भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ४७ ] यी थी कि राजविप्लव होगा। आक्रमणों के कारण व्यवस्था एवं राज-परम्परा अस्त-व्यस्त हो जायगी हिन्दुस्तान में भारतीय धर्म के स्थान पर अन्य विदेशी धर्मों का प्राबल्य हो जायगा। उस समय इतिहास लिखकर पूर्वकाल की स्मृति को सुरक्षित रखने का विचार नहीं उठा था। यूनानी नगर राष्ट्र सर्वदा संघर्षशील थे। रोम का इतिहास सैनिक अभियानों का इतिहास है। अतएव पश्चिम में इतिहास रखने एवं लिखने की विशेष रुचि हुई थी। कह सकते हैं, पश्चिम में नव- जागरण के कारण आयी आधुनिकता से पूर्व कल्हण जैसा प्रतिभाशाली महान् ऐतिहासिक विश्व साहित्य में अन्यत्र भी दुर्लभ है। उसे निःसन्देह पोलाइबियस तथा थुसाडाइड की पंक्ति में गौरव पूर्वक बैठाया जा सकता है। कल्हण के उद्धरणों से प्रतीत होता है कि काश्मीर में इतिहास लिखने की परम्परा प्राचीन-काल से प्रचलित थी। यह परम्परा भारत के अन्य स्थानों में नहीं मिलती। काश्मीर ने अपनी एकाकी भौगोलिक स्थिति के कारण अपना एक अलग व्यक्तित्व एवं चरित्र विकसित कर लिया था। अपने देश के गौरव तथा इतिहास को लिपिबद्ध करने की भावना सर्वदा काश्मीर में जागरूक थी। इसका एक और कारण हो सकता है। काश्मीर की सीमा पर लड़ाकू विदेशी राष्ट्र थे। काश्मीर का सम्बन्ध अन्य देशों से था। उनमें इतिहास लिखने और रखने की भावना भारत की अपेक्षा अधिक जागरूक थी। सेमेटिक अर्थात् सामी जाति के प्रभाव से प्रभावित होना असम्भव बात नहीं थी। अतएव काश्मीरियों ने भी अपने देश में इतिहास लिखने की कल्पना की। काश्मीर में संस्कृत साहित्य का यह एक मात्र इतिहास शेष रह गया था। जब कि मुसलिम काल में सभी कुछ नष्ट कर दिया गया था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अस्तित्व गत शताब्दी के पूर्व विश्व नहीं जानता था। किन्तु राजतरंगिणी का अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद उसके अस्तित्व काल से ही आरम्भ हो गया था। उसके अस्तित्व से लोग परिचित थे। फिरदौसी के शाहनामा की तरह राजतरंगिणी गाथादि का संकलन मात्र नहीं है। काश्मीर के हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपने पूर्वजों का इतिहास होने के कारण गर्व था और है। राजतरंगिणी के अध्ययन का इतिहास : सन् ११५० ई० से अबतक राजतरंगिणी के लगभग ४९ अनुवादों तथा संस्करणों का पता लग सका है। ऐसी कोई शताब्दी नहीं व्यतीत हुई है, जिसमें तरं- गिणी का कोई न कोई संस्करण अनुवाद अथवा प्रतिलिपि न की गयी हो। सन् ११५० से १३३९ ई० का मध्यवर्ती काल काश्मीर का अत्यन्त संघर्षमय समय रहा है। उस समय यदि राजतरंगिणी पर कुछ लिखा भी गया होगा तो पुरानी पुस्तकों के नष्ट करने तथा फूंकने के उन्माद में सिकन्दर बुत शिकन के समय में अपना अस्तित्व लुप्त कर चुका है। सन् १३३९ ई० में मुसलिम शासन काश्मीर में स्थापित हुआ। उस समय से जैनुल आब्दीन के काल सन् १४४६ ई० तक का समय काश्मीर के लिए अत्यन्त उथल-पथल का रहा है। काश्मीर की जनता केवल ११ घरों को छोड़कर मुसलिम धर्म स्वीकार कर चुकी थी। मन्दिर, मठ, जनाथय, शाला, विद्या वेश्म तथा विहार ध्वंशावशेष रह गये थे। पुस्तकें नष्ट की जा चुकी थी। जैनुल आब्दीन (सन् १४४६-१४७२ ई०) के समय श्री जोनराज ने कल्हण के कार्य को अपने समय तक लाकर अपनी राजतरंगिणी लिखी। जोनराज के पूर्व अथवा उसका समकालीन मुल्ला अहमद था। उसने जैनुल आब्दीन के आदेश