राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
[ ३३ ] ६ : २५, ३३६, ३४३, ८ : ५१, ११०, ६०९, ७०७, ७६८, ८८८, ९३९, २२२४, २७३३, २७३९) किन्तु कल्हण ने पुण्यात्माओं द्वारा किये गये प्रायोपवेशन में श्रद्धा प्रकट की है । (रा० ४ : ६३२; ८ : २२४२) मन्त्रि परिषद : काश्मीर की तीसरी प्राचीन मन्त्रि परिषद थी । यह संस्था का महाभारत काल से कोटारानी (सन् १३३६ ई०) तक कायम थी । यह संस्था पुरोहित परिषद से भी पुरातन थी । कम से कम ४ सहस्र वर्षों से इसका अविच्छिन्न अस्तित्व मिलता है । मन्त्रि परिषद एवं द्विज तथा पुरोहित परिषदों में कौन विशेष शक्तिशाली था यह कहना कठिन है । दोनों ने ही समय समय पर राजाओं को चुनकर सिंहा- पर बैठाया और उतारा है । मन्त्रि परिषद का क्षेत्र राजनीतिक था । परन्तु द्विज एवं पुरोहित परिषद का क्षेत्र धार्मिक एवं राज- नीतिक समयानुसार हो जाता था । मन्त्रि परिषद की शक्ति राजबल था । पुरोहित एवं द्विज परिषद की शक्ति उनका आध्यात्मिक बल काश्मीरी जनता की धर्मभीरुता थी । अतएव द्विज एवं पुरोहित परिषद की शक्ति कालानुसार श्रेष्ठ मानी गयी थी । मन्त्रि परिषद भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख रानी यशोवती के सन्दर्भ में उपस्थित थी । बाल गोनन्द द्वितीय के समय राजा के नाम से मन्त्रि परिषद शासन करती थी । वह उस समय सर्व सत्ता सम्पन्न थी । (रा० १ : ७८-८१) काश्मीर की मंत्रि परिषद विश्व की सबसे प्राचीन और सबसे अधिक लम्बे जीवन काल की संस्था थी । इसकी धारा कभी सूखी नहीं थी । छिन्न नहीं हुई थी । राजाओं के अभाव एवं अस्तित्व दोनों कालों में यह संस्था अबाध गति से अपना काम करती रही है । मन्त्रि परिषद इतनी शक्तिशाली थी कि सेना से राजभवन तक घेर लेती थी । (रा० १ : ३६६, ३६७) राजा को वन्दी बनाती थी (रा० २ : ४); राजा को पदच्युत कर दूसरे को राजा बनाती थी (रा० २ : ५) । काश्मीर की मन्त्रि परिषद की ख्याति बाहर भी थी । राजा विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को राजा बनाने का आदेश मन्त्रिपरिषद को ही दिया था । ( रा० ३ : २२४, २३५) मन्त्रियों ने मेघवाहन को काश्मीर का राज्य सिंहासन ग्रहण करने लिये कहा था । (रा० २ : १५१) राजा दुर्लभ वर्धन को मन्त्रियों ने राजा मनोनीत किया था । (रा० ३ : ५२८) काश्मीर में जनता, मन्त्रि परिषद, पुरोहित एवं द्विज परिषद ने अनेक अवसरों पर बिना एक दूसरे की सलाह लिये स्वयं अपने निर्णय से राजा चुना है । अभिषेक : राजतरंगिणी से हमें काश्मीर के इतिहास में अभिषेक प्रणाली के प्रचलन के कई महत्व- पूर्ण एवं अनोखे उल्लेख मिलते हैं । यह द्विजों, पौर जनों तथा मन्त्रियों द्वारा समयानुसार होता रहा है । भगवान् श्रीकृष्ण ने द्विजों द्वारा रानी यशोवती का अभिषेक कराया था । ( रा० १ : ७० ) राजा गोनन्द द्वितीय का अभिषेक द्विजेन्द्रों ने किया था । ( रा० १ : ७५ ) राजा सन्धिमति का अभिषेक द्विजों ने किया था । ( रा० २ : ११७ ) राजा वक का अभिषेक पौर जनों ने किया था । ( रा० १ : ३२५ ) मातृ गुप्त का अभिषेक प्रकृति अर्थात् प्रजा ने किया था । (रा० ३ : २३९) राज्याभिषेक की प्रक्रिया शास्त्रानुसार होती थी । राजा की मूर्धा पर कनक घट से तीर्थों का जल ढाला जाता था । उसके पश्चात् अन्य औपचारिक क्रियायें होती थी । ( रा० ३ : ५२८ ) ५
[ ३४ ] सभा : काश्मीर में सभा थी । उसके सदस्यों को सभ्य कहा जाता था । ( रा० ३ : १५८ ) सभा का सर्वप्रथम उल्लेख सन्धिमति के समय में मिलता है । ( रा० २ : १२७ ) सन्धिमति राज्य त्याग करने लगा तो उसने सभा एकत्रित की । उसने काश्मीर का राज्य सभा को लौटा कर वनगमन किया । ( रा० २ : १५९ ) कल्हण ने विक्रमादित्य की सभा का उल्लेख मातृगुप्त के प्रसंग में किया है । ( रा० ३ : १३९, १४६ ) मातृगुप्त के प्रसंग में ही कल्हण ने सभा का पुनः उल्लेख किया है । ( रा० ३ : २०४ ) सभा का सभापति होता था । जयापीड की सभा का सभापति भट्टोद्भट था । ( रा० ४ : ४९५ ) सभा में संगीत भी होता था । ( रा० ५ : ३६१ ) काश्मीर की सभा का कार्य क्या था इस पर कल्हण प्रकाश नहीं डालता । शासन पद्धति पर भी कल्हण प्रकाश डालता है । राजा जलोक के पूर्व अन्य राज्यों के समान काश्मीर में व्यवस्था थी । ( रा० १ : ११८ ) राज्य की सप्त प्रकृतियां थीं । ( रा० १ : ११९ ) जलौक ने शासन पद्धति में सुधार किया । उसने महाराज युधिष्ठिर के राज्य में महाभारत के समय की प्रचलित शासन व्यवस्था काश्मीर में चलायी । ( रा० १ : १२० ) दण्ड प्रथा प्रचलित थी । कारागार होते थे । उन्हें कारा वेश्म कहा गया है । राजा युधिष्ठिर दुर्गा गलिका में बन्दी बनाकर रखा गया था । ( रा० २ : ७४ ) राजा हिरण्य ने अपने भ्राता तोरमाण को बन्धन में रख दिया था । ( रा० ३ : १०४ ) शूल देने की प्रथा थी । श्मशान में शूली दी जाती थी । ( रा० २ : ७९ ) समाज में क्रूरता भी होती थी । किन्तु यह अच्छा नहीं समझा जाता था । क्रूरता की कल्हण ने घोर निन्दा की है । क्रूरता के स्थान पर, उदारता, सहिष्णुता, दान, क्षमादि उदात्त गुणों की प्रशंसा की गयी है । न्याय पर कल्हण अत्यधिक बल देता है । उसने स्वयं लिखा है कि तरंगिणी की रचना उसने एक स्थेय किंवा न्यायकर्ता तुल्य सब बातों को तोलकर एक निष्कर्ष पर पहुँचकर लेखनी उठायी है । कल्हण शान्ति प्रिय था । शान्त रस को प्राथमिकता दी है । उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा अबाध्य गति से प्रवाहित मिलती है । समाज : कल्हण ने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया है । उसने अपने समय के नर- नारियों के आहार-विहार, आमोद-प्रमोद, पान-पान, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, संस्कार-कुसंस्कार, अन्ध विश्वास, परम्परा, रूढियां उनकी जड़ता, नैतिक चरित्र, सबको एक मनोवैज्ञानिक के समान काव्यमयी भाषा में उपस्थित किया है । नर-नारियों की धार्मिक एवं कामुक प्रवृत्तियो और तज्जन्य समस्याओ के निराकरण का मौलिक हल भी स्थान-स्थान पर दिया है । ग्रामीणों तथा नागरिकों के व्यंग-विनोद, हास- परिहास के वर्णन में उसकी काव्य कला अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पर पहुँच जाती है । इस प्रकार वह प्रमाणित करता है कि वह कवि प्रथम तत्पश्चात् इतिहासकार था । कल्हण लेखन-कला में परिपक्व बुद्धि का प्रौढ व्यक्ति था । युवक लेखक कल्पना सागर में तैरने का अधिक प्रयास करता है । कल्हण ने घटना सागर में गोता लगाकर एक प्रौढ सन्तुलित व्यक्ति के समान रत्नों को निकालकर घटनाओं को क्रमबद्ध किया है । अत्याचार, अनाचार, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, गृहसंघर्ष, अराजकता आदि कटु किन्तु वास्तविक घटनाओं के मध्य गुजरने के कारण उसका उर्वर मस्तिष्क राज- तरंगिणी जैसे काव्य को प्रस्तुत करने के लिए परिपक्व हो गया था । उसने अपने समय की अनुभूतियों को गाथा में पिरो दिया है ।
