भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ३६ ] खान-पान ऋतु तथा जलवायु के अनुसार होता था। सत्तू, कच्चगुच्छ, घृत, मधु, दुग्ध, शाली, गोधूम, तथा विभिन्न अन्नों के पकवान बनते थे। साधारण जनता शाली, शाक, कमल जड़ तथा सस्ती तरकारी खाती थी। ब्राह्मणों के अतिरिक्त जनता आमिष भोजी थी। भूना मांस खाने की प्रथा थी। व्यापारी वर्ग मदिरा का आदी था। पर्वों तथा त्योहारों पर मदिरा पान होता था। मदिरा विक्रय का वर्णन उत्सवों पर मिलता है। हल्की सुरा बर्फ के साथ शीतल कर पी जाती थी। फलों में प्रायः वे सभी फल होते थे जो आज कल वहाँ होते हैं। शहतूत, अनार, बादाम, सेब, खुबानी, सतालू, बम्बू गोशा, नाशपाती, अखरोट खूब मिलते थे। आम का अभाव था। ब्राह्मणों के लिये लहसुन एवं प्याज का प्रयोग वर्जित था। (रा० १ : ३४७) राजकीय चिह्न, छत्र (रा० ३ : ६२) ध्वजा, (रा० ३ : ७७) तथा पार्श्वध्वज (रा० ३ : ७८) थे। राजा मुकुट धारण करते थे। काश्मीर में भुवन रचना लकड़ी तथा पाषाण से होती थी। पाषाण वेश्म का अत्यधिक उल्लेख मिलता है। (रा० १ : ८६) काश्मीर के ध्वंसावशेषों में लगे विशालकाय शिला- खण्डों को देखकर आश्चर्य होता है। उनके उठाने तथा रखने के लिए यन्त्रों का प्रयोग किया जाता था। भवनों के अनेक वर्ग थे। विद्या वेश्म आधुनिक स्कूल एवं कालेजों के समान थे। सौंध (रा० १ : २४६) नाग भवन (रा० १ : २५७) हर्म्य (रा० २ : १३५) गुहागृह (रा० २ : १६५) नदवन (रा० ३ : ११) के निर्माण आदि का उल्लेख मिलता है। राजभवन के अन्तःपुर का नाम शुद्धान्त था, जहाँ रानियां रहती थीं। (रा० ३ : ४३६, ५०६) सार्वजनिक निर्माणकार्यों को बहुत महत्व दिया जाता था। कृषि उपयोगी भूमि, सिंचाई व्यवस्था के लिए कुल्या बनाने का कई स्थलों पर वर्णन किया गया है। सुवर्ण मणि कुल्या (रा० १ : ९७) चन्द्र कुल्या (रा० १ : ३१८) अपगा (रा० १ : ३२९) के अतिरिक्त सेतु एवं बाँध बनाने का उल्लेख मिलता है। जल की गति तथा स्रोतस्विनियों की गति नियन्त्रित करने के लिए सेतु निर्माण किये जाते थे। दामोदर सूद (रा० १ : १५७) गुहसेतु (रा० १ : १५६) पाषाणमय सेतु (रा० १ : १५९) उनके कुछ उदाहरण हैं। ब्राह्मण उपनिवेश : अस्पृश्यता काश्मीर में नहीं थी। जाति-पाँत का बन्धन अत्यन्त शिथिल था। परस्पर विवाह संबंध होते थे। राजाओं ने डोम्ब कन्या तथा वैश्य जाति की महिलाओं से विवाह किये थे। डोम्ब कन्या भी काश्मीर की महारानी हुई है। (रा० ५३८) काश्मीर के सिंहासन को इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न सन्तानों ने सुशोभित किया है। राजा भी काश्मीर में निम्न वर्ग कल्यपाल तक हुए हैं। (रा० ३ : ४८८; ४ : ६७९; ७१६) उनका विवाह भी राजकुलों में हुआ था। ब्राह्मण वर्ग ने निस्सन्देह अपना अभिजात कुल बनाये रखा था। काश्मीर में जाति-पात का बन्धन अत्यन्त कुंचनीय था। प्रत्येक नागरिक समाज का उसी प्रकार अंग था जैसे अन्य। जन्मना वर्ण के आधार पर किसी पर कभी आक्षेप काश्मीर में नहीं किया गया था। उसने सहि- ष्णुता का सर्वदा परिचय दिया है। जो जाति काश्मीर में आयी वह वहीं आत्मसात हो गयी। केवल मुसलमान इसके अपवाद थे। ललितादित्य का तुषार (तुर्क) मन्त्री था। (रा० ४ . २१) गैर काश्मीरी होने के कारण किसी का कभी अविश्वास किया अनादर नहीं किया गया था। मेघवाहन का गुरु स्तोन्पा गैर काश्मीरी था। परन्तु उसके लिए अत्यन्त आदर एवं श्रद्धालु शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है। (रा० १ : १०)

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