत्नौषधि के पादटिप्पणियाँ : सम्बन्ध में भ्रम हुआ है। रत्नरुपी ओषधि, रत्न २९ (१) क्षुत्क्षाम : क्षुधा से दुर्बल, क्षुधा से हतकाय अर्थ में इस शब्द का प्रयोग किया गया है।