[ ३५ ] कल्हण ने तत्कालीन समाज का वर्णन करते हुए समाज की आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला है । टंकणित मुद्रा, दीनार, कर-प्रणाली, करों का नाम, राजस्व, कृषि, उद्योग-धन्धा, वाणिज्य, व्यवसाय, के वर्णनों के साथ अकाल, उपल वृष्टि, तुहिनपात, उनका काश्मीर के समाज पर पड़ते प्रभाव का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है । कल्हण ने उत्सवों, यात्राओं, परम्पराओं आदि का संक्षिप्त वर्णन किया है । समाज में पुराण पाठ, कविता पाठ एवं नाटक होते थे । नट, चारण, ( रा० १ : २२२ ) कुम्भदास ( पानी भरने वाले ) ( रा० ३ : ४५६ ) मुण्ड ( रा० १ : २३६ ) शय्यपाल ( रा० १ : २३२ ) मान्त्रिक ( रा० १ : २३४ ) नैष्ठिक ( रा० १ : २३६ ) कंचुकी ( रा० १ : २९५ ) चर ( रा० १ : २५० ) गुप्तचर ( रा० ३ : १५६ ) विज्ञदूत ( रा० ३ : १५६ ) भृत्य ( रा० १ : २४७ ) धात्री, ( रा० १ : ७७ ) कुम्भकार, यामिक ( रा० ३ : १७३ ) दूत (रा० ३ . १८८) राजीव जीवो ( रा० ३ : १९८ ) राजदासी (रा० ३ : १५६) अश्वघास कायस्थ ( रा० ३ : ४८९ ) कुट्टनो, विट, गायक, नर्तक आदि का वर्णन उनके कर्मों के साथ किया है । वाद्यों में वीणा, ( रा० २ : १२६ ) पटह ( रा० २ : १६८ ) वेणु ( रा० २ : १६७ ) मृदंग, शंख, घण्टा, सुगन्धियों में, चन्दन, कर्पूर, धूप, केसर, का प्रयोग किया जाता था । पाणि स्पर्श द्वारा आशीर्वाद, साधुवाद एवं कृतज्ञता प्रकट करने की प्रथा थी । ( रा० ३ : १८२ ) प्रतिज्ञा पालन, वचन- बद्धता पर जोर दिया जाता था । ( रा० १ : २४३, ३ : १८२, ४२५ ) कल्हण ने विटो की बहुत निन्दा की है । ( रा० २ : ६७-७० ) कृषि मुख्य उद्यम था । अरघट, कुल्या ( नहर ) आदि से सिंचाई होती थी । अरघट अर्थात् रहट काश्मीर में अति प्राचीन काल से प्रचलित था । जिससे विश्व अपरिचित था । यह प्राय परसियन व्हील के ऐतिहासिक काल से भी प्राचीन थी । कल्हण यन्त्र का उल्लेख करता है । यह वर्तमान काल के क्रेन के समान शिला उठाने का यन्त्र था । ( रा० १ : २६३ ) कूप यन्त्र का भी कल्हण ने उल्लेख किया है । ( रा० १ : २८४ ) यह रस्सी का बना होता था । रस्सी चक्र के ऊपर से आती जाती थी । लोग कांगड़ी अर्थात् हसन्ती किंवा अंगार धानी का आज के समान उपयोग करते थे । ( रा० १ : १७१ ) महिलायें नील निचोल ( रा० २ : २४७ ) तथा कंचुकी ( रा० २ : २९४ ) पहनती थी । मूर्धा पर शीर्षांशुक रखती थी । ( रा० १ : २४७ ) बालक काक पक्ष लगाते थे । ( रा० १ : ८१ ) स्त्रियाँ नूपुर, स्वर्ण सूत्र, धारण करती थी । पुरुष गण मस्तक स्थित मणि, ( रा० २ : १६५ ) मुकुट में मुक्ता . रा० ३ : ५२९ ) धारण करते थे । महिलायें यावक अर्थात् आलता लगाती थी । ( रा० ३ : ४१५ ) ये श्रृंगार करती थी । श्रृंगार में केसर, चन्दन, चूर्ण, पुष्प एवं सुगन्धियों का उपयोग किया जाता था । पुरुष उष्णीष धारण करते थे । धौत वस्त्र पवित्रता का प्रतीक था । ( रा० २ : १६१ ) रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों का प्रचलन था । रुई के वस्त्रों का उल्लेख कम मिलता है । काश्मीर में रुई नहीं होती थी । रुई का वस्त्र भारत के अन्य भागों से काश्मीर में आता था । हेम पादांकित ( रा० २ : ३०० ) मार्तण्ड प्रतिमांकित यमुपदेव वस्त्रों ( रा० १ : २९९ ) का उल्लेख मिलता है । वे सिंहल से काश्मीर में आते थे ।
[ ३४ ] सभा : काश्मीर में सभा थी । उसके सदस्यों को सभ्य कहा जाता था । ( रा० ३ : १५८ ) सभा का सर्वप्रथम उल्लेख सन्धिमति के समय में मिलता है । ( रा० २ : १२७ ) सन्धिमति राज्य त्याग करने लगा तो उसने सभा एकत्रित की । उसने काश्मीर का राज्य सभा को लौटा कर वनगमन किया । ( रा० २ : १५९ ) कल्हण ने विक्रमादित्य की सभा का उल्लेख मातृगुप्त के प्रसंग में किया है । ( रा० ३ : १३९, १४६ ) मातृगुप्त के प्रसंग में ही कल्हण ने सभा का पुनः उल्लेख किया है । ( रा० ३ : २०४ ) सभा का सभापति होता था । जयापीड की सभा का सभापति भट्टोद्भट था । ( रा० ४ : ४६५ ) सभा में संगीत भी होता था । ( रा० ५ : ३६१ ) काश्मीर की सभा का कार्य क्या था इस पर कल्हण प्रकाश नहीं डालता । शासन पद्धति पर भी कल्हण प्रकाश डालता है । राजा जलोक के पूर्व अन्य राज्यों के समान काश्मीर में व्यवस्था थी । ( रा० १ : ११८ ) राज्य की सप्त प्रकृतियाँ थीं । ( रा० १ : ११९ ) जलोक ने शासन पद्धति में सुधार किया । उसने महाराज युधिष्ठिर के राज्य में महाभारत के समय की प्रचलित शासन व्यवस्था काश्मीर में चलायी । ( रा० १ : १२० ) दण्ड प्रथा प्रचलित थी । कारागार होते थे । उन्हें कारा वेश्म कहा गया है । राजा युधिष्ठिर दुर्गों गलिका में बन्दी बनाकर रखा गया था । ( रा० २ : ७४ ) राजा हिरण्य ने अपने भ्राता तोरमाण को बन्धन में रख दिया था । ( रा० ३ : १०४ ) शूल देने की प्रथा थी । श्मशान में शूली दी जाती थी । ( रा० २ : ७९ ) समाज में क्रूरता भी होती थी । किन्तु यह अच्छा नहीं समझा जाता था । क्रूरता की कल्हण ने घोर निन्दा की है । क्रूरता के स्थान पर, उदारता, सहिष्णुता, दान, क्षमादि उदात्त गुणों की प्रशंसा की गयी है । न्याय पर कल्हण अत्यधिक बल देता है । उसने स्वयं लिखा है कि तरंगिणी की रचना उसने एक स्थेय किंवा न्यायकर्ता तुल्य सब बातों को तौलकर एक निष्कर्ष पर पहुँचकर लेखनी उठायी है । कल्हण शान्ति प्रिय था । शान्त रस को प्राथमिकता दी है । उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा अबाध्य गति से प्रवाहित मिलती है । समाज : कल्हण ने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया है । उसने अपने समय के नर- नारियों के आहार-विहार, आमोद-प्रमोद, खान-पान, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, संस्कार-कुसंस्कार, अन्ध विश्वास, परम्परा, रूढ़ियाँ उनकी जड़ता, नैतिक चरित्र, सबको एक मनोवैज्ञानिक के समान काव्यमयी भाषा में उपस्थित किया है । नर-नारियों की धार्मिक एवं कामुक प्रवृत्तियों और तज्जन्य समस्याओं के निराकरण का मौलिक हल भी स्थान-स्थान पर दिया है । ग्रामीणों तथा नागरिकों के व्यंग-विनोद, हास- परिहास के वर्णन में उसकी काव्य कला अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पर पहुँच जाती है । इस प्रकार वह प्रमाणित करता है कि वह कवि प्रथम तत्पश्चात् इतिहासकार था । कल्हण लेखन-कला में परिपक्व बुद्धि का प्रौढ व्यक्ति था । युवक लेखक कल्पना सागर में तैरने का अधिक प्रयास करता है । कल्हण ने घटना सागर में गोता लगाकर एक प्रौढ सन्तुलित व्यक्ति के समान रत्नों को निकालकर घटनाओं को क्रमबद्ध किया है । अत्याचार, अनाचार, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, गृहसंघर्ष, अराजकता आदि कटु किन्तु वास्तविक घटनाओं के मध्य गुजरने के कारण उसका उर्वर मस्तिष्क राज- तरंगिणी जैसे काव्य को प्रस्तुत करने के लिए परिपक्व हो गया था । उसने अपने समय की अनुभूतियों को गाथा में पिरो दिया है ।
[ ३५ ] कल्हण ने तत्कालीन समाज का वर्णन करते हुए समाज की आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला है । टंकणित मुद्रा, दीनार, कर-प्रणाली, करों का नाम, राजस्व, कृषि, उद्योग-धन्धा, वाणिज्य, व्यवसाय, के वर्णनो के साथ अकाल, उपल वृष्टि, तुहिनपात, उनका काश्मीर के समाज पर पड़ते प्रभाव का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है । कल्हण ने उत्सवों, यात्राओं, परम्पराओं आदि का संक्षिप्त वर्णन किया है। समाज में पुराण पाठ, कविता पाठ एवं नाटक होते थे । नट, चारण, (रा० १ : २२२) कुम्भदास (पानी भरने वाले) (रा० ३ : ४५६) मुण्ड (रा० १ : २३३) शश्यपाल (रा० १ : २३२) मान्त्रिक (रा० १ : २३४) नैष्ठिक (रा० १ : २३६) कंचुकी (रा० १ : २९५) चर (रा० १ : २५०) गुप्तचर (रा० ३ : १५६) विज्ञदूत (रा० ३ : १५६) भृत्य (रा० १ : २४७) धात्री, (रा० १ : ७७) कुम्भकार, यामिक (रा० ३ : १७३) दूत (रा० ३ : १८८) राजीव जीवो (रा० ३ : १९८) राजदासी (रा० ३ : १५६) अश्वघास कायस्थ (रा० ३ : ४८९) कुट्टनी, विट, गायक, नर्तक आदि का वर्णन उनके कर्मों के साथ किया