भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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सम्राट् कनिष्क का समय देते समय कल्हण लिखता है कि उस समय भगवान शाक्यसिंह का परि- निर्वाण हुए १५० वर्ष हो गये थे । ( रा० १ : १७२ ) कल्हण की काल गणना इस समय से मिलायी जाय तब भी ऐतिहासिक काल गणना की तुला पर ठीक नहीं उतरती है। कम-से-कम ४०० वर्षों का हेर- फेर उसकी काल-गणना में हो जाता है । कल्हण ने तत्कालीन प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रियों एवं जनश्रुतियों के आधार पर अनुमान से समय दिया है । काल की ओर या तो कल्हण ने ध्यान नहीं दिया है अथवा उसने जो कालक्रम दिया है और अब तक इतिहास से जो बातें सिद्ध होती हैं उनमें क्या दोष एवं त्रुटियाँ हैं यह स्वतः विशेष अनुसंधान का विषय है। कल्हण की काल-गणना के अनुसार और अशोक की मान्यता प्राप्त काल-गणना में शताब्दियों का अन्तर पड़ जाता है । हिरण्य एवं तोरमाण हूण थे परन्तु उन्हें कल्हण ने गोनन्द की वंशावली से जोड़ा है । आश्चर्य है । कल्हण को ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान था । उसने अपने अध्ययन के स्थान-स्थान पर ज्योतिष सिद्धान्तों एवं काल गणना का उल्लेख किया है । तथापि उसकी काल गणना कैसे त्रुटिपूर्ण रह गयी है इस पर अध्ययन अपेक्षित है। उक्त दोष के होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संस्कृत साहित्य में कल्हण ने महाभारत काल से सुसंगत इतिहास उपस्थित किया है । राजतरंगिणी : राजतरंगिणी के तरंगों का तीन वर्गों में वर्गीकरण किया जा सकता है । श्री स्टीन ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग चार तथा तृतीय वर्ग में पाँच, छ, सात एवं आठ रखा है । श्री डाक्टर ए० एल० बैशम ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच, छ तथा तृतीय वर्ग में सात एवं आठ रखा है । श्री स्टीन का वर्गीकरण काल गणणानुसार है । चतुर्थ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण की काल गणना क्रमबद्ध होती है । तरंग पंचम एवं षष्ठ का भाग गाथा एवं ऐतिहासिक दोनों कालों का मिश्रण है । सातवें तथा आठवें तरंग की काल गणना सुनिश्चित है । श्री बैशम ने वर्गीकरण ऐतिहासिक तथ्य पर किया है । प्रथम वर्ग को वे परम्परा पर आधारित इतिहास कहते हैं । कल्हण ने इस काल के लिए कोई साक्ष्य उप- स्थित नहीं किया है कि किस आधार पर उसका वर्णन सत्य माना जाय ! कल्हण ने कश्मीर के इतिहास का जिससे महाभारत से किंचित् मात्र सम्बन्ध नहीं है गौरवपूर्ण पौराणिक घटनाओं के काल्पनिक समय से सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है । श्री बैशम द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच तथा छ अर्थात् कर्कोट एवं उत्पल वंश रखते हैं । इसे कल्हण ने पूर्वकालीन इतिहासकारों के आधार पर लिखा है, जो घटनाओं अथवा राजाओं के समकालीन थे । तृतीय वर्ग में श्री बैशम ने सप्तम तथा अष्टम तरंग रखा है । जिसका ज्ञान उसे प्रत्यक्षदर्शियों से प्राप्त हुआ था । तरंग आठ का वह स्वयं प्रत्यक्षदर्शी था । दोनों ही वर्गीकरण काल एवं प्रमाण की दृष्टि से उचित प्रतीत होते हैं । प्रथम तीन तरंग इस समय प्रतिपाद्य विषय हैं । सर्वश्री स्टीन तथा बैशम दोनों एक मत हैं कि यह काल गाथा कालीन है । तरंग चार में पूर्वार्द्ध की अपेक्षा उत्तरार्द्ध में इतिहास की झलक अधिक मिलती है । तरंग पाँच से इतिहास वर्णन आरम्भ होता है । यह काल राजा अवन्ति वर्मा ( सन् ८५५-८५६ ई० ) के समय से आरम्भ होता है । प्रथम तीन तरंग ऐतिहासिक सामग्री न होने के कारण छोटे हैं । परम्परा एवं जनश्रुतियों पर आधारित हैं । कुछ पौराणिक गाथाओ पर आधारित हैं, और कुछ काल्पनिक हैं ।