भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ३५ ] कल्हण ने तत्कालीन समाज का वर्णन करते हुए समाज की आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला है । टंकणित मुद्रा, दीनार, कर-प्रणाली, करों का नाम, राजस्व, कृषि, उद्योग-धन्धा, वाणिज्य, व्यवसाय, के वर्णनो के साथ अकाल, उपल वृष्टि, तुहिनपात, उनका काश्मीर के समाज पर पड़ते प्रभाव का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है । कल्हण ने उत्सवों, यात्राओं, परम्पराओं आदि का संक्षिप्त वर्णन किया है। समाज में पुराण पाठ, कविता पाठ एवं नाटक होते थे । नट, चारण, (रा० १ : २२२) कुम्भदास (पानी भरने वाले) (रा० ३ : ४५६) मुण्ड (रा० १ : २३३) शश्यपाल (रा० १ : २३२) मान्त्रिक (रा० १ : २३४) नैष्ठिक (रा० १ : २३६) कंचुकी (रा० १ : २९५) चर (रा० १ : २५०) गुप्तचर (रा० ३ : १५६) विज्ञदूत (रा० ३ : १५६) भृत्य (रा० १ : २४७) धात्री, (रा० १ : ७७) कुम्भकार, यामिक (रा० ३ : १७३) दूत (रा० ३ : १८८) राजीव जीवो (रा० ३ : १९८) राजदासी (रा० ३ : १५६) अश्वघास कायस्थ (रा० ३ : ४८९) कुट्टनी, विट, गायक, नर्तक आदि का वर्णन उनके कर्मों के साथ किया है । वाद्यों में वीणा, (रा० २ : १२६) पटह (रा० २ : १६८) वेणु (रा० २ : १६७) मृदंग, शंख, घण्टा, सुगन्धियों में, चन्दन, कपूर, धूप, केसर, का प्रयोग किया जाता था । पाणि स्पर्श द्वारा आशीर्वाद, साधुवाद एवं कृतज्ञता प्रकट करने की प्रथा थी । (रा० ३ : १८२) प्रतिज्ञा पालन, वचन- बद्धता पर जोर दिया जाता था । (रा० १ : २४३, ३ : १८२, ४२५) कल्हण ने विटो की बहुत निन्दा की है। (रा० २ : ६७-७०) कृषि मुख्य उद्यम था । अरघट, कुल्या (नहर) आदि से सिंचाई होती थी । अरघट अर्थात् रहट काश्मीर में अति प्राचीन काल से प्रचलित था । जिससे विश्व अपरिचित था । यह प्रथा परसियन व्हील के ऐतिहासिक काल से भी प्राचीन थी । कल्हण यन्त्र का उल्लेख करता है । यह वर्तमान काल के क्रेन के समान शिला उठाने का यन्त्र था । (रा० १ : १६३) कूप यन्त्र का भी कल्हण ने उल्लेख किया है । (रा० १ : २८४) यह रस्सी का बना होता था । रस्सी चक्र के ऊपर से आती जाती थी । लोग कागड़ी अर्थात् हसन्ती किंवा अंगार धानी का आज के समान उपयोग करते थे । (रा० ३ : १७१) महिलायें नील निचोल (रा० २ : २४७) तथा कंचुकी (रा० २ : २९४) पहनती थी । मूर्धा पर दीपशिखं रखती थी । (रा० १ : २४७) बालक काक पक्ष्छ लगाते थे । (रा० १ : ८१) स्त्रियाँ नूपुर, स्वर्ण सूत्र, धारण करती थी । पुरुष गण मस्तक स्थित मणि, (रा० २ : १६५) मुकुट में मुक्ता । रा० ३ : ५२९) धारण करते थे । महिलायें यावक अर्थात् आलता लगाती थी । (रा० ३ : ४१५) वे श्रृंगार करती थीं । श्रृंगार में केसर, चन्दन, चूर्ण, पुष्प एवं सुगन्धियों का उपयोग किया जाता था । पुरुष उष्णीष धारण करते थे । धौत वस्त्र पवित्रता का प्रतीक था । (रा० २ : १६१) रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों का प्रचलन था । रुई के वस्त्रों का उल्लेख कम मिलता है । काश्मीर में रुई नही होती थी । रुई का वस्त्र भारत के अन्य भागों से काश्मीर में आता था । हेम पादांकित (रा० २ : ३००) मार्तण्ड प्रतिमांकित समुद्रदेव वस्त्रों (रा० १ : २९९) का उल्लेख मिलता है । वे सिंहल से काश्मीर में आते थे ।