है । वाद्यों में वीणा, (रा० २ : १२६) पटह (रा० २ : १६८) वेणु (रा० २ : १६७) मृदंग, शंख, घण्टा, सुगन्धियों में, चन्दन, कपूर, धूप, केसर, का प्रयोग किया जाता था । पाणि स्पर्श द्वारा आशीर्वाद, साधुवाद एवं कृतज्ञता प्रकट करने की प्रथा थी । (रा० ३ : १८२) प्रतिज्ञा पालन, वचन- बद्धता पर जोर दिया जाता था । (रा० १ : २४३, ३ : १८२, ४२५) कल्हण ने विटो की बहुत निन्दा की है। (रा० २ : ६७-७०) कृषि मुख्य उद्यम था । अरघट, कुल्या (नहर) आदि से सिंचाई होती थी । अरघट अर्थात् रहट काश्मीर में अति प्राचीन काल से प्रचलित था । जिससे विश्व अपरिचित था । यह प्रथा परसियन व्हील के ऐतिहासिक काल से भी प्राचीन थी । कल्हण यन्त्र का उल्लेख करता है । यह वर्तमान काल के क्रेन के समान शिला उठाने का यन्त्र था । (रा० १ : १६३) कूप यन्त्र का भी कल्हण ने उल्लेख किया है । (रा० १ : २८४) यह रस्सी का बना होता था । रस्सी चक्र के ऊपर से आती जाती थी । लोग कागड़ी अर्थात् हसन्ती किंवा अंगार धानी का आज के समान उपयोग करते थे । (रा० ३ : १७१) महिलायें नील निचोल (रा० २ : २४७) तथा कंचुकी (रा० २ : २९४) पहनती थी । मूर्धा पर दीपशिखं रखती थी । (रा० १ : २४७) बालक काक पक्ष्छ लगाते थे । (रा० १ : ८१) स्त्रियाँ नूपुर, स्वर्ण सूत्र, धारण करती थी । पुरुष गण मस्तक स्थित मणि, (रा० २ : १६५) मुकुट में मुक्ता । रा० ३ : ५२९) धारण करते थे । महिलायें यावक अर्थात् आलता लगाती थी । (रा० ३ : ४१५) वे श्रृंगार करती थीं । श्रृंगार में केसर, चन्दन, चूर्ण, पुष्प एवं सुगन्धियों का उपयोग किया जाता था । पुरुष उष्णीष धारण करते थे । धौत वस्त्र पवित्रता का प्रतीक था । (रा० २ : १६१) रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों का प्रचलन था । रुई के वस्त्रों का उल्लेख कम मिलता है । काश्मीर में रुई नही होती थी । रुई का वस्त्र भारत के अन्य भागों से काश्मीर में आता था । हेम पादांकित (रा० २ : ३००) मार्तण्ड प्रतिमांकित समुद्रदेव वस्त्रों (रा० १ : २९९) का उल्लेख मिलता है । वे सिंहल से काश्मीर में आते थे ।
[ ३६ ] खान-पान ऋतु तथा जलवायु के अनुसार होता था। सत्तू, कच्चगुच्छ, घृत, मधु, दुग्ध, शाली, गोधूम, तथा विभिन्न अन्नों के पकवान बनते थे। साधारण जनता शाली, शाक, कमल जड़ तथा सस्ती तरकारी खाती थी। ब्राह्मणों के अतिरिक्त जनता आमिष भोजी थी। भूना मांस खाने की प्रथा थी। व्यापारी वर्ग मदिरा का आदी था। पर्वों तथा त्योहारों पर मदिरा पान होता था। मदिरा विक्रय का वर्णन उत्सवों पर मिलता है। हल्की सुरा बर्फ के साथ शीतल कर पी जाती थी। फलों में प्रायः वे सभी फल होते थे जो आज कल वहाँ होते हैं। शहतूत, अनार, बादाम, सेब, खुबानी, सतालू, बम्बू गोशा, नाशपाती, अखरोट खूब मिलते थे। आम का अभाव था। ब्राह्मणों के लिये लहसुन एवं प्याज का प्रयोग वर्जित था। (रा० १ : ३४७) राजकीय चिह्न, छत्र (रा० ३ : ६२) ध्वजा, (रा० ३ : ७७) तथा पार्श्वध्वज (रा० ३ : ७८) थे। राजा मुकुट धारण करते थे। काश्मीर में भुवन रचना लकड़ी तथा पाषाण से होती थी। पाषाण वेश्म का अत्यधिक उल्लेख मिलता है। (रा० १ : ८६) काश्मीर के ध्वंसावशेषों में लगे विशालकाय शिला- खण्डों को देखकर आश्चर्य होता है। उनके उठाने तथा रखने के लिए यन्त्रों का प्रयोग किया जाता था। भवनों के अनेक वर्ग थे। विद्या वेश्म आधुनिक स्कूल एवं कालेजों के समान थे। सौंध (रा० १ : २४६) नाग भवन (रा० १ : २५७) हर्म्य (रा० २ : १३५) गुहागृह (रा० २ : १६५) नदवन (रा० ३ : ११) के निर्माण आदि का उल्लेख मिलता है। राजभवन के अन्तःपुर का नाम शुद्धान्त था, जहाँ रानियां रहती थीं। (रा० ३ : ४३६, ५०६) सार्वजनिक निर्माणकार्यों को बहुत महत्व दिया जाता था। कृषि उपयोगी भूमि, सिंचाई व्यवस्था के लिए कुल्या बनाने का कई स्थलों पर वर्णन किया गया है। सुवर्ण मणि कुल्या (रा० १ : ९७) चन्द्र कुल्या (रा० १ : ३१८) अपगा (रा० १ : ३२९) के अतिरिक्त सेतु एवं बाँध बनाने का उल्लेख मिलता है। जल की गति तथा स्रोतस्विनियों की गति नियन्त्रित करने के लिए सेतु निर्माण किये जाते थे। दामोदर सूद (रा० १ : १५७) गुहसेतु (रा० १ : १५६) पाषाणमय सेतु (रा० १ : १५९) उनके कुछ उदाहरण हैं। ब्राह्मण उपनिवेश : अस्पृश्यता काश्मीर में नहीं थी। जाति-पाँत का बन्धन अत्यन्त शिथिल था। परस्पर विवाह संबंध होते थे। राजाओं ने डोम्ब कन्या तथा वैश्य जाति की महिलाओं से विवाह किये थे। डोम्ब कन्या भी काश्मीर की महारानी हुई है। (रा० ५३८) काश्मीर के सिंहासन को इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न सन्तानों ने सुशोभित किया है। राजा भी काश्मीर में निम्न वर्ग कल्यपाल तक हुए हैं। (रा० ३ : ४८८; ४ : ६७९; ७१६) उनका विवाह भी राजकुलों में हुआ था। ब्राह्मण वर्ग ने निस्सन्देह अपना अभिजात कुल बनाये रखा था। काश्मीर में जाति-पात का बन्धन अत्यन्त कुंचनीय था। प्रत्येक नागरिक समाज का उसी प्रकार अंग था जैसे अन्य। जन्मना वर्ण के आधार पर किसी पर कभी आक्षेप काश्मीर में नहीं किया गया था। उसने सहि- ष्णुता का सर्वदा परिचय दिया है। जो जाति काश्मीर में आयी वह वहीं आत्मसात हो गयी। केवल मुसलमान इसके अपवाद थे। ललितादित्य का तुषार (तुर्क) मन्त्री था। (रा० ४ . २१) गैर काश्मीरी होने के कारण किसी का कभी अविश्वास किया अनादर नहीं किया गया था। मेघवाहन का गुरु स्तोन्पा गैर काश्मीरी था। परन्तु उसके लिए अत्यन्त आदर एवं श्रद्धालु शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है। (रा० १ : १०)
[ ३७ ] मिहिरकुल हूण था । कनिष्क कुषाण था । किन्तु उनकी जाति के कारण उनसे भेदभाव नहीं किया गया था । कश्मीर के हिन्दू इस दिशा में शेष भारत से जात-बन्धन में कुंचनीय, उदार एवं सहिष्णु थे । इसका कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव था, जो जाति-पाँत एवं वर्णधम में विश्वास नही करता था । ब्राह्मणों में निःसन्देह अपनी जाति के एवं वर्ग के लिए कट्टरता थी । कल्हण काश्मीरी ब्राह्मण था । उसके लिए उसे गर्व था । वह अपना रक्त शुद्ध रखना चाहता था । दूसरे ब्राह्मणों मे भी यही अपेक्षा करता था । काश्मीरी ब्राह्मणों को इस कट्टरता के कारण वहाँ ब्राह्मणो के चार उपनिवेश बन गये थे । राजा मिहिर कुल ने आर्य देशीय ब्राह्मणो को कश्मीर में लाकर आबाद किया था । ( रा० १ : ३१३ ) इसी प्रकार राजा मेघवाहन ने देशीय भिक्षुओं के भोग हेतु अनेक पुण्य कार्यों को किया था । ( रा० ३ : ९ ) कश्मीर में वर्ण-व्यवस्था बौद्ध प्रभाव के कारण लुप्त हो गयी तो राजा जलौक ने कान्यकुब्ज प्रदेश से व्यवहारविद् चातुवर्ण के लोगो को कश्मीर लाकर आबाद किया था । ( रा० १ : ११७ ) कल्हण ब्राह्मणों के चार उपनिवेशों का उल्लेख करता है । राजा गोपादित्य ने आर्य देशीय द्विजों को अग्रहार दानकर गोपादद्रि के मूल में गोप अग्रहार स्थापित किया था । ( रा० १ : ३४१ ) दूसरा उप- निवेश पुण्य देशीय ब्राह्मणों का था । यह वश्विक नामक स्थान मे था । ( रा० १ : ३४३ ) तीसरा उप- निवेश भूक्षीर वाटिका में था । यहाँ पर गोपादित्य ने लहसुन भोजी ब्राह्मणो को समस्त काश्मीर मण्डल से एकत्रित कर उनका एक अलग उपनिवेश बना दिया था । उन्हें समाज से एक प्रकार से बहिष्कृत कर दिया गया था । चौथा ब्राह्मणो का उपनिवेश खासटा स्थान में था । यहाँ पर आचरणहीन ब्राह्मणों को बसाया गया था । ( रा० १ : ३४२-३४५ ) महिलाओं का स्थान : कल्हण ने सती नारियों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा