भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

३९६ राजतरंगिणी अतिक्रान्तप्रभावेयं कालदौरात्म्यपीडिता । निष्किञ्चनाऽद्य संजाता पृथिवी गतगौरवा ॥३५॥ ३५. काल दौरात्म्य से पीड़ित तथा विगत प्रभाव वाली गौरव रहित यह पृथ्वी आज निष्किञ्चन हो गयी है । तदिमाः सर्वतो मग्ना दारुणे व्यसनार्णवे । उपायः कतमस्तावत्समुद्धर्तुं क्षमः प्रजाः ॥३६॥ ३६. अतएव चारों ओर से दारुण दुःख सागर में मग्न इस प्रजा का उद्धार करने में कौन सा यत्न समर्थ है ? निरालोको हि लोकोऽयं दुर्दिनग्रस्तभास्करः । कालरात्रिकुलैर्विष्वक्परीत इव वर्तते ॥३७॥ ३७. सूर्य के दुर्दिन ग्रस्त होने के कारण प्रकाश रहित यह लोक, कालरात्रि कुलों से सर्वतः मानो घिरा हुआ है । हिमसंघातदुर्लङ्घ्यक्षितिभृद्बद्धनिर्गमाः । बद्धद्वारकुलायस्थखगवद्विवशा जनाः ॥३८॥ ३८. हिम संघात के कारण दुर्लङ्घ्य पर्वत से रुद्ध मार्ग वाले लोग अवरुद्ध द्वार युक्त नीड में स्थित पक्षियों के सदृश विवश हो गये हैं। शूराश्च मतिमन्तश्च विद्यावन्तश्च जन्तवः । कालदौरात्म्यतः पश्य जाता निहतयोग्यताः ॥३९॥ ३९. 'देखो ! शूर, मतिमान् एवं विद्यायुक्त प्राणी काल कौटिल्य के कारण लुप्त योग्यता वाले हो गये हैं । आशाः काश्चनपुष्पकुड्मलकुलच्छन्ना न काः क्ष्मातले सौजन्यामृतवर्षिभिस्तिलकितं सेव्यैर्न किं मण्डलम् । पन्थानः सुचिरोपचाररुचिरैर्व्याप्ता न कैः संस्तुतै- स्तेषामत्र न सन्ति निह्नुतगुणाः कालेन ये मोहिताः ॥४०॥ ४०. इस पृथ्वी तलपर ऐसी कौन सी दिशाएं हैं जो स्वर्ण पुष्प कुड्मल समूह संकुल नहीं हैं ? सौजन्यरूपी अमृत की वृष्टि करने वाले स्वामियों से कौन सा मण्डल शोभित नहीं है ? चिर काल तक सेवा से शोभायमान एवं प्रशंसित किन लोगों से मार्ग पूर्ण नहीं हैं ? जो छिपे हुए गुण वाले एवं काल से मोहित हैं; उन लोगों का ही गुण अब यहां नहीं है ? श्लोक संख्या ३५ में 'संजाता' का पाठभेद श्लोक संख्या ३८ में 'हिमसंघातदुर्लङ्घ्य' का 'सम्पन्ना' मिलता है । 'हिमसंघातदुर्लभ' तथा 'जनाः' का पाठभेद 'जनः' श्लोक संख्या ३७ में 'विष्वक्' का पाठभेद मिलता है । 'विश्वक्' तथा 'विव्यक्ता' मिलता है । श्लोक संख्या ४० में 'काः' का 'कः'; 'सुचिरो-