राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३० राजतरंगिणी
हरायतनसोपानक्षालनाम्भःकणाञ्चितैः । संस्पृष्टः पवनैः सोऽभूदानन्दास्पन्दविग्रहः ॥ १२४ ॥ १२४. हरायतन सोपानों के धोने वाले (समुत्थित) जल कण से व्याप्त पवन के संस्पर्श से उसका शरीर आनन्द के कारण स्पन्दित हो जाता था ।
पूर्वपूजापनयने निराडम्बरसुन्दरः । तेनैव द्रष्टुमज्ञायि स्नापितो विजयेश्वरः ॥ १२५ ॥ १२५. उसने पूर्व पूजा सम्भार को हटने पर बिना आडम्बर के सुन्दर स्नापित विजयेश्वर दर्शन को दर्शन माना ।
लिङ्गपीठलुठत्स्नानकुम्भाम्भःक्षोभभूध्वनिः । शयानस्याऽप्यभूत्तस्य वल्लभो वल्लकीद्विपः ॥ १२६ ॥ १२६. शयन करते हुए भी उस वीणा द्वेषी को लिङ्ग पीठ पर लुंठित होते स्नान कुंभ जल के क्षोभ¹ की प्रचुर ध्वनि प्रिय हुई ।
घाटके निकट मन्दिर का निर्माण कराया । इस मन्दिर में स्थापित शिव लिंग प्राचीन मन्दिर का ही शिव लिंग है । वह एक मस्जिद के शमादान अर्थात् दीवट के काम में लाया जाता रहा । मस्जिद की दीवार प्राचीन वर्धमानेश्वर मन्दिर के अलंकृत शिलाखण्डों तथा भग्नावशेषों से बनायी गयी है । पश्चिम बंगाल वर्धमान का शुद्ध नाम वर्द्धमान है । यह रेलवे का बहुत बड़ा जंकशन तथा आसनसोल कलकत्ता के बीच है । (३) विजयेश : टिप्पण पृष्ठ ४ विजयेश द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १२५ में 'निराडम्बर' का 'विरा- डम्बर,' 'निजडम्बर' तथा 'स्नपितो' का पाठभेद 'स्नापितो' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२५ उक्त श्लोक का भावानुवाद श्री स्तीन तथा श्री पण्डित ने किया है । अन्य अनुवादकों ने भी उक्त दोनों अनुवादकों का ही अनुकरण किया है । कश्मीर में यह प्रथा है कि पहले दिन के चढ़े हुए फूल पत्तो शृंगारादि को दूसरे दिन अति प्रातः काल में उतार लेते हैं ।
आडम्बर शब्द का प्रयोग कल्हण ने पुनः तरंग ८:२७२६ में किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या १२६ में 'वल्लभो' का पाठभेद 'वल्लभी' तथा 'वल्लभा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२६(१) क्षोभ : कल्हण ने इस शब्द का तथा आर्य राज के इस पुण्य भावना का उल्लेख राजा जयसिंह के सन्दर्भ में किया है । आसीद्यार्यरराजस्य शयानस्याप्यतिप्रियः । कामं लिङ्गाभिषेकाम्भःसंक्षोभप्रभवो ध्वनिः ॥ ८:२३९८ ॥ शिव लिंग को स्नान कराया जाता है तो दृश्य दिखायी पड़ सकता है । कल्हण की दृष्टि का यह एक उदाहरण है । काशी विश्वनाथ में तथा उदयपुर के एक लिंग की जब आरती एवं शृंगार के पूर्व स्नान कराया जाता है तो लिंग की मूर्धा से जल अरघा पर गिरता है । अरघा से पुनः जल लुढ़कता नीचे गिरता है । इस समय जल से एक प्रकार का कल- कल शब्द उद्भूत होता है । कल्हण ने उसी का आंखो देखा वर्णन किया है।