एवं असतियों के प्रति घृणा प्रकट की है । ( रा० १ : २७२, ३००, ३२१ ) काश्मीर में सती प्रथा प्रचलित थी । प्रथम सती रानी वाक्पुष्टा थी । ( रा० २ : ४४, ५५, ५६ ) सती प्रथा को कल्हण प्रोत्साहन नही देता । कालान्तर में यह प्रथा जोर पकड़ गयी और उसका दुरुपयोग होने लगा । ( रा० ५ : २२५७ : १०३, ४७८ ) कल्हण महिलाओं के अधिकार तथा कर्तव्य पर जोर देता है । वह स्त्रियो को जननी मानता है, माता मानता है, प्रकृति का एक अंग मानता है। यह विष्णु की विशेष प्रशंसा इसलिये नहीं करता कि उनका स्वरूप एकांगी है । वह केवल पुरुष शक्ति के प्रतीक हैं। वह अर्धनागेश्वर की सर्वदा वन्दना इसलिए करता है कि ये नर एवं नारी, किंवा पुरुष एवं प्रकृति दोनों के प्रतीक हैं। कल्हण पुरुष एवं स्त्री दोनों का समाज में समान स्थान मानता है । ( रा० ३ : ४४४ ) काश्मीर में महिलाओं ने शासक, अभिभावक एवं रानी के रूप में सिंहासन को सुशोभित किया है । ( रा० १ : ७०-७२ ) कल्हण उन्हें 'प्रजानाम् मातरम्' जैसे आदर एवं पूजनीय शब्दों से सम्बोधित करता हैं। वे जगत् की, राज्य की माता हैं। कल्हण उन्हें पूज्य एवं आदर की दृष्टि से देखता है । (रा० १ : ७३ ) राजा एवं रानी का जहाँ कल्हण ने नाम लिया है वहाँ गौरी-शंकर, राधा-कृष्ण के समान स्त्रियो का नाम पुरुषों के पूर्व रखा है। यह शैली स्त्रियों के प्रति अत्यन्त आदर प्रकट करने के लिए कल्हण ने अपनायी है । ( रा० २ : ११ )
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के चांचल्य की निन्दा है। जहाँ नारी जाति के कारण उत्तम कार्य हुये हैं वहाँ कल्हण ने उनकी प्रशंसा की है। कितने ही स्थानों पर नारी का चित्रण बड़ा ही मार्मिक हो गया है। राजा युधिष्ठिर के देश त्याग करते समय नारी की मनोभावनाओं का अत्यन्त कारुण्यपूर्ण दृश्य खींचा है। (रा० १ : ३६७-३७३) महाकाव्य : महाकवि कालिदास ने रघुवंश में राजा दिलीप से प्रारम्भ कर रघुवंश के समस्त राजाओं का क्रमशः वर्णन कर सुन्दर महाकाव्य प्रस्तुत किया है। यही बात कल्हण के इस महाकाव्य के विषय में कही जायगी। दोनों में अन्तर इतना ही है कि रघुवंश एक वंश का और राजतरंगिणी एक देश के कई वंशों का वर्णन करती है। यह बहुनायक महाकाव्य है। महाकाव्य के प्रायः सभी लक्षण इस काव्य में मिलते हैं। शान्त रस इसका अंगी रस है। अन्य रस अंग्यभूत होकर आये हैं। काव्य का नाम सारगर्भित होना चाहिए। कल्हण ने राजतरंगिणी नाम रखा है। यह युक्तिपूर्ण है। तरंगों का आवागमन कभी समाप्त नहीं होता। राजा भी सागर की तरंगों के तुल्य आते-जाते रहते हैं, उठते-गिरते रहते हैं। तरंगें कभी उत्ताल होती हैं, कभी गर्जन करती हैं और कभी शान्त हो जाती हैं। यही दशा राजाओं की है। काव्य के सभी गुण, रस, अलंकार, छन्द, पद लालित्य का समावेश इस उत्कृष्ट महाकाव्य में हो गया है। कल्हण अपने काव्य में केवल कल्पना पर उड़ा नहीं है। वह उस पंछी की तरह नहीं उड़ता, जो डार-डार, पात-पात उठता-बैठता रहता है। वह अनन्त में, ओर-छोर हीन विश्व में, कल्पनामय जगत में अनायास नहीं उड़ता। वह इस जगत में, इस लोक में, साशय उड़ान लेता है। उसने काव्यमय इतिहास में कल्पना के स्थान पर लौकिक घटनाओं का निबन्धन किया है (रा० १ : ४६, ४७) उसके पद में लालित्य से आरम्भ होता है। उसमें सरलता है। प्रचलित शब्दों का प्रयोग है। वह जैसे-जैसे रचना करता अग्रसर होता है, उसके काव्य में सरलता लुप्त होने लगती है। अप्रचलित शब्दों की प्रचुरता बढ़ जाती है। यह सरल, हृदय कवि था। उदार था। उसके हृदयस्थल में कवियों के लिए आदर था। कवि उत्तम रचना करता है। दुष्टल वर्णन नहीं करता इसे उसने बलवती भाषा में लिखा है। (रा० १ : ३, ४, ५, ४५-४७) प्रसंग आते ही काश्मीर के कवियों का और भारत के अन्य प्रदेशों के कवियों का नाम आदर के साथ लिया है। उसने अनेक राजाओं, उनके समय में हुए कवियों, उनके काव्यों, तत्कालीन विद्वानों, दार्श- निकों का वर्णन उनके अनुरूप आदर के साथ किया है। उसने भारत एवं काश्मीर की परिस्थितियों का अध्ययन किया, उनके रचना-काल का निर्णय किया और उन्हें यथास्थान रखकर काश्मीर के साहित्यिक इतिहास के साथ राजनीतिक इतिहास को प्रस्तुत किया है। (रा० १ : १७८; २ : १६; ४ : १४४, ४४८, ४९५, ७०५, ५ : २८-३२; २०४) राजतरंगिणी के रूप में कल्हण कोरे इतिहास के स्थान पर एक सुन्दर महाकाव्य उपस्थित करता है। रसों का सुन्दर परिपाक होने के कारण पाठक उसे पढ़ता क्लान्त नहीं होता। उसके वर्णन में नवीनता प्राप्त होती है। अलंकारों की छटा यथावसर देखने को मिलती है। उपमा एवं अलंकारों का प्रयोग ठीक लगता है। पाठक उनमें नवीनता एवं मौलिकता का बोध करके काव्य-वीथियों में रमता है। उसने उपमाओं को शब्द-जाल में लपेट कर, सुन्दर किन्तु प्रानहीन पदों में पाठक को नहीं उलझाया है। उसने यथाशक्ति इस महाकाव्य में आख्यान एवं नवीन विचार रखने की शैली का अनुकरण किया है। (रा० ३ : ४१६)
[ ४१ ] अलंकारों के प्रयोग में उसने संयम का परिचय दिया है, नियन्त्रण रखा है । गुणहीन पदावलियों से वह विरत रहा है। किस अवसर पर, किस प्रकार, किस अलंकार को उत्कृष्टतापूर्वक एक कुशल कवि के समान प्रयोग करना चाहिये, इसमें उसने अधिक कुशलता प्राप्त की है। उसने विषयानुसार भाषा एवं छन्दो का प्रयोग किया है। शृङ्गार वर्णन में, ऋतु वर्णन में, उसने प्रकृति के साथ मानव-प्रकृति को मिलाते हुए; आध्यात्म एवं दर्शन का अद्भुत समन्वय किया है। ( रा० १ : ६, २८, २०६; ३ : ४१४, ५ : ३४३, ३६१; ७ : ९२८, १५५७; ८ : ८४२, ६४७, १३३४ ) कल्हण लौकिक वर्णन करता है। काश्मीर के बाहर का वर्णन उसने केवल ऐतिहासिक घटनाओं की शृङ्खला को विशृङ्खलित न होने देने के लिये किया है। लौकिक वर्णन होते भी उसका काव्य कहीं एक सुरा नहीं होने पाया है। उसने अलंकारों की पुनरावृत्ति नहीं की है। यदि वही अलंकार पुनः आता है, तो कुछ दूसरा ही रूप धर कर । इसलिये उसके काव्य का प्रत्येक चरण, प्रत्येक पद ताजी हवा की तरह सर्वदा स्फूर्तिमय, प्राणमय रहता है। काव्य अलंकारमय होते हुए भी अलंकारों से बोझिल नहीं है। अलंकारों का उपयोग वर्ण्य विषय को सुस्पष्ट तथा उसमें और बल लाने के उद्देश्य से किया गया है। अस्पष्टता का नितरा अभाव है। पदों में, शब्द गठन में, गतिशीलता है। वे अत्यन्त संक्षिप्त न होकर सरल एवं वर्णनात्मक हैं। उनमें सौन्दर्य एवं कला का प्रभाव चिर नूतन, निर्मल, अवलान्त, स्रोत जल कण तुल्य हैं। वह भ्रान्त मन, म्लिन मन, उदास मन में स्फूर्ति उत्पन्न करता है ! पुरातन कवि काव्य-परम्परा का अनुकरण करता, आरम्भ एवं अन्त में छन्द बदल देता है। महा- काव्यों का यह लक्षण है। अन्त में छन्द का परिवर्तन कर देना चाहिये। दृश्य, रस एवं घटनाओं के अनुरूप कल्हण छन्द बदल देता है। महाकवि बाण तथा बिल्हण में यत्र-तत्र प्राप्त होती कृत्रिमता का किसी स्थल पर बोध नहीं होता । उसने लम्बे-लम्बे समासों में जैसे तरंगों को बाँध रखा है। कल्हण की दृष्टि निरपेक्ष है। उसे आलोचनात्मक प्रखर बुद्धि प्राप्त थी । किन्तु उसने राग-द्वेष रहित होकर, ग्रन्थ-रचना की है। कल्हण जैसा इतिहासकार अठारहवीं शताब्दी के पूर्व विश्व में नहीं हुआ है। उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा प्रवाहित होती, पाठक के मानस को शान्त करती है। उसके काव्य में वही स्फूर्ति दिखायी देती है, जो वाल्मीकि की रामायण एवं व्यास के महाभारत में है। उसके पदों में क्षण-क्षण नवीनता, मौलिकता प्रवेश करती रहती है। बाण का हर्ष चरित, विल्हण का विक्रमांक देव चरित, राजाश्रय में पूषित काव्य है। कल्हण का काव्य एक स्वतंत्र चिन्तक का काव्य है जिसे उसने देश-भक्ति की भावना से प्रेरित होकर लिपिबद्ध किया था । उसके काव्य का प्रयोजन किसी राजा, किसी दाता को प्रसन्न करना नहीं था। किसी राजसभा में, किसी प्रासाद में बैठकर उसने चिन्तन नहीं किया था। उसकी कल्पना, उसका चिन्तन श्रीनगर से दूर, राज्या- श्रय से दूर, राज छाया से दूर, परिहास की प्राकृतिक सुषमा में, अपने घर में, अपने ही साधनों से, अपने अर्जित धन से, जीवन यापन करते लिखी गयी जगत की, सरस्वती के एक एकान्त उपासक, स्वावलम्बी मानव की स्वाभिमानी मानव की रचना है। कालिदास, भवभूति, विल्हण, बान सदृशो राज्याश्रय प्राप्त था। सबने राज्यान्न खाकर काव्य रचना की थी । कल्हण एक मात्र महान काव्यकार है, जो राजान्न द्वारा वर्धित नहीं हुआ था। इस दिशा में वह कालिदास आदि से बहुत आगे है। उसका उद्देश्य अपने देश में सर्व ६
