राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ३९७ तदेष गलितोपायो जुहोमि ज्वलने तनुम् । न तु द्रष्टुं समर्थोऽस्मि प्रजानां नाशमीदृशम् ॥४१॥ ४१. अतएव साधन रहित मैं, शरीर की आहुति देता हूं । क्यों कि प्रजा का इस प्रकार नाश देखने में समर्थ नहीं हूं । धन्यास्ते पृथिवीपालाः सुखं ये निशि शेरते । पौरान्पुत्रानिव पुरः सर्वतो वीक्ष्य निर्वृतान् ॥४२॥ ४२. वे पृथिवीपाल धन्य हैं जो सर्व प्रकार से सुखी पुरजनों को पुत्रवत् सम्मुख देखकर सुख की नींद लेते हैं । सुख पूर्वक शयन करते हैं । इत्युक्त्वा करुणाविष्टो मुखमाच्छाद्य वाससा । निपत्य तल्पे निश्शब्दं रुरोद पृथिवीपतिः ॥४३॥ ४३. ऐसा कहकर, करुणाविष्ट, पृथिवीपति वस्त्र से मुख ढककर, तल्पपर गिर, निश्शब्द रोने लगा । निवातस्तिमितैर्दीपैरुद्ग्रीवैः कौतुकादिव । वीक्ष्यमाणाऽथ तं देवी जगाद जगतीभुजम् ॥४४॥ ४४. उत्थित ग्रीवा वाले निश्चल दीपों से मानों कौतुक वश देखी जाती हुई देवी, (रानी) तब उस पृथिवीपति से बोली— पचार' का 'प्रचुरोपचार'; 'स्तेषामत्र' का 'रेषा- अपना निवास स्थान छोड़कर उत्तरो भारत में आ मत्र' 'सन्ति' का 'वसन्ति' और 'ये' का पाठभेद 'ते' जाते थे । वहीं वे अपनी शक्ति, पौरुष एवं बुद्धि का मिलता है । परिचय देते थे । निवास करते थे । इस प्रकार का पादटिप्पणियाँ : उल्लेख पुनः कल्हण ने तरंग ८:२२२७ में किया है। ४० (१) अनुवादको ने अन्य प्रतियोको आधार पाठभेद : मानकर अनुवाद किया है अतएव अन्तिमपद का अनुवाद पाठभेद के कारण इस प्रकार होगा- श्लोक संख्या ४१ में 'गलितोपायो' का पाठभेद 'गलिताशयो' मिलता है । 'जिनका गुण छिपा है तथा जो काल से मोहित है, वही यहाँ निवास करते हैं ।' श्लोक संख्या ४३ में 'निश्शब्दं' का पाठभेद कल्हण ने इस श्लोक में शिक्षित, विद्वानों 'निश्शंकु' मिलता है । सुसंस्कृत एवं कलाविद् कश्मीरियो पर अकाल का श्लोक संख्या ४४में 'निवात' का 'निर्वातः' तथा क्या प्रभाव पड़ा था, वर्णन करता है । त्रस्त काश्मीरी 'भुजम्' का 'पतिम्' पाठभेद मिलता है ।