भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

[ ४६ ]

जैसे-जैसे तृतीय तरंग के पश्चात् कल्हण लिखता बढ़ता गया है वैसे-वैसे उसका इतिहास प्रामाणिक होता गया है । प्रथम तीन तरंगों का वर्णन अस्पष्ट है । प्रणय कथानकों, असम्भव तिथियों एवं पौराणिक नामों को निःसंकोच कल्हण ने लिया है । धार्मिक प्रवृत्ति होने के कारण पुराणों तथा उसकी गाथाओं में कल्हण का अन्ध विश्वास था । पुराना विश्वास है कि काल अर्थात् कलि का काल द्वापर युग में लागू नहीं होता । अतएव कल्हण ने काल भी कलियुग के समय से आरम्भ किया है । कल्हण की शैली वैज्ञानिक है। उसने अनुसंधान अर्थ ग्राह्य सामग्रियों को संग्रह कर अपना विचार एक स्फेयर की तरह स्वयं निश्चित किया है । ऐतिहासिक निष्कर्षों को उपस्थित करने में अपनी कला का अद्भुत परिचय दिया है । कल्हण पर पौराणिक प्रभाव होने का आक्षेप विद्वन् करते हैं । परन्तु यूनान जैसे देश में हिरोडोटस तथा थूसाडाइम के अनुसार उस युग में भी जो यहाँ का स्वर्ण युग था, रण अभियान सूर्य तथा चन्द्र की स्थिति से नियन्त्रित होता था । ग्रहण के कारण पोलो पेनिशियन युद्ध में यूनानी असफल हो गये थे । एनक्सा गोरस को एथेन्स की साधारण सभा ने इसलिये मृत्यु दण्ड दिया था कि सूर्य तथा चन्द्रमा यूनानी कवियों की दृष्टि में देवता थे । ज्योतिष ज्ञान का प्रचार वजित था । सुकरात को इसलिये मृत्युदण्ड दिया गया था कि वह देवी-देवताओं की पूजा में विश्वास न कर बुद्धिवादी था । कल्हण ने सम्राट् अशोक एवं कनिष्क जैसे महान् व्यक्तियों का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन किया है । इस प्रकार हविष्क एवं जुविष्क का वर्णन किया गया है। इतिहास एवं पुराण में जैसे अन्तर नहीं किया गया है । प्रारम्भिक वर्णन इतिहास की दृष्टि से अशुद्ध, अविश्वसनीय, कल्पना तथा जन-श्रुतियों पर आधारित है । वह पुराण तुल्य पौराणिक शैली से लिया लगता है। इसमें कल्हण का दोष नहीं है। उसने रामायण, महाभारत तथा पुराणों से सामग्रियां एकत्रित कर, काश्मीर के इतिहास को काल क्रमानुसार क्रमबद्ध करने का स्तुत्य प्रयास किया है । साहित्यिक दृष्टि से इस काल में निहित वर्णन उपमा, अलंकार, विचित्र एवं रोचक घटनाओं के संग्रह लगेंगे । वाण के हर्ष चरित के समान कल्हण ने भी दुर्लभ शब्दो का प्रयोग किया है । तथापि किसी प्रकार के इतिहास के अभाव में कल्हण की राजतरंगिणी काश्मीर का आदर्श इतिहास हो गयी है । यह अनुपम कृति है। दोषपूर्ण वास्तविक वैज्ञानिक इतिहास लिखने का यह अपनी शैली का प्रथम प्रयास भारत में कहा जायगा । अनेक दोषों के होते हुए प्राचीन जगत इतिहास का आदर करने में पीछे नहीं था । भारतीय रचना- कारों ने इतिहास-रचना की परम्परा स्थापित की थी । उनकी शैली तथा विचार अपना था । कल्हण की रचना शैली से यह स्पष्ट प्रतीत होता है । समुद्र का ज्ञान भारतीयों के ऐतिहासिक ज्ञान का परिचायक है, उसे पुरातन भारतीय जान चुके थे । कल्हण समुद्र का बहुत वर्णन करता है । भारतीयों की श्रेष्ठता अन्य दिशाओं में बहुत बढ गयी थी । यदि उसका कोई अपवाद है तो कल्हण के आधार पर कहा जा सकता है कि आधुनिक युग है ! पुरातन भारतीयों में सच्चे इतिहास का नितान्त अभाव नही था । उनके दृष्टिकोण एवं बौद्धिक विकास में दोष नही था । भारत के इतिहास के अभाव में राज तरंगिणी को स्थानीय, लौकिक किंवा प्रदेशीय इतिहास कह सकते हैं । भारतीय प्रवृत्ति की यह विशेषता है कि वह आध्यात्म की ओर अधिक झुकी थी । कहा जाता है, विदेशी आक्रमणों के कारण राष्ट्रीय भावनायें उमड़ती हैं और शक्तिशाली इतिहास लिखने के लिए अनुप्राणित करती हैं । भारत पर सिकन्दर के पूर्व विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था। कभी कल्पना नही की