[ ४२ ]
युग लाना था, जन-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना था, राजाओं का सुधार करना था, उन्हें जन-जीवन से मिला देना था । कल्हण की रचना में सहज सौन्दर्य है, जिसका विल्हण की रचना में अभाव खटकता है । ठीक कहा गया है कि कल्हण ने अपने काव्य दर्पण को इतना निर्मल, स्वच्छ एवं रमणीय रखा है कि उसमें विल्हण की प्रौढ़ शैली सद्यः प्रतिबिम्बित होतो है । कल्हण की शैली सौन्दर्य पूर्ण है। प्रकृति का उसमें प्राकृ- तिक चित्रण है। यह चित्रांकन सुश्लिष्ट है । (रा० ८ : ३१६१-६२, १३३४-१३३८) चरित्र चित्रण में कल्हण ने क्षमता का परिचय दिया है । आलोच्य स्थान पर निष्पक्ष आलोचना की है । जनजीवन से सम्पर्क बनाये रखा है । किसी के स्नेह एवं घृणा से अपने को दूर रखा है। एक स्थेय तुल्य वह चरित्र चित्रण करता है। उसका यह चित्रण, जलोक, मिहिरकुल, हर्ष, कलश, सन्धिमति, दिद्दा एवं देवी वाक्पुष्टा में निखर उठा है । उसके काव्य में वैदिक, बौद्ध एवं संस्कृत महान रचनाकारों की संवाद-परिसंवाद शैली का दर्शन मिलता है। (रा० ३ : १६१, १८३ : ७ : ४२३, १२८१, १४१६, १३- ८६; ८ : २६१३, ३२१६) काव्य के माध्यम से कल्हण ने इतिहास लिखा है । (रा० १ : ६) उसने इतिहास एवं काव्यकार को मिला दिया है । उसने कथावस्तु के विस्तार के कारण अलंकार की विचित्रता का अनेक स्थलों पर प्रयोग नहीं किया है। युधिष्ठिर का राज्य त्याग, जयापीड का अन्त, चक्र वर्मन का प्रवेश, अनन्त की शव यात्रा, राजा हर्ष का राज्य त्याग, हर्ष का अन्तिम काल, सुस्सल का श्रीनगर आगमन एवं भिक्षाचर का अन्तिम युद्ध इसके उदाहरण हैं। (रा० १ : ३६६; ४ : ६४०; ५ : ३४१; ७ : ४६१; १६००-१७१४; ८ : ९४७, १७४०) कल्हण के पदों में संस्कृत-गद्य का रस मिलता है। पद्यात्मक होते भी कही-कही गद्यात्मक शैली हो गयी है। उसकी कथनात्मक शैली अत्यन्त नाटकीय एवं सशक्त है । राजा जयापीड का अन्त एवं वार्ता- लाप नाटकीय शैली का उदाहरण है। ( रा० ४ : ६४० ) ऐतिहासिक काव्य को नीरसता से बचाने के लिये कल्हण ने अलंकार, व्यंग तथा उक्तियों का आश्रय लिया है। उसके अधिकांश रूपक मौलिक हैं, संस्कृत साहित्य को उसकी देन हैं। (रा० ६ : २०१, ७ : १०६६, १२२४, ८ : १३४, २५८६, २६३५, २५२०, २५६०, २७४७) महाकाव्य राज तरंगिणी में दुस्सह स्थल भी है। दुरुहताओं एवं जटिलताओ का कुछ कारण शैलीगत भी है । जैसे दुर्लभ लौकिक एवं अप्रचलित शब्दों का प्रयोग है । काव्यात्मक सन्दिग्धता ऐसे स्थलो पर बढ़ गयी है । ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध में जटिल राजनीतिक परिस्थितियों तथा उनके वर्णन में इस प्रकार के स्थल मिलेंगे । उसने राज कुचक्र, दरबारी जीवन, घटनाओ के वर्णन का जितना प्रयास किया है, उतना ही उन स्थलों पर उसके अभिप्राय को समझना कठिन हो गया है । ऐसे स्थल अलंकृत काव्य शैली में वर्णित है । सप्तम तथा अष्टम तरंग में ऐसे स्थल बहुत मिलते हैं । कारण स्पष्ट है । उन में उल्लिखित व्यक्ति या तो उस समय जीवित थे अथवा कुछ ही वर्ष पूर्व दिवंगत हो चुके थे, जिन्हें लोग उनकी जीवन घटनाओ के साथ जानते थे । कल्हण ने इन स्थलो पर व्यंगात्मक शैली का आश्रय लिया है। (रा० ३ : १८१, ४ : ६१५-६३७, ७ : ११२३) पुनरुक्ति दोष से अपने काव्य को बचाने का प्रयास कल्हण ने किया है । तथापि भूल से कहीं-कही पुनरुक्तिया आ गयी है। ग्रन्थ के अन्तिम चरण के छन्द उच्चकोटि के नही हैं । उनमें साधारण पुनरुक्तियाँ परिलक्षित होती हैं । स्थान-स्थान पर पाठकों का शैथिल्य दूर करने के लिए अलंकृत एवं आकर्षक पदों की रचना की गयी है ।
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[ ४३ ] कल्हण ने यह महाकाव्य विशेष रूप से अपने समकालीन जनों के लिए लिखा था। इसीलिये कुछ स्थलों पर उसने नवीन पात्रों का प्रवेश लम्बे षड्यन्त्र, विद्रोहादि का चित्रण बिना उचित पृष्ठभूमि के कर दिया है। ऐसे स्थलो को बिना पूर्वापर का ज्ञान हुये, समझने में कठिनता होती है। कल्हण का यह इतिहासात्मक काव्य साधारण जनता की अपेक्षा संस्कृत के विद्वानों एवं पण्डितों के लिए विशेषतः लिखा गया था। कल्हण भूतकाल का सुस्पष्ट वर्णन करता है। उसने भविष्य के इतिहास-लेखक एवं विचारकों के लिए उपदेशक का कार्य किया है। कल्हण स्वयं स्वीकार करता है कि उसने विचित्र घटनाओं का विस्तृत समावेश कथा-विस्तार के कारण न कर यत्र-तत्र रुचिकर कथानकों को लिखा है। (रा० १ : ६) राजतरंगिणी राजकथा महा- काव्य है, इसमें रोचक, विचित्र तथा चमत्कारिक कथाओं का समावेश किया गया है। इस खण्ड में वर्णित रोचक कथानक है—नाग भार वहन (रा० १ : ११४) घटेश्वर लिंग (रा० १ : १९४) सुधवा नागकन्या (रा० १ : २०७) ब्राह्मण बालक (रा० ३ : ६३) भ्रमर वासिनी (रा० ३ : ३९४) रणारम्भा (रा० : : ४३१) गिरिसुता विवाह (३ : ४४३) और रावण पूजित लिंग (रा० ३ : ४४७)। पौराणिक शैली पर वर्णित कथायें—दैत्य रमणियो से भोग (रा० ३ : ४६९) जलभेदन (रा० ३. ४५८) नागों की अलौकिक शक्ति (रा० १ : २५८) है। चमत्कारिक कथायें—वितस्तावतरण (रा० १ . १६०-१६६) चन्द्रावती का शिला हटाना (रा० १ : ३२१) सूखा में भी वृक्षों का हरित होना, (रा० २ : १५) गतप्राण कपोत पात (रा० २ : ५०) सन्धि मति का पुनरुत्थान (रा० २ : १०५) समुद्र स्तम्भन (रा० ३ : ६९) रणस्वामी, रणेश्वर स्थापना (रा० ३ : ४५७) है। विचित्र कथायें—रणा- रम्भा का भ्रमरी रूप धारण (रा० ३ : ४३८) गर्भ मण्डूक (रा० ३ : ४४२) खेचरो का स्मरण (रा० ३ : ४५०) है। चमत्कार, विचित्र एवं रोचक मिश्रित कथायें—नाग द्वारा हिम वर्षा ! (रा० १ : १७९) अश्व पर पाणि प्रहार (रा० १ : २४६) नगर सहित राजा का नाश (रा० १ : २५६) पाषाण वृष्टि (रा० १ : २६५) वरुण आगमन (रा० ३ : ५२) तल्प पर स्त्री स्वरूप बना देना आदि (रा० ३ : ४३८) हैं। कथानकों के कारण राजतरंगिणी महाकाव्य के साथ सामान्य जनता के लिए भी रुचिकर, मनोरंजन- सामग्री बन गयी है। कल्हण ने काव्य को सर्वप्रिय बनाने के लिए ग्रन्थ में अलौकिक कथाओं के अतिरिक्त अन्य कथाओं का भी समावेश किया है। उनमें नाग-मेघ (रा० ३ : २१) कामिनी स्त्री (रा० ३ : ५०१) काम संगम ज्ञान (रा० ३ : ५०८) नारी भर्त्सना (रा० ३ : ५०१-५२१) तथा वैराग्य (रा० ३ . ५२५) आदि है। काल गणना : कल्हण की काल गणना एक समस्या है। अनेक विद्वानों ने उसे सुलझाने का प्रयास गत शताब्दी के प्रारम्भ से किया है। सर्वश्री विल्सन, कनिंघम, स्टोन, ट्रायेर, एस० पी० पण्डित आदि ने हल निकालने का स्तुत्य प्रयास किया है। परन्तु अभी तक सफलता नही मिली है। मैने काशी में विद्वानों से निकट सम्पर्क स्थापित किया। परन्तु किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका। तरंग प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा कुछ तरंग चतुर्थ की गणना त्रुटिपूर्ण है। चतुर्थ तरंग में जयापीड के पश्चात् काल गणना सुधरती दिखायी देती है। जयापीड का समय लौकिक सम्वत् ३८७९ तथा कल्हण का समय लौकिक सम्वत् ४२२५ अर्थात् सन् ११४६-११५० है। तरंग पंचम और षष्ठ की काल गणना के साथ घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन है। षष्ठ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण को काल गणना ठीक होने लगी है। वह राजाओ का अभिषेक
