भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 549

४१२ राजतरंगिणी ऊष्मायमाणो विद्वेषवह्निना ज्वलताऽनिशम् । न विना तद्वधं मेने भवितव्यप्रतिक्रियाम् ॥ ७६ ॥ ७६. विद्वेषाग्नि से रात्रि-दिन जलते रहने के कारण नितरां पीड़ित होते हुए उस राजा ने उसके (सन्धमति) वध के बिना, भवितव्यता की प्रतिक्रिया असम्भव समझा । भाव्यर्थस्याऽबुधाः कुर्युदुपायं स्थगनाय यम् । स एवाऽनावृतं द्वारं ज्ञेयं दैवेन कल्पितम् ॥ ७७ ॥ ७७. मूर्ख जन भवितव्यता को अन्यथा करने हेतु, जिस उपाय को करते हैं, वही भाग्य निर्मित अनावृत द्वार है ।¹ दग्धाङ्गारकदम्बके विलुठतः स्तोकोन्मिषत्तेजसो वेधा वह्निकणस्य शक्तिमतुलामाधातुकामो हठात् । तन्निर्वापणमिच्छतः प्रतनुते पुंसः समीपस्थिते संतापद्रुतभूरिसर्पिषि घटे पानीयकुम्भभ्रमम् ॥ ७८ ॥ ७८. जब विधाता दग्ध अंगार समूह में चिनगाते हुए स्वल्प तेज वाले वह्निकण को हठात् अतुल शक्ति सम्पन्न करने की इच्छा करता है, तब उस अग्नि को बुझाने के इच्छुक पुरुष में उसके निकटस्थ ताप-तरल प्रचुर घृत घट में जल कुम्भ का भ्रम कर देता है ।¹ अथ राजाज्ञया क्रूरैर्वधकर्माधिकारिभिः । निशि संधिमतिः शूले समारोप्य विपादितः ॥ ७९ ॥ ७९. राजा की आज्ञा से क्रूर वध कर्माधिकारियों ने रात्रि में सन्धिमति को शूलपर¹ चढ़ाकर हत्या कर दी ।

'माददे' मिलता है । अनुवादकों ने किया है । श्री रणजीत सीताराम राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रहका यह ४६वां श्लोक है । पण्डित के मत से इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ कुछ श्लोक संख्या ७७ में 'स्याऽबुधाः' का पाठभेद अस्पष्ट होता है परन्तु तात्पर्य समझ में आ जाता है । 'य बुधाः' मिलता है । ७९ ( १) शूलः - शूली की प्रथा प्राचीन पादटिप्पणियाँ : भारत में प्रचलित थी । स्थानभेद के कारण शूल ७७(१) कल्हण पुरानी बातों को नवीन शैली से अर्थात् शूल देने के प्रक्रिया में भी अन्तर था । शूलीपर कहता है । यही शैली उसने भाग्य वर्णन में चढ़ाने के लिए कल्हण ने समारोप शब्द का प्रयोग अपनायी है । कल्हण की कवि रूप में वह सबसे बड़ी किया है । विशेषता है । श्री विल्फोर्ड का मत है कि जिस शूली पर मरना पाठभेद : सन्धिमति का कहा जाता है वह वास्तव में 'क्रास' श्लोक संख्या ७८ में 'स्थिते' का पाठभेद था । ( एशियाटिक रिसर्च भाग १० ) किन्तु यह 'स्थितेः' मिलता है । बात गलत है । शूली की प्रथा भारत में बहुत पादटिप्पणियाँ : प्राचीन है । महाभारत में माण्डव्य ऋषि को ७८( १) इस श्लोक का अर्थ कई प्रकार से शूलीपर चढ़ाने का वर्णन मिलता है । 'क्रास' के