राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४३१ तापसैर्भस्मरुद्राक्षजटाजूटाङ्कितैर्बभौ । तस्य माहेश्वरो पर्षदिव भूमिपतेः सभा ॥ १२७ ॥ १२७. भस्म, रुद्राक्ष एवं जटाजूट युक्