भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ४३ ] कल्हण ने यह महाकाव्य विशेष रूप से अपने समकालीन जनों के लिए लिखा था। इसीलिये कुछ स्थलों पर उसने नवीन पात्रों का प्रवेश लम्बे षड्यन्त्र, विद्रोहादि का चित्रण बिना उचित पृष्ठभूमि के कर दिया है। ऐसे स्थलो को बिना पूर्वापर का ज्ञान हुये, समझने में कठिनता होती है। कल्हण का यह इतिहासात्मक काव्य साधारण जनता की अपेक्षा संस्कृत के विद्वानों एवं पण्डितों के लिए विशेषतः लिखा गया था। कल्हण भूतकाल का सुस्पष्ट वर्णन करता है। उसने भविष्य के इतिहास-लेखक एवं विचारकों के लिए उपदेशक का कार्य किया है। कल्हण स्वयं स्वीकार करता है कि उसने विचित्र घटनाओं का विस्तृत समावेश कथा-विस्तार के कारण न कर यत्र-तत्र रुचिकर कथानकों को लिखा है। (रा० १ : ६) राजतरंगिणी राजकथा महा- काव्य है, इसमें रोचक, विचित्र तथा चमत्कारिक कथाओं का समावेश किया गया है। इस खण्ड में वर्णित रोचक कथानक है—नाग भार वहन (रा० १ : ११४) घटेश्वर लिंग (रा० १ : १९४) सुधवा नागकन्या (रा० १ : २०७) ब्राह्मण बालक (रा० ३ : ६३) भ्रमर वासिनी (रा० ३ : ३९४) रणारम्भा (रा० : : ४३१) गिरिसुता विवाह (३ : ४४३) और रावण पूजित लिंग (रा० ३ : ४४७)। पौराणिक शैली पर वर्णित कथायें—दैत्य रमणियो से भोग (रा० ३ : ४६९) जलभेदन (रा० ३. ४५८) नागों की अलौकिक शक्ति (रा० १ : २५८) है। चमत्कारिक कथायें—वितस्तावतरण (रा० १ . १६०-१६६) चन्द्रावती का शिला हटाना (रा० १ : ३२१) सूखा में भी वृक्षों का हरित होना, (रा० २ : १५) गतप्राण कपोत पात (रा० २ : ५०) सन्धि मति का पुनरुत्थान (रा० २ : १०५) समुद्र स्तम्भन (रा० ३ : ६९) रणस्वामी, रणेश्वर स्थापना (रा० ३ : ४५७) है। विचित्र कथायें—रणा- रम्भा का भ्रमरी रूप धारण (रा० ३ : ४३८) गर्भ मण्डूक (रा० ३ : ४४२) खेचरो का स्मरण (रा० ३ : ४५०) है। चमत्कार, विचित्र एवं रोचक मिश्रित कथायें—नाग द्वारा हिम वर्षा ! (रा० १ : १७९) अश्व पर पाणि प्रहार (रा० १ : २४६) नगर सहित राजा का नाश (रा० १ : २५६) पाषाण वृष्टि (रा० १ : २६५) वरुण आगमन (रा० ३ : ५२) तल्प पर स्त्री स्वरूप बना देना आदि (रा० ३ : ४३८) हैं। कथानकों के कारण राजतरंगिणी महाकाव्य के साथ सामान्य जनता के लिए भी रुचिकर, मनोरंजन- सामग्री बन गयी है। कल्हण ने काव्य को सर्वप्रिय बनाने के लिए ग्रन्थ में अलौकिक कथाओं के अतिरिक्त अन्य कथाओं का भी समावेश किया है। उनमें नाग-मेघ (रा० ३ : २१) कामिनी स्त्री (रा० ३ : ५०१) काम संगम ज्ञान (रा० ३ : ५०८) नारी भर्त्सना (रा० ३ : ५०१-५२१) तथा वैराग्य (रा० ३ . ५२५) आदि है। काल गणना : कल्हण की काल गणना एक समस्या है। अनेक विद्वानों ने उसे सुलझाने का प्रयास गत शताब्दी के प्रारम्भ से किया है। सर्वश्री विल्सन, कनिंघम, स्टोन, ट्रायेर, एस० पी० पण्डित आदि ने हल निकालने का स्तुत्य प्रयास किया है। परन्तु अभी तक सफलता नही मिली है। मैने काशी में विद्वानों से निकट सम्पर्क स्थापित किया। परन्तु किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका। तरंग प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा कुछ तरंग चतुर्थ की गणना त्रुटिपूर्ण है। चतुर्थ तरंग में जयापीड के पश्चात् काल गणना सुधरती दिखायी देती है। जयापीड का समय लौकिक सम्वत् ३८७९ तथा कल्हण का समय लौकिक सम्वत् ४२२५ अर्थात् सन् ११४६-११५० है। तरंग पंचम और षष्ठ की काल गणना के साथ घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन है। षष्ठ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण को काल गणना ठीक होने लगी है। वह राजाओ का अभिषेक