[ ४४ ]
एवं अवसान के साथ ही साथ मुख्य घटनाओं का लौकिक सम्वत् देना आरम्भ करता है। तरंग सप्तम एवं अष्टम् की काल गणना सर्वथा ठीक है। कल्हण शक सम्वत् १०७० तदनुसार लौकिक सम्वत् ४२२४ देता है। इससे लौकिक तथा शक सम्वत् की गणना मिल जाती है। आधुनिक सिद्धान्त है कि सप्तर्षि चलते नही। कल्हण कहता है कि युधिष्ठिर के शासन काल में मुनि मघा नक्षत्र पर थे। सप्तर्षि एक शत वर्ष में मघा नक्षत्र पर आते हैं। (रा० १ : ५३-५६) यह स्वतः अध्ययन एवं अनुसन्धान का विषय है। कल्हण अपने इतिहास की रचना महाभारत कालीन गोनन्द प्रथम के समय से आरम्भ करता है। कल्हण ने कलि तथा लौकिक सम्वतों का प्रयोग किया है। मालूम होता है कि कल्हण ने अपनी काल गणना सुनिश्चित एवं स्थिर करने के लिए महाभारत काल अपनी काल सीमा ग्रन्थ प्रारम्भ करने के लिए निर्धारित कर लिया था। महाभारत के पूर्व काश्मीर में क्या सम्वत् प्रचलित था पता नही चलता। कल्हण के समय में कलि, लौकिक एवं शक तीनों सम्वत् प्रचलित थे। लौकिक सम्वत् को आधार मानकर वह काल-क्रमानुसार इतिहास रचना आरम्भ करता है। एक मत है कि द्वापर के अन्त में महाभारत हुआ था। दूसरा मत है कि कलियुग के ६५३ वर्ष पश्चात् महाभारत हुआ था। कलि सम्वत् के २५ वर्ष पश्चात् लौकिक सम्वत् आरम्भ होता है। पुराकालीन लेखकों में कल्हण एक ऐसा महाकाव्यकार है जिसने राजाओं एवं घटनाओं के इतिवृत्त के साथ सम्वत् वर्ष, मास एवं दिन दिया है। रामायण एवं महाभारत में संवत्सरों का प्रयोग नही किया गया है। कल्हण का इस दिशा में भारतीय ही नही विश्व के इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। शामी अर्थात् सेमेटिक जाति इतिहास लिखने में निपुण मानी गयी है। परन्तु बाइबिल में जहाँ राजाओं का उल्लेख किया गया है, वंशावली दी गयी है। वहाँ भी काल गणना नहीं की गयी है। राजतरंगिणी का इतिहास गोनन्द प्रथम से आरम्भ होता है। इस समय से कल्हण क्रमबद्ध इतिहास लिखता है। कलि सम्वत् ६५३ तदनुसार लौकिक सम्वत् ६२८ होता है। गोनन्द प्रथम से अभिमन्यु प्रथम का राज्य काल १२६६ वर्ष अर्थात् लौकिक सम्वत् ६२८ से १८६४ वर्ष तक होता है। इस काल में ३५ लुप्त राजाओं के अतिरिक्त कल्हण ५७ राजाओं का नाम तथा इतिहास देता है। गोनन्द वंश में गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर तक का राज्य काल १००२ वर्ष कल्हण देता है। वह समय १८६४ से २८६६ लौकिक सम्वत् वर्ष होता है। इस काल में २१ राजाओं के इतिहास का संक्षिप्त उल्लेख राजतरंगिणी में मिलता है। द्वितीय तरंग में ६ राजाओं का इतिहास है। उनका राज्य काल १९२ वर्ष आता है। यह लौकिक सम्वत् २८९६ से ३०८८ तक होता है। तृतीय तरंग में १० राजाओं का इतिहास है। उनका राज्य काल लौकिक सम्वत् ३०८८ से ३६७७ मध्य तक ५८६ वर्ष १० मास १ दिन होता है। इससे केवल राजा रणादित्य का ही राज्य काल ३०० वर्ष दिया है जो स्पष्ट त्रुटिपूर्ण है। चौथे तरंग कर्कोट वंश का काल लौकिक सम्वत् ३६७७ से ३९३१ अर्थात् २५४ वर्ष पांच मास सत्ताइस दिन होता है। पंचम तरंग उत्पल वंश का आरम्भ राजा अवन्ति वर्मा लौकिक सम्वत् ३९३१ से होता है। इस वंश के १५ राजाओं में ६ राजाओं के राज्याभिषेक का मास तथा दिन देता है। उनमें पाँच राजाओं का सम्मिलित राज्य काल मिलाकर पांच वर्ष से अधिक नहीं होता। इस प्रकार पंचम, षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम तरंग के राजाओं का वर्ष, दिन मास तक देकर वह अपनी काल गणना सिद्ध करता है।
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सम्राट् कनिष्क का समय देते समय कल्हण लिखता है कि उस समय भगवान शाक्यसिंह का परि- निर्वाण हुए १५० वर्ष हो गये थे । ( रा० १ : १७२ ) कल्हण की काल गणना इस समय से मिलायी जाय तब भी ऐतिहासिक काल गणना की तुला पर ठीक नहीं उतरती है। कम-से-कम ४०० वर्षों का हेर- फेर उसकी काल-गणना में हो जाता है । कल्हण ने तत्कालीन प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रियों एवं जनश्रुतियों के आधार पर अनुमान से समय दिया है । काल की ओर या तो कल्हण ने ध्यान नहीं दिया है अथवा उसने जो कालक्रम दिया है और अब तक इतिहास से जो बातें सिद्ध होती हैं उनमें क्या दोष एवं त्रुटियाँ हैं यह स्वतः विशेष अनुसंधान का विषय है। कल्हण की काल-गणना के अनुसार और अशोक की मान्यता प्राप्त काल-गणना में शताब्दियों का अन्तर पड़ जाता है । हिरण्य एवं तोरमाण हूण थे परन्तु उन्हें कल्हण ने गोनन्द की वंशावली से जोड़ा है । आश्चर्य है । कल्हण को ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान था । उसने अपने अध्ययन के स्थान-स्थान पर ज्योतिष सिद्धान्तों एवं काल गणना का उल्लेख किया है । तथापि उसकी काल गणना कैसे त्रुटिपूर्ण रह गयी है इस पर अध्ययन अपेक्षित है। उक्त दोष के होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संस्कृत साहित्य में कल्हण ने महाभारत काल से सुसंगत इतिहास उपस्थित किया है । राजतरंगिणी : राजतरंगिणी के तरंगों का तीन वर्गों में वर्गीकरण किया जा सकता है । श्री स्टीन ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग चार तथा तृतीय वर्ग में पाँच, छ, सात एवं आठ रखा है । श्री डाक्टर ए० एल० बैशम ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच, छ तथा तृतीय वर्ग में सात एवं आठ रखा है । श्री स्टीन का वर्गीकरण काल गणणानुसार है । चतुर्थ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण की काल गणना क्रमबद्ध होती है । तरंग पंचम एवं षष्ठ का भाग गाथा एवं ऐतिहासिक दोनों कालों का मिश्रण है । सातवें तथा आठवें तरंग की काल गणना सुनिश्चित है । श्री बैशम ने वर्गीकरण ऐतिहासिक तथ्य पर किया है । प्रथम वर्ग को वे परम्परा पर आधारित इतिहास कहते हैं । कल्हण ने इस काल के लिए कोई साक्ष्य उप- स्थित नहीं किया है कि किस आधार पर उसका वर्णन सत्य माना जाय ! कल्हण ने कश्मीर के इतिहास का जिससे महाभारत से किंचित् मात्र सम्बन्ध नहीं है गौरवपूर्ण पौराणिक घटनाओं के काल्पनिक समय से सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है । श्री बैशम द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच तथा छ अर्थात् कर्कोट एवं उत्पल वंश रखते हैं । इसे कल्हण ने पूर्वकालीन इतिहासकारों के आधार पर लिखा है, जो घटनाओं अथवा राजाओं के समकालीन थे । तृतीय वर्ग में श्री बैशम ने सप्तम तथा अष्टम तरंग रखा है । जिसका ज्ञान उसे प्रत्यक्षदर्शियों से प्राप्त हुआ था । तरंग आठ का वह स्वयं प्रत्यक्षदर्शी था । दोनों ही वर्गीकरण काल एवं प्रमाण की दृष्टि से उचित प्रतीत होते हैं । प्रथम तीन तरंग इस समय प्रतिपाद्य विषय हैं । सर्वश्री स्टीन तथा बैशम दोनों एक मत हैं कि यह काल गाथा कालीन है । तरंग चार में पूर्वार्द्ध की अपेक्षा उत्तरार्द्ध में इतिहास की झलक अधिक मिलती है । तरंग पाँच से इतिहास वर्णन आरम्भ होता है । यह काल राजा अवन्ति वर्मा ( सन् ८५५-८५६ ई० ) के समय से आरम्भ होता है । प्रथम तीन तरंग ऐतिहासिक सामग्री न होने के कारण छोटे हैं । परम्परा एवं जनश्रुतियों पर आधारित हैं । कुछ पौराणिक गाथाओ पर आधारित हैं, और कुछ काल्पनिक हैं ।
