भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ३३ ] ६ : २५, ३३६, ३४३, ८ : ५१, ११०, ६०९, ७०७, ७६८, ८८८, ९३९, २२२४, २७३३, २७३९) किन्तु कल्हण ने पुण्यात्माओं द्वारा किये गये प्रायोपवेशन में श्रद्धा प्रकट की है । (रा० ४ : ६३२; ८ : २२४२) मन्त्रि परिषद : काश्मीर की तीसरी प्राचीन मन्त्रि परिषद थी । यह संस्था का महाभारत काल से कोटारानी (सन् १३३६ ई०) तक कायम थी । यह संस्था पुरोहित परिषद से भी पुरातन थी । कम से कम ४ सहस्र वर्षों से इसका अविच्छिन्न अस्तित्व मिलता है । मन्त्रि परिषद एवं द्विज तथा पुरोहित परिषदों में कौन विशेष शक्तिशाली था यह कहना कठिन है । दोनों ने ही समय समय पर राजाओं को चुनकर सिंहा- पर बैठाया और उतारा है । मन्त्रि परिषद का क्षेत्र राजनीतिक था । परन्तु द्विज एवं पुरोहित परिषद का क्षेत्र धार्मिक एवं राज- नीतिक समयानुसार हो जाता था । मन्त्रि परिषद की शक्ति राजबल था । पुरोहित एवं द्विज परिषद की शक्ति उनका आध्यात्मिक बल काश्मीरी जनता की धर्मभीरुता थी । अतएव द्विज एवं पुरोहित परिषद की शक्ति कालानुसार श्रेष्ठ मानी गयी थी । मन्त्रि परिषद भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख रानी यशोवती के सन्दर्भ में उपस्थित थी । बाल गोनन्द द्वितीय के समय राजा के नाम से मन्त्रि परिषद शासन करती थी । वह उस समय सर्व सत्ता सम्पन्न थी । (रा० १ : ७८-८१) काश्मीर की मंत्रि परिषद विश्व की सबसे प्राचीन और सबसे अधिक लम्बे जीवन काल की संस्था थी । इसकी धारा कभी सूखी नहीं थी । छिन्न नहीं हुई थी । राजाओं के अभाव एवं अस्तित्व दोनों कालों में यह संस्था अबाध गति से अपना काम करती रही है । मन्त्रि परिषद इतनी शक्तिशाली थी कि सेना से राजभवन तक घेर लेती थी । (रा० १ : ३६६, ३६७) राजा को वन्दी बनाती थी (रा० २ : ४); राजा को पदच्युत कर दूसरे को राजा बनाती थी (रा० २ : ५) । काश्मीर की मन्त्रि परिषद की ख्याति बाहर भी थी । राजा विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को राजा बनाने का आदेश मन्त्रिपरिषद को ही दिया था । ( रा० ३ : २२४, २३५) मन्त्रियों ने मेघवाहन को काश्मीर का राज्य सिंहासन ग्रहण करने लिये कहा था । (रा० २ : १५१) राजा दुर्लभ वर्धन को मन्त्रियों ने राजा मनोनीत किया था । (रा० ३ : ५२८) काश्मीर में जनता, मन्त्रि परिषद, पुरोहित एवं द्विज परिषद ने अनेक अवसरों पर बिना एक दूसरे की सलाह लिये स्वयं अपने निर्णय से राजा चुना है । अभिषेक : राजतरंगिणी से हमें काश्मीर के इतिहास में अभिषेक प्रणाली के प्रचलन के कई महत्व- पूर्ण एवं अनोखे उल्लेख मिलते हैं । यह द्विजों, पौर जनों तथा मन्त्रियों द्वारा समयानुसार होता रहा है । भगवान् श्रीकृष्ण ने द्विजों द्वारा रानी यशोवती का अभिषेक कराया था । ( रा० १ : ७० ) राजा गोनन्द द्वितीय का अभिषेक द्विजेन्द्रों ने किया था । ( रा० १ : ७५ ) राजा सन्धिमति का अभिषेक द्विजों ने किया था । ( रा० २ : ११७ ) राजा वक का अभिषेक पौर जनों ने किया था । ( रा० १ : ३२५ ) मातृ गुप्त का अभिषेक प्रकृति अर्थात् प्रजा ने किया था । (रा० ३ : २३९) राज्याभिषेक की प्रक्रिया शास्त्रानुसार होती थी । राजा की मूर्धा पर कनक घट से तीर्थों का जल ढाला जाता था । उसके पश्चात् अन्य औपचारिक क्रियायें होती थी । ( रा० ३ : ५२८ ) ५