भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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युग लाना था, जन-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना था, राजाओं का सुधार करना था, उन्हें जन-जीवन से मिला देना था । कल्हण की रचना में सहज सौन्दर्य है, जिसका विल्हण की रचना में अभाव खटकता है । ठीक कहा गया है कि कल्हण ने अपने काव्य दर्पण को इतना निर्मल, स्वच्छ एवं रमणीय रखा है कि उसमें विल्हण की प्रौढ़ शैली सद्यः प्रतिबिम्बित होतो है । कल्हण की शैली सौन्दर्य पूर्ण है। प्रकृति का उसमें प्राकृ- तिक चित्रण है। यह चित्रांकन सुश्लिष्ट है । (रा० ८ : ३१६१-६२, १३३४-१३३८) चरित्र चित्रण में कल्हण ने क्षमता का परिचय दिया है । आलोच्य स्थान पर निष्पक्ष आलोचना की है । जनजीवन से सम्पर्क बनाये रखा है । किसी के स्नेह एवं घृणा से अपने को दूर रखा है। एक स्थेय तुल्य वह चरित्र चित्रण करता है। उसका यह चित्रण, जलोक, मिहिरकुल, हर्ष, कलश, सन्धिमति, दिद्दा एवं देवी वाक्पुष्टा में निखर उठा है । उसके काव्य में वैदिक, बौद्ध एवं संस्कृत महान रचनाकारों की संवाद-परिसंवाद शैली का दर्शन मिलता है। (रा० ३ : १६१, १८३ : ७ : ४२३, १२८१, १४१६, १३- ८६; ८ : २६१३, ३२१६) काव्य के माध्यम से कल्हण ने इतिहास लिखा है । (रा० १ : ६) उसने इतिहास एवं काव्यकार को मिला दिया है । उसने कथावस्तु के विस्तार के कारण अलंकार की विचित्रता का अनेक स्थलों पर प्रयोग नहीं किया है। युधिष्ठिर का राज्य त्याग, जयापीड का अन्त, चक्र वर्मन का प्रवेश, अनन्त की शव यात्रा, राजा हर्ष का राज्य त्याग, हर्ष का अन्तिम काल, सुस्सल का श्रीनगर आगमन एवं भिक्षाचर का अन्तिम युद्ध इसके उदाहरण हैं। (रा० १ : ३६६; ४ : ६४०; ५ : ३४१; ७ : ४६१; १६००-१७१४; ८ : ९४७, १७४०) कल्हण के पदों में संस्कृत-गद्य का रस मिलता है। पद्यात्मक होते भी कही-कही गद्यात्मक शैली हो गयी है। उसकी कथनात्मक शैली अत्यन्त नाटकीय एवं सशक्त है । राजा जयापीड का अन्त एवं वार्ता- लाप नाटकीय शैली का उदाहरण है। ( रा० ४ : ६४० ) ऐतिहासिक काव्य को नीरसता से बचाने के लिये कल्हण ने अलंकार, व्यंग तथा उक्तियों का आश्रय लिया है। उसके अधिकांश रूपक मौलिक हैं, संस्कृत साहित्य को उसकी देन हैं। (रा० ६ : २०१, ७ : १०६६, १२२४, ८ : १३४, २५८६, २६३५, २५२०, २५६०, २७४७) महाकाव्य राज तरंगिणी में दुस्सह स्थल भी है। दुरुहताओं एवं जटिलताओ का कुछ कारण शैलीगत भी है । जैसे दुर्लभ लौकिक एवं अप्रचलित शब्दों का प्रयोग है । काव्यात्मक सन्दिग्धता ऐसे स्थलो पर बढ़ गयी है । ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध में जटिल राजनीतिक परिस्थितियों तथा उनके वर्णन में इस प्रकार के स्थल मिलेंगे । उसने राज कुचक्र, दरबारी जीवन, घटनाओ के वर्णन का जितना प्रयास किया है, उतना ही उन स्थलों पर उसके अभिप्राय को समझना कठिन हो गया है । ऐसे स्थल अलंकृत काव्य शैली में वर्णित है । सप्तम तथा अष्टम तरंग में ऐसे स्थल बहुत मिलते हैं । कारण स्पष्ट है । उन में उल्लिखित व्यक्ति या तो उस समय जीवित थे अथवा कुछ ही वर्ष पूर्व दिवंगत हो चुके थे, जिन्हें लोग उनकी जीवन घटनाओ के साथ जानते थे । कल्हण ने इन स्थलो पर व्यंगात्मक शैली का आश्रय लिया है। (रा० ३ : १८१, ४ : ६१५-६३७, ७ : ११२३) पुनरुक्ति दोष से अपने काव्य को बचाने का प्रयास कल्हण ने किया है । तथापि भूल से कहीं-कही पुनरुक्तिया आ गयी है। ग्रन्थ के अन्तिम चरण के छन्द उच्चकोटि के नही हैं । उनमें साधारण पुनरुक्तियाँ परिलक्षित होती हैं । स्थान-स्थान पर पाठकों का शैथिल्य दूर करने के लिए अलंकृत एवं आकर्षक पदों की रचना की गयी है ।