[ ४४ ] एवं अवसान के साथ ही साथ मुख्य घटनाओं का लौकिक सम्वत् देना आरम्भ करता है । तरंग सप्तम एवं अष्टम् की काल गणना सर्वथा ठीक है । कल्हण शक सम्वत् १०७० तदनुसार लौकिक सम्वत् ४२२४ देता है । इससे लौकिक तथा शक सम्वत् की गणना मिल जाती है । आधुनिक सिद्धान्त है कि सप्तर्षि चलते नही। कल्हण कहता है कि युधिष्ठिर के शासन काल में मुनि मघा नक्षत्र पर थे । सप्तर्षि एक शत वर्ष में मघा नक्षत्र पर आते हैं । ( रा० १ : ५३-५६ ) यह स्वतः अध्ययन एवं अनुसन्धान का विषय है । कल्हण अपने इतिहास की रचना महाभारत कालीन गोनन्द प्रथम के समय से आरम्भ करता है। कल्हण ने कलि तथा लौकिक सम्वतों का प्रयोग किया है। मालूम होता है कि कल्हण ने अपनी काल गणना सुनिश्चित एवं स्थिर करने के लिए महाभारत काल अपनी काल सीमा ग्रन्थ प्रारम्भ करने के लिए निर्धारित कर लिया था । महाभारत के पूर्व काश्मीर में क्या सम्वत् प्रचलित था पता नहीं चलता । कल्हण के समय में कलि, लौकिक एवं शक तीनों सम्वत् प्रचलित थे । लौकिक सम्वत् को आधार मानकर यह काल-क्रमानुसार इतिहास रचना आरम्भ करता है । एक मत है कि द्वापर के अन्त में महाभारत हुआ था । दूसरा मत है कि कलियुग के ६५३ वर्ष पश्चात् महाभारत हुआ था । कलि सम्वत् के २५ वर्ष पश्चात् लौकिक सम्वत् आरम्भ होता है । पुराकालीन लेखकों में कल्हण एक ऐसा महाकाव्यकार है जिसने राजाओ एवं घटनाओ के इतिवृत्त के साथ सम्वत् वर्ष, मास एवं दिन दिया है । रामायण एवं महाभारत में संवत्सरों का प्रयोग नहीं किया गया है । कल्हण का इस दिशा में भारतीय ही नहीं विश्व के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है। शामी अर्थात् सेमेटिक जाति इतिहास लिखने में निपुण मानी गयी है। परन्तु बाइबिल म जहाँ राजाओ का उल्लेख किया गया है, वंशावली दी गयी है। यहाँ भी काल गणना नही की गयी है । राजतरंगिणी का इतिहास गोनन्द प्रथम से आरम्भ होता है। इस समय से कल्हण क्रमबद्ध इतिहास लिखता है। कलि सम्वत् ६५३ तदनुसार लौकिक सम्वत् ६२८ होता है । गोनन्द प्रथम से अभिमन्यु प्रथम का राज्य काल १२६६ वर्ष अर्थात् लौकिक सम्वत् ६२८ से १८६४ वर्ष तक होता है। इस काल में ३५ लुप्त राजाओं के अतिरिक्त कल्हण ०७ राजाओ का नाम तथा इतिहास देता है । गोनन्द वंश में गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर तक का राज्य काल १००२ वर्ष कल्हण देता है। वह समय १८६४ से २८६६ लौकिक सम्वत् वर्ष होता है । इस काल में २१ राजाओं के इतिहास का संक्षिप्त उल्लेख राजतरंगिणी में मिलता है । द्वितीय तरंग में ६ राजाओं का इतिहास है। उनका राज्य काल १९२ वर्ष आता है। यह लौकिक सम्वत् २८९६ से ३०८८ तक होता है। तृतीय तरंग में १० राजाओ का इतिहास है। उनका राज्य काल लौकिक सम्वत् ३०८८ से ३६७७ मध्य तक ५८६ वर्ष १० मास १ दिन होता है । इससे केवल राजा रणादित्य का ही राज्य काल ३०० वर्ष दिया है जो स्पष्ट त्रुटिपूर्ण है। चौथे तरंग कर्कोट वंश का काल लौकिक सम्वत् ३६७७ से ३९३१ अर्थात् २५४ वर्ष पाच मास सत्ताइस दिन होता है । पंचम तरंग उत्पल वंश का आरम्भ राजा अवन्ति वर्मा लौकिक सम्वत् ३९३१ से होता है। इस वंश के १५ राजाओ में ६ राजाओ के राज्याभिषेक का मास तथा दिन देता है। उनमें पाँच राजाओं का सम्मिलित राज्य काल मिलाकर पाच वर्ष से अधिक नही होता । इस प्रकार पंचम, षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम तरंग के राजाओं का वर्ष, दिन मास तक देकर वह अपनी काल गणना सिद्ध करता है।
[४५]
सम्राट् कनिष्क का समय देते समय कल्हण लिखता है कि उस समय भगवान् शाक्यसिंह का परि- निर्वाण हुए १५० वर्ष हो गये थे । ( रा० १ : १७२ ) कल्हण की काल गणना इस समय से मिलायी जाय तब भी ऐतिहासिक काल गणना की तुला पर ठीक नही उतरती है। कम-से-कम ४०० वर्षों का हेर- फेर उसकी काल-गणना में हो जाता है। कल्हण ने तत्कालीन प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रियों एवं जनश्रुतियों के आधार पर अनुमान से समय दिया है। काल की ओर या तो कल्हण ने ध्यान नहीं दिया है अथवा उसने जो कालक्रम दिया है और अब तक इतिहास से जो बातें सिद्ध होती हैं उनमें क्या दोष एवं त्रुटियां हैं यह स्वतः विशेष अनुसंधान का विषय है। कल्हण की काल-गणना के अनुसार और अशोक की मान्यता प्राप्त काल-गणना में शताब्दियों का अन्तर पड़ जाता है । हिरण्य एवं तोरमाण हूण थे परन्तु उन्हें कल्हण ने गोनन्द की वंशावली से जोड़ा है । आश्चर्य है । कल्हण को ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान था । उसने अपने अध्ययन के स्थान-स्थान पर ज्योतिष सिद्धान्तो एवं काल गणना का उल्लेख किया है । तथापि उसकी काल गणना कैसे त्रुटिपूर्ण रह गयी है इस पर अध्ययन अपेक्षित है । उक्त दोष के होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संस्कृत साहित्य में कल्हण ने महाभारत काल से सुसंगत इतिहास उपस्थित किया है । राजतरंगिणी : राजतरंगिणी के तरंगो का तीन वर्गों में वर्गीकरण किया जा सकता है । श्री स्तीन ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग चार तथा तृतीय वर्ग में पाँच, छ, सात एवं आठ रखा है । श्री डाक्टर ए० एल० बैशम ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन; द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच, छ तथा तृतीय वर्ग में सात एवं आठ रखा है । श्री स्तीन का वर्गीकरण काल गणनानुसार है । चतुर्थ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण की काल गणना क्रमबद्ध होती है । तरंग पंचम एवं षष्ठ का भाग गाथा एवं ऐतिहासिक दोनो कालो का मिश्रण है । सातवें तथा आठवें तरंग की काल गणना सुनिश्चित है । श्री बैशम ने वर्गीकरण ऐतिहासिक तथ्य पर किया है । प्रथम वर्ग को वे परम्परा पर आधारित इतिहास कहते हैं । कल्हण ने इस काल के लिए कोई साक्ष्य उप- स्थित नहीं किया है कि किस आधार पर उसका वर्णन सत्य माना जाय । कल्हण ने कश्मीर के इतिहास का जिससे महाभारत से किंचित मात्र सम्बन्ध नहीं है गौरवपूर्ण पौराणिक घटनाओं के काल्पनिक समय से सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है । श्री बैशम द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच तथा छ अर्थात् कर्कोट एवं उत्पल वंश रखते हैं । इसे कल्हण ने पूर्वकालीन इतिहासकारों के आधार पर लिखा है, जो घटनाओं अथवा राजाओं के समकालीन थे । तृतीय वर्ग में श्री बैशम ने सप्तम तथा अष्टम तरंग रखा है । जिसका ज्ञान उसे प्रत्यक्षदर्शियों से प्राप्त हुआ था । तरंग आठ का वह स्वयं प्रत्यक्षदर्शी था । दोनों ही वर्गीकरण काल एवं प्रमाण की दृष्टि से उचित प्रतीत होते हैं । प्रथम तीन तरंग इस समय प्रतिपाद्य विषय है । सर्वश्री स्तीन तथा बैशम दोनों एक .मत हैं कि यह काल गाथा कालीन है । तरंग चार में पूर्वार्द्ध की अपेक्षा उत्तरार्द्ध में इतिहास की झलक अधिक मिलती है । तरंग पाँच से इतिहास वर्णन आरम्भ होता है। यह काल राजा अवन्ति वर्मा ( सन् ८५५-८५६ ई० ) के समय से आरम्भ होता है । प्रथम तीन तरंग ऐतिहासिक सामग्री न होने के कारण छोटे है । परम्परा एवं जनश्रुतियो पर आधारित है । कुछ पौराणिक गाथाओं पर आधारित हैं, और कुछ काल्पनिक हैं ।
