राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४१ ] अलंकारों के प्रयोग में उसने संयम का परिचय दिया है, नियन्त्रण रखा है । गुणहीन पदावलियों से वह विरत रहा है। किस अवसर पर, किस प्रकार, किस अलंकार को उत्कृष्टतापूर्वक एक कुशल कवि के समान प्रयोग करना चाहिये, इसमें उसने अधिक कुशलता प्राप्त की है। उसने विषयानुसार भाषा एवं छन्दो का प्रयोग किया है। शृङ्गार वर्णन में, ऋतु वर्णन में, उसने प्रकृति के साथ मानव-प्रकृति को मिलाते हुए; आध्यात्म एवं दर्शन का अद्भुत समन्वय किया है। ( रा० १ : ६, २८, २०६; ३ : ४१४, ५ : ३४३, ३६१; ७ : ९२८, १५५७; ८ : ८४२, ६४७, १३३४ ) कल्हण लौकिक वर्णन करता है। काश्मीर के बाहर का वर्णन उसने केवल ऐतिहासिक घटनाओं की शृङ्खला को विशृङ्खलित न होने देने के लिये किया है। लौकिक वर्णन होते भी उसका काव्य कहीं एक सुरा नहीं होने पाया है। उसने अलंकारों की पुनरावृत्ति नहीं की है। यदि वही अलंकार पुनः आता है, तो कुछ दूसरा ही रूप धर कर । इसलिये उसके काव्य का प्रत्येक चरण, प्रत्येक पद ताजी हवा की तरह सर्वदा स्फूर्तिमय, प्राणमय रहता है। काव्य अलंकारमय होते हुए भी अलंकारों से बोझिल नहीं है। अलंकारों का उपयोग वर्ण्य विषय को सुस्पष्ट तथा उसमें और बल लाने के उद्देश्य से किया गया है। अस्पष्टता का नितरा अभाव है। पदों में, शब्द गठन में, गतिशीलता है। वे अत्यन्त संक्षिप्त न होकर सरल एवं वर्णनात्मक हैं। उनमें सौन्दर्य एवं कला का प्रभाव चिर नूतन, निर्मल, अवलान्त, स्रोत जल कण तुल्य हैं। वह भ्रान्त मन, म्लिन मन, उदास मन में स्फूर्ति उत्पन्न करता है ! पुरातन कवि काव्य-परम्परा का अनुकरण करता, आरम्भ एवं अन्त में छन्द बदल देता है। महा- काव्यों का यह लक्षण है। अन्त में छन्द का परिवर्तन कर देना चाहिये। दृश्य, रस एवं घटनाओं के अनुरूप कल्हण छन्द बदल देता है। महाकवि बाण तथा बिल्हण में यत्र-तत्र प्राप्त होती कृत्रिमता का किसी स्थल पर बोध नहीं होता । उसने लम्बे-लम्बे समासों में जैसे तरंगों को बाँध रखा है। कल्हण की दृष्टि निरपेक्ष है। उसे आलोचनात्मक प्रखर बुद्धि प्राप्त थी । किन्तु उसने राग-द्वेष रहित होकर, ग्रन्थ-रचना की है। कल्हण जैसा इतिहासकार अठारहवीं शताब्दी के पूर्व विश्व में नहीं हुआ है। उसके समस्त काव्य में शान्त रस की धारा प्रवाहित होती, पाठक के मानस को शान्त करती है। उसके काव्य में वही स्फूर्ति दिखायी देती है, जो वाल्मीकि की रामायण एवं व्यास के महाभारत में है। उसके पदों में क्षण-क्षण नवीनता, मौलिकता प्रवेश करती रहती है। बाण का हर्ष चरित, विल्हण का विक्रमांक देव चरित, राजाश्रय में पूषित काव्य है। कल्हण का काव्य एक स्वतंत्र चिन्तक का काव्य है जिसे उसने देश-भक्ति की भावना से प्रेरित होकर लिपिबद्ध किया था । उसके काव्य का प्रयोजन किसी राजा, किसी दाता को प्रसन्न करना नहीं था। किसी राजसभा में, किसी प्रासाद में बैठकर उसने चिन्तन नहीं किया था। उसकी कल्पना, उसका चिन्तन श्रीनगर से दूर, राज्या- श्रय से दूर, राज छाया से दूर, परिहास की प्राकृतिक सुषमा में, अपने घर में, अपने ही साधनों से, अपने अर्जित धन से, जीवन यापन करते लिखी गयी जगत की, सरस्वती के एक एकान्त उपासक, स्वावलम्बी मानव की स्वाभिमानी मानव की रचना है। कालिदास, भवभूति, विल्हण, बान सदृशो राज्याश्रय प्राप्त था। सबने राज्यान्न खाकर काव्य रचना की थी । कल्हण एक मात्र महान काव्यकार है, जो राजान्न द्वारा वर्धित नहीं हुआ था। इस दिशा में वह कालिदास आदि से बहुत आगे है। उसका उद्देश्य अपने देश में सर्व ६