राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके चांचल्य की निन्दा है। जहाँ नारी जाति के कारण उत्तम कार्य हुये हैं वहाँ कल्हण ने उनकी प्रशंसा की है। कितने ही स्थानों पर नारी का चित्रण बड़ा ही मार्मिक हो गया है। राजा युधिष्ठिर के देश त्याग करते समय नारी की मनोभावनाओं का अत्यन्त कारुण्यपूर्ण दृश्य खींचा है। (रा० १ : ३६७-३७३) महाकाव्य : महाकवि कालिदास ने रघुवंश में राजा दिलीप से प्रारम्भ कर रघुवंश के समस्त राजाओं का क्रमशः वर्णन कर सुन्दर महाकाव्य प्रस्तुत किया है। यही बात कल्हण के इस महाकाव्य के विषय में कही जायगी। दोनों में अन्तर इतना ही है कि रघुवंश एक वंश का और राजतरंगिणी एक देश के कई वंशों का वर्णन करती है। यह बहुनायक महाकाव्य है। महाकाव्य के प्रायः सभी लक्षण इस काव्य में मिलते हैं। शान्त रस इसका अंगी रस है। अन्य रस अंग्यभूत होकर आये हैं। काव्य का नाम सारगर्भित होना चाहिए। कल्हण ने राजतरंगिणी नाम रखा है। यह युक्तिपूर्ण है। तरंगों का आवागमन कभी समाप्त नहीं होता। राजा भी सागर की तरंगों के तुल्य आते-जाते रहते हैं, उठते-गिरते रहते हैं। तरंगें कभी उत्ताल होती हैं, कभी गर्जन करती हैं और कभी शान्त हो जाती हैं। यही दशा राजाओं की है। काव्य के सभी गुण, रस, अलंकार, छन्द, पद लालित्य का समावेश इस उत्कृष्ट महाकाव्य में हो गया है। कल्हण अपने काव्य में केवल कल्पना पर उड़ा नहीं है। वह उस पंछी की तरह नहीं उड़ता, जो डार-डार, पात-पात उठता-बैठता रहता है। वह अनन्त में, ओर-छोर हीन विश्व में, कल्पनामय जगत में अनायास नहीं उड़ता। वह इस जगत में, इस लोक में, साशय उड़ान लेता है। उसने काव्यमय इतिहास में कल्पना के स्थान पर लौकिक घटनाओं का निबन्धन किया है (रा० १ : ४६, ४७) उसके पद में लालित्य से आरम्भ होता है। उसमें सरलता है। प्रचलित शब्दों का प्रयोग है। वह जैसे-जैसे रचना करता अग्रसर होता है, उसके काव्य में सरलता लुप्त होने लगती है। अप्रचलित शब्दों की प्रचुरता बढ़ जाती है। यह सरल, हृदय कवि था। उदार था। उसके हृदयस्थल में कवियों के लिए आदर था। कवि उत्तम रचना करता है। दुष्टल वर्णन नहीं करता इसे उसने बलवती भाषा में लिखा है। (रा० १ : ३, ४, ५, ४५-४७) प्रसंग आते ही काश्मीर के कवियों का और भारत के अन्य प्रदेशों के कवियों का नाम आदर के साथ लिया है। उसने अनेक राजाओं, उनके समय में हुए कवियों, उनके काव्यों, तत्कालीन विद्वानों, दार्श- निकों का वर्णन उनके अनुरूप आदर के साथ किया है। उसने भारत एवं काश्मीर की परिस्थितियों का अध्ययन किया, उनके रचना-काल का निर्णय किया और उन्हें यथास्थान रखकर काश्मीर के साहित्यिक इतिहास के साथ राजनीतिक इतिहास को प्रस्तुत किया है। (रा० १ : १७८; २ : १६; ४ : १४४, ४४८, ४९५, ७०५, ५ : २८-३२; २०४) राजतरंगिणी के रूप में कल्हण कोरे इतिहास के स्थान पर एक सुन्दर महाकाव्य उपस्थित करता है। रसों का सुन्दर परिपाक होने के कारण पाठक उसे पढ़ता क्लान्त नहीं होता। उसके वर्णन में नवीनता प्राप्त होती है। अलंकारों की छटा यथावसर देखने को मिलती है। उपमा एवं अलंकारों का प्रयोग ठीक लगता है। पाठक उनमें नवीनता एवं मौलिकता का बोध करके काव्य-वीथियों में रमता है। उसने उपमाओं को शब्द-जाल में लपेट कर, सुन्दर किन्तु प्रानहीन पदों में पाठक को नहीं उलझाया है। उसने यथाशक्ति इस महाकाव्य में आख्यान एवं नवीन विचार रखने की शैली का अनुकरण किया है। (रा० ३ : ४१६)