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जैसे-जैसे तृतीय तरंग के पश्चात् कल्हण लिखता बढ़ता गया है वैसे-वैसे उसका इतिहास प्रामाणिक होता गया है । प्रथम तीन तरंगों का वर्णन अस्पष्ट है । प्रणय कथानकों, असम्भव तिथियों एवं पौराणिक नामों को निःसंकोच कल्हण ने लिया है । धार्मिक प्रवृत्ति होने के कारण पुराणों तथा उसकी गाथाओं में कल्हण का अन्ध विश्वास था । पुराना विश्वास है कि काल अर्थात् कलि का काल द्वापर युग में लागू नहीं होता । अतएव कल्हण ने काल भी कलियुग के समय से आरम्भ किया है । कल्हण की शैली वैज्ञानिक है। उसने अनुसंधान अर्थ ग्राह्य सामग्रियों को संग्रह कर अपना विचार एक स्फेयर की तरह स्वयं निश्चित किया है । ऐतिहासिक निष्कर्षों को उपस्थित करने में अपनी कला का अद्भुत परिचय दिया है । कल्हण पर पौराणिक प्रभाव होने का आक्षेप विद्वन् करते हैं । परन्तु यूनान जैसे देश में हिरोडोटस तथा थूसाडाइम के अनुसार उस युग में भी जो यहाँ का स्वर्ण युग था, रण अभियान सूर्य तथा चन्द्र की स्थिति से नियन्त्रित होता था । ग्रहण के कारण पोलो पेनिशियन युद्ध में यूनानी असफल हो गये थे । एनक्सा गोरस को एथेन्स की साधारण सभा ने इसलिये मृत्यु दण्ड दिया था कि सूर्य तथा चन्द्रमा यूनानी कवियों की दृष्टि में देवता थे । ज्योतिष ज्ञान का प्रचार वजित था । सुकरात को इसलिये मृत्युदण्ड दिया गया था कि वह देवी-देवताओं की पूजा में विश्वास न कर बुद्धिवादी था । कल्हण ने सम्राट् अशोक एवं कनिष्क जैसे महान् व्यक्तियों का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन किया है । इस प्रकार हविष्क एवं जुविष्क का वर्णन किया गया है। इतिहास एवं पुराण में जैसे अन्तर नहीं किया गया है । प्रारम्भिक वर्णन इतिहास की दृष्टि से अशुद्ध, अविश्वसनीय, कल्पना तथा जन-श्रुतियों पर आधारित है । वह पुराण तुल्य पौराणिक शैली से लिया लगता है। इसमें कल्हण का दोष नहीं है। उसने रामायण, महाभारत तथा पुराणों से सामग्रियां एकत्रित कर, काश्मीर के इतिहास को काल क्रमानुसार क्रमबद्ध करने का स्तुत्य प्रयास किया है । साहित्यिक दृष्टि से इस काल में निहित वर्णन उपमा, अलंकार, विचित्र एवं रोचक घटनाओं के संग्रह लगेंगे । वाण के हर्ष चरित के समान कल्हण ने भी दुर्लभ शब्दो का प्रयोग किया है । तथापि किसी प्रकार के इतिहास के अभाव में कल्हण की राजतरंगिणी काश्मीर का आदर्श इतिहास हो गयी है । यह अनुपम कृति है। दोषपूर्ण वास्तविक वैज्ञानिक इतिहास लिखने का यह अपनी शैली का प्रथम प्रयास भारत में कहा जायगा । अनेक दोषों के होते हुए प्राचीन जगत इतिहास का आदर करने में पीछे नहीं था । भारतीय रचना- कारों ने इतिहास-रचना की परम्परा स्थापित की थी । उनकी शैली तथा विचार अपना था । कल्हण की रचना शैली से यह स्पष्ट प्रतीत होता है । समुद्र का ज्ञान भारतीयों के ऐतिहासिक ज्ञान का परिचायक है, उसे पुरातन भारतीय जान चुके थे । कल्हण समुद्र का बहुत वर्णन करता है । भारतीयों की श्रेष्ठता अन्य दिशाओं में बहुत बढ गयी थी । यदि उसका कोई अपवाद है तो कल्हण के आधार पर कहा जा सकता है कि आधुनिक युग है ! पुरातन भारतीयों में सच्चे इतिहास का नितान्त अभाव नही था । उनके दृष्टिकोण एवं बौद्धिक विकास में दोष नही था । भारत के इतिहास के अभाव में राज तरंगिणी को स्थानीय, लौकिक किंवा प्रदेशीय इतिहास कह सकते हैं । भारतीय प्रवृत्ति की यह विशेषता है कि वह आध्यात्म की ओर अधिक झुकी थी । कहा जाता है, विदेशी आक्रमणों के कारण राष्ट्रीय भावनायें उमड़ती हैं और शक्तिशाली इतिहास लिखने के लिए अनुप्राणित करती हैं । भारत पर सिकन्दर के पूर्व विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था। कभी कल्पना नही की
[ ४७ ] यी थी कि राजविप्लव होगा। आक्रमणों के कारण व्यवस्था एवं राज-परम्परा अस्त-व्यस्त हो जायगी हिन्दुस्तान में भारतीय धर्म के स्थान पर अन्य विदेशी धर्मों का प्राबल्य हो जायगा। उस समय इतिहास लिखकर पूर्वकाल की स्मृति को सुरक्षित रखने का विचार नहीं उठा था। यूनानी नगर राष्ट्र सर्वदा संघर्षशील थे। रोम का इतिहास सैनिक अभियानों का इतिहास है। अतएव पश्चिम में इतिहास रखने एवं लिखने की विशेष रुचि हुई थी। कह सकते हैं, पश्चिम में नव- जागरण के कारण आयी आधुनिकता से पूर्व कल्हण जैसा प्रतिभाशाली महान् ऐतिहासिक विश्व साहित्य में अन्यत्र भी दुर्लभ है। उसे निःसन्देह पोलाइबियस तथा थुसाडाइड की पंक्ति में गौरव पूर्वक बैठाया जा सकता है। कल्हण के उद्धरणों से प्रतीत होता है कि काश्मीर में इतिहास लिखने की परम्परा प्राचीन-काल से प्रचलित थी। यह परम्परा भारत के अन्य स्थानों में नहीं मिलती। काश्मीर ने अपनी एकाकी भौगोलिक स्थिति के कारण अपना एक अलग व्यक्तित्व एवं चरित्र विकसित कर लिया था। अपने देश के गौरव तथा इतिहास को लिपिबद्ध करने की भावना सर्वदा काश्मीर में जागरूक थी। इसका एक और कारण हो सकता है। काश्मीर की सीमा पर लड़ाकू विदेशी राष्ट्र थे। काश्मीर का सम्बन्ध अन्य देशों से था। उनमें इतिहास लिखने और रखने की भावना भारत की अपेक्षा अधिक जागरूक थी। सेमेटिक अर्थात् सामी जाति के प्रभाव से प्रभावित होना असम्भव बात नहीं थी। अतएव काश्मीरियों ने भी अपने देश में इतिहास लिखने की कल्पना की। काश्मीर में संस्कृत साहित्य का यह एक मात्र इतिहास शेष रह गया था। जब कि मुसलिम काल में सभी कुछ नष्ट कर दिया गया था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अस्तित्व गत शताब्दी के पूर्व विश्व नहीं जानता था। किन्तु राजतरंगिणी का अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद उसके अस्तित्व काल से ही आरम्भ हो गया था। उसके अस्तित्व से लोग परिचित थे। फिरदौसी के शाहनामा की तरह राजतरंगिणी गाथादि का संकलन मात्र नहीं है। काश्मीर के हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपने पूर्वजों का इतिहास होने के कारण गर्व था और है। राजतरंगिणी के अध्ययन का इतिहास : सन् ११५० ई० से अबतक राजतरंगिणी के लगभग ४९ अनुवादों तथा संस्करणों का पता लग सका है। ऐसी कोई शताब्दी नहीं व्यतीत हुई है, जिसमें तरं- गिणी का कोई न कोई संस्करण अनुवाद अथवा प्रतिलिपि न की गयी हो। सन् ११५० से १३३९ ई० का मध्यवर्ती काल काश्मीर का अत्यन्त संघर्षमय समय रहा है। उस समय यदि राजतरंगिणी पर कुछ लिखा भी गया होगा तो पुरानी पुस्तकों के नष्ट करने तथा फूंकने के उन्माद में सिकन्दर बुत शिकन के समय में अपना अस्तित्व लुप्त कर चुका है। सन् १३३९ ई० में मुसलिम शासन काश्मीर में स्थापित हुआ। उस समय से जैनुल आब्दीन के काल सन् १४४६ ई० तक का समय काश्मीर के लिए अत्यन्त उथल-पथल का रहा है। काश्मीर की जनता केवल ११ घरों को छोड़कर मुसलिम धर्म स्वीकार कर चुकी थी। मन्दिर, मठ, जनाथय, शाला, विद्या वेश्म तथा विहार ध्वंशावशेष रह गये थे। पुस्तकें नष्ट की जा चुकी थी। जैनुल आब्दीन (सन् १४४६-१४७२ ई०) के समय श्री जोनराज ने कल्हण के कार्य को अपने समय तक लाकर अपनी राजतरंगिणी लिखी। जोनराज के पूर्व अथवा उसका समकालीन मुल्ला अहमद था। उसने जैनुल आब्दीन के आदेश
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