राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३७ ] मिहिरकुल हूण था । कनिष्क कुषाण था । किन्तु उनकी जाति के कारण उनसे भेदभाव नहीं किया गया था । कश्मीर के हिन्दू इस दिशा में शेष भारत से जात-बन्धन में कुंचनीय, उदार एवं सहिष्णु थे । इसका कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव था, जो जाति-पाँत एवं वर्णधम में विश्वास नही करता था । ब्राह्मणों में निःसन्देह अपनी जाति के एवं वर्ग के लिए कट्टरता थी । कल्हण काश्मीरी ब्राह्मण था । उसके लिए उसे गर्व था । वह अपना रक्त शुद्ध रखना चाहता था । दूसरे ब्राह्मणों मे भी यही अपेक्षा करता था । काश्मीरी ब्राह्मणों को इस कट्टरता के कारण वहाँ ब्राह्मणो के चार उपनिवेश बन गये थे । राजा मिहिर कुल ने आर्य देशीय ब्राह्मणो को कश्मीर में लाकर आबाद किया था । ( रा० १ : ३१३ ) इसी प्रकार राजा मेघवाहन ने देशीय भिक्षुओं के भोग हेतु अनेक पुण्य कार्यों को किया था । ( रा० ३ : ९ ) कश्मीर में वर्ण-व्यवस्था बौद्ध प्रभाव के कारण लुप्त हो गयी तो राजा जलौक ने कान्यकुब्ज प्रदेश से व्यवहारविद् चातुवर्ण के लोगो को कश्मीर लाकर आबाद किया था । ( रा० १ : ११७ ) कल्हण ब्राह्मणों के चार उपनिवेशों का उल्लेख करता है । राजा गोपादित्य ने आर्य देशीय द्विजों को अग्रहार दानकर गोपादद्रि के मूल में गोप अग्रहार स्थापित किया था । ( रा० १ : ३४१ ) दूसरा उप- निवेश पुण्य देशीय ब्राह्मणों का था । यह वश्विक नामक स्थान मे था । ( रा० १ : ३४३ ) तीसरा उप- निवेश भूक्षीर वाटिका में था । यहाँ पर गोपादित्य ने लहसुन भोजी ब्राह्मणो को समस्त काश्मीर मण्डल से एकत्रित कर उनका एक अलग उपनिवेश बना दिया था । उन्हें समाज से एक प्रकार से बहिष्कृत कर दिया गया था । चौथा ब्राह्मणो का उपनिवेश खासटा स्थान में था । यहाँ पर आचरणहीन ब्राह्मणों को बसाया गया था । ( रा० १ : ३४२-३४५ ) महिलाओं का स्थान : कल्हण ने सती नारियों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा एवं असतियों के प्रति घृणा प्रकट की है । ( रा० १ : २७२, ३००, ३२१ ) काश्मीर में सती प्रथा प्रचलित थी । प्रथम सती रानी वाक्पुष्टा थी । ( रा० २ : ४४, ५५, ५६ ) सती प्रथा को कल्हण प्रोत्साहन नही देता । कालान्तर में यह प्रथा जोर पकड़ गयी और उसका दुरुपयोग होने लगा । ( रा० ५ : २२५७ : १०३, ४७८ ) कल्हण महिलाओं के अधिकार तथा कर्तव्य पर जोर देता है । वह स्त्रियो को जननी मानता है, माता मानता है, प्रकृति का एक अंग मानता है। यह विष्णु की विशेष प्रशंसा इसलिये नहीं करता कि उनका स्वरूप एकांगी है । वह केवल पुरुष शक्ति के प्रतीक हैं। वह अर्धनागेश्वर की सर्वदा वन्दना इसलिए करता है कि ये नर एवं नारी, किंवा पुरुष एवं प्रकृति दोनों के प्रतीक हैं। कल्हण पुरुष एवं स्त्री दोनों का समाज में समान स्थान मानता है । ( रा० ३ : ४४४ ) काश्मीर में महिलाओं ने शासक, अभिभावक एवं रानी के रूप में सिंहासन को सुशोभित किया है । ( रा० १ : ७०-७२ ) कल्हण उन्हें 'प्रजानाम् मातरम्' जैसे आदर एवं पूजनीय शब्दों से सम्बोधित करता हैं। वे जगत् की, राज्य की माता हैं। कल्हण उन्हें पूज्य एवं आदर की दृष्टि से देखता है । (रा० १ : ७३ ) राजा एवं रानी का जहाँ कल्हण ने नाम लिया है वहाँ गौरी-शंकर, राधा-कृष्ण के समान स्त्रियो का नाम पुरुषों के पूर्व रखा है। यह शैली स्त्रियों के प्रति अत्यन्त आदर प्रकट करने के लिए कल्हण ने अपनायी है । ( रा० २ : ११ )