भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ३४ ] सभा : काश्मीर में सभा थी । उसके सदस्यों को सभ्य कहा जाता था । ( रा० ३ : १५८ ) सभा का सर्वप्रथम उल्लेख सन्धिमति के समय में मिलता है । ( रा० २ : १२७ ) सन्धिमति राज्य त्याग करने लगा तो उसने सभा एकत्रित की । उसने काश्मीर का राज्य सभा को लौटा कर वनगमन किया । ( रा० २ : १५९ ) कल्हण ने विक्रमादित्य की सभा का उल्लेख मातृगुप्त के प्रसंग में किया है । ( रा० ३ : १३९, १४६ ) मातृगुप्त के प्रसंग में ही कल्हण ने सभा का पुनः उल्लेख किया है । ( रा० ३ : २०४ ) सभा का सभापति होता था । जयापीड की सभा का सभापति भट्टोद्भट था । ( रा० ४ : ४६५ ) सभा में संगीत भी होता था । ( रा० ५ : ३६१ ) काश्मीर की सभा का कार्य क्या था इस पर कल्हण प्रकाश नहीं डालता । शासन पद्धति पर भी कल्हण प्रकाश डालता है । राजा जलोक के पूर्व अन्य राज्यों के समान काश्मीर में व्यवस्था थी । ( रा० १ : ११८ ) राज्य की सप्त प्रकृतियाँ थीं । ( रा० १ : ११९ ) जलोक ने शासन पद्धति में सुधार किया । उसने महाराज युधिष्ठिर के राज्य में महाभारत के समय की प्रचलित शासन व्यवस्था काश्मीर में चलायी । ( रा० १ : १२० ) दण्ड प्रथा प्रचलित थी । कारागार होते थे । उन्हें कारा वेश्म कहा गया है । राजा युधिष्ठिर दुर्गों गलिका में बन्दी बनाकर रखा गया था । ( रा० २ : ७४ ) राजा हिरण्य ने अपने भ्राता तोरमाण को बन्धन में रख दिया था । ( रा० ३ : १०४ ) शूल देने की प्रथा थी । श्मशान में शूली दी जाती थी । ( रा० २ : ७९ ) समाज में क्रूरता भी होती थी । किन्तु यह अच्छा नहीं समझा जाता था । क्रूरता की कल्हण ने घोर निन्दा की है । क्रूरता के स्थान पर, उदारता, सहिष्णुता, दान, क्षमादि उदात्त गुणों की प्रशंसा की गयी है । न्याय पर कल्हण अत्यधिक बल देता है । उसने स्वयं लिखा है कि तरंगिणी की रचना उसने एक स्थेय किंवा न्यायकर्ता तुल्य सब बातों को तौलकर एक निष्कर्ष पर पहुँचकर लेखनी उठायी है । कल्हण शान्ति प्रिय था । शान्त रस को प्राथमिकता दी है । उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा अबाध्य गति से प्रवाहित मिलती है । समाज : कल्हण ने तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण किया है । उसने अपने समय के नर- नारियों के आहार-विहार, आमोद-प्रमोद, खान-पान, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, संस्कार-कुसंस्कार, अन्ध विश्वास, परम्परा, रूढ़ियाँ उनकी जड़ता, नैतिक चरित्र, सबको एक मनोवैज्ञानिक के समान काव्यमयी भाषा में उपस्थित किया है । नर-नारियों की धार्मिक एवं कामुक प्रवृत्तियों और तज्जन्य समस्याओं के निराकरण का मौलिक हल भी स्थान-स्थान पर दिया है । ग्रामीणों तथा नागरिकों के व्यंग-विनोद, हास- परिहास के वर्णन में उसकी काव्य कला अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पर पहुँच जाती है । इस प्रकार वह प्रमाणित करता है कि वह कवि प्रथम तत्पश्चात् इतिहासकार था । कल्हण लेखन-कला में परिपक्व बुद्धि का प्रौढ व्यक्ति था । युवक लेखक कल्पना सागर में तैरने का अधिक प्रयास करता है । कल्हण ने घटना सागर में गोता लगाकर एक प्रौढ सन्तुलित व्यक्ति के समान रत्नों को निकालकर घटनाओं को क्रमबद्ध किया है । अत्याचार, अनाचार, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, गृहसंघर्ष, अराजकता आदि कटु किन्तु वास्तविक घटनाओं के मध्य गुजरने के कारण उसका उर्वर मस्तिष्क राज- तरंगिणी जैसे काव्य को प्रस्तुत करने के लिए परिपक्व हो गया था । उसने अपने समय की अनुभूतियों को गाथा में पिरो दिया है ।