भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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द्वितीय तरंग ४१३ प्रोतशूले श्रुते तस्मिन् शोकशङ्कोर्महीपतेः । निरगाद्रोगभग्नस्य पूर्वं पश्चात्तु जीवितम् ॥ ८० ॥ ८०. उसे शूल विद्ध हुआ सुनने पर रोग से भग्न महीपाल का शोक शंकु ( शूल ) पहले और बाद में प्राण निकल गया । सप्तत्रिंशतिवर्षेषु यातेष्वस्मिन्निरन्वये । प्रशान्तभूमिपालाऽभूत्कतिचिद्दिवसानि भूः ॥ ८१ ॥ ८१. वंश हीन उस राजा के सैतीस वर्ष बीत जानेपर कुछ दिनों तक यह पृथिवी भूमि- पाल रहित हो गयी थी । अथ संन्धिमतिं बुद्ध्वा तथा व्यापादितं गुरोः । ईशानाख्यस्य हृदयं विवशं वशिनोऽप्यभूत् ॥ ८२ ॥ ८२. सन्धिमति को उस प्रकार व्यापादित ( मारा गया ) जानकर, जितेन्द्रिय भी गुरु ईशान का हृदय विवश हो गया । शिरीष इव संसारे सुखोच्छेद्ये मनीषिणाम् । हन्ताऽऽनृशंस्यं तद्वृन्तमिवैकमवशिष्यते ॥ ८३ ॥ ८३. शिरीष पुष्प सदृश सरलता पूर्वक नष्ट होने वाले, इस संसार में खेद है । मनिषियों की क्रूरता ही उसके (शिरीष पुष्प के) वृन्त की तरह अवशिष्ट रह जाती है । स श्मशानभुवं प्रायादनाथस्येव शुष्यतः । कर्तुं विनयिनस्तस्य स्वोचितामन्तसत्क्रियाम् ॥ ८४ ॥ ८४. अनाथ के समान सूखते हुए उस विनयी की, अपने करने योग्य अन्तिम संस्कार करने के लिये वे ( गुरु ) श्मशान भूमिपर गये । कारण भ्रम फैला है । सन्धिमति को ईशा मसीह पश्चात् छूटा था । रूप में जोडने का वृथा प्रयास किया गया है । पाठभेद : श्री विल्सन ने [पृष्ठ ३१] पर लिखा है कि श्लोक संख्या ८३ में 'तद्वृन्तमिव' का जिस रात्रि में राजा का निधन हुआ और उसका 'तद्वृत्तम' तथा 'तद्वृत्त्यमिव' पाठभेद मिलता है । शरीर जलाया गया उसी रात्रि सन्धिमति को बधि- ८३ [१] शिरीष- उत्तरी भारत के बगीचों कोने शूली पर चढाया । तथा सडकों पर शिरीष का वृक्ष बहुत मिलता है । कल्हण ने उक्त श्लोक में स्पष्ट वर्णन किया है इसका वृक्ष सुन्दर तथा रात्रि में अति सुगन्धदायक कि राजा का प्राण सन्धिमति के शूली लगने के होता है ।