राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ३९५ ततो निःशेषितधनः क्षीणानां वीक्ष्य मेदिनीम्। क्षपायामेकदा देवीमेवमृचे स दुःखितः॥३०॥ ३०. तदनन्तर धनहीन दुःखी उस राजा ने अन्न विहीन पृथ्वी को देखकर एक समय रात्रि में देवी¹ (पत्नी) से इस प्रकार कहा- देव्यस्मदपचारेण ध्रुवं केनाऽपि दुस्तरा। जाता निरपराधानां जनानां व्यापदीदृशी ॥३१॥ ३१. देवि ! निश्चय ही हमारे किसी दुस्तर दुष्कर्म के कारण निरपराध लोगों पर ऐसी विपत्ति आयी है। धिङ्मामधन्यं यस्याग्रे लोकोऽयं शोकपीडितः । पश्यन्नशरणामुर्वीमनुग्राह्यो विपद्यते ॥३२॥ ३२. मुझ अधन्य को धिक्कार है कि जिसके सम्मुख, शरण रहित, पृथ्वी को देखते हुए, अनुग्राह्य एवं शोक पीड़ित यह लोक विपत्ति ग्रस्त हो रहा है। प्रजा निश्शरणा एता अन्योन्यं बान्धवोज्झिताः । अरक्षतो भयेऽमुष्मिन् किं कार्यं जीवितेन मे ॥३३॥ ३३. परस्पर में बान्धवों को त्यागने वाली यह प्रजा शरण रहित हो रही है। इस महा- भय में रक्षा न करने वाले मेरे इस जीवन से क्या प्रयोजन ? यथाकथञ्चिल्लोकोऽयं दिनान्येतानि यत्नतः । मयाऽतिवाहितः सर्वो न च कोऽपि व्यपद्यत ॥३४॥ ३४. यथा कथञ्चित् इतने दिनों तक यत्न पूर्वक मैंने इस सर्वलोक की रक्षा की और कोई भी मृत नहीं हुआ । पाठभेद : श्लोक संख्या ३० में 'ततो' का 'अतो' तथा 'दुःखितः' का पाठभेद 'सुदुःखितः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३० (१) देवी : राजा ने रानी को आदर सूचक देवी शब्द का प्रयोग किया है। प्रकट होता है। उसकी रानी उत्तम चरित्र वाली विदुषी, तथा पति के कार्यों की सहायक थी। उचित सलाह देती थी। आपत्तिकाल में धैर्य दिलाती थी। आदर्श धर्मांगिनी थी। देवी का शब्दार्थ देवपत्नी, दुर्गा, सरस्वती, अग्रमहिषी, पटरानी, पूज्य एवं प्रतिष्ठित महिला होता है। पाठभेदः श्लोक संख्या ३१ में 'देव्यस्म' का पाठभेद 'देव्यस्स' मिलता है। श्लोक संख्या ३२ में 'लोकोऽयं' का पाठभेद 'लोकेयं' मिलता है। श्लोक संख्या ३३ में 'अरक्षतो' का पाठभेद 'अरक्षितो' तथा 'अरक्षिता' मिलता है। श्लोक संख्या ३४ में 'वाहितः सर्वो' का पाठभेद 'वाहिताः सर्वे' तथा 'वारिताः सर्वे' मिलता है।