राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४४ ]
एवं अवसान के साथ ही साथ मुख्य घटनाओं का लौकिक सम्वत् देना आरम्भ करता है। तरंग सप्तम एवं अष्टम् की काल गणना सर्वथा ठीक है। कल्हण शक सम्वत् १०७० तदनुसार लौकिक सम्वत् ४२२४ देता है। इससे लौकिक तथा शक सम्वत् की गणना मिल जाती है। आधुनिक सिद्धान्त है कि सप्तर्षि चलते नही। कल्हण कहता है कि युधिष्ठिर के शासन काल में मुनि मघा नक्षत्र पर थे। सप्तर्षि एक शत वर्ष में मघा नक्षत्र पर आते हैं। (रा० १ : ५३-५६) यह स्वतः अध्ययन एवं अनुसन्धान का विषय है। कल्हण अपने इतिहास की रचना महाभारत कालीन गोनन्द प्रथम के समय से आरम्भ करता है। कल्हण ने कलि तथा लौकिक सम्वतों का प्रयोग किया है। मालूम होता है कि कल्हण ने अपनी काल गणना सुनिश्चित एवं स्थिर करने के लिए महाभारत काल अपनी काल सीमा ग्रन्थ प्रारम्भ करने के लिए निर्धारित कर लिया था। महाभारत के पूर्व काश्मीर में क्या सम्वत् प्रचलित था पता नही चलता। कल्हण के समय में कलि, लौकिक एवं शक तीनों सम्वत् प्रचलित थे। लौकिक सम्वत् को आधार मानकर वह काल-क्रमानुसार इतिहास रचना आरम्भ करता है। एक मत है कि द्वापर के अन्त में महाभारत हुआ था। दूसरा मत है कि कलियुग के ६५३ वर्ष पश्चात् महाभारत हुआ था। कलि सम्वत् के २५ वर्ष पश्चात् लौकिक सम्वत् आरम्भ होता है। पुराकालीन लेखकों में कल्हण एक ऐसा महाकाव्यकार है जिसने राजाओं एवं घटनाओं के इतिवृत्त के साथ सम्वत् वर्ष, मास एवं दिन दिया है। रामायण एवं महाभारत में संवत्सरों का प्रयोग नही किया गया है। कल्हण का इस दिशा में भारतीय ही नही विश्व के इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। शामी अर्थात् सेमेटिक जाति इतिहास लिखने में निपुण मानी गयी है। परन्तु बाइबिल में जहाँ राजाओं का उल्लेख किया गया है, वंशावली दी गयी है। वहाँ भी काल गणना नहीं की गयी है। राजतरंगिणी का इतिहास गोनन्द प्रथम से आरम्भ होता है। इस समय से कल्हण क्रमबद्ध इतिहास लिखता है। कलि सम्वत् ६५३ तदनुसार लौकिक सम्वत् ६२८ होता है। गोनन्द प्रथम से अभिमन्यु प्रथम का राज्य काल १२६६ वर्ष अर्थात् लौकिक सम्वत् ६२८ से १८६४ वर्ष तक होता है। इस काल में ३५ लुप्त राजाओं के अतिरिक्त कल्हण ५७ राजाओं का नाम तथा इतिहास देता है। गोनन्द वंश में गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर तक का राज्य काल १००२ वर्ष कल्हण देता है। वह समय १८६४ से २८६६ लौकिक सम्वत् वर्ष होता है। इस काल में २१ राजाओं के इतिहास का संक्षिप्त उल्लेख राजतरंगिणी में मिलता है। द्वितीय तरंग में ६ राजाओं का इतिहास है। उनका राज्य काल १९२ वर्ष आता है। यह लौकिक सम्वत् २८९६ से ३०८८ तक होता है। तृतीय तरंग में १० राजाओं का इतिहास है। उनका राज्य काल लौकिक सम्वत् ३०८८ से ३६७७ मध्य तक ५८६ वर्ष १० मास १ दिन होता है। इससे केवल राजा रणादित्य का ही राज्य काल ३०० वर्ष दिया है जो स्पष्ट त्रुटिपूर्ण है। चौथे तरंग कर्कोट वंश का काल लौकिक सम्वत् ३६७७ से ३९३१ अर्थात् २५४ वर्ष पांच मास सत्ताइस दिन होता है। पंचम तरंग उत्पल वंश का आरम्भ राजा अवन्ति वर्मा लौकिक सम्वत् ३९३१ से होता है। इस वंश के १५ राजाओं में ६ राजाओं के राज्याभिषेक का मास तथा दिन देता है। उनमें पाँच राजाओं का सम्मिलित राज्य काल मिलाकर पांच वर्ष से अधिक नहीं होता। इस प्रकार पंचम, षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम तरंग के राजाओं का वर्ष, दिन मास तक देकर वह अपनी काल गणना सिद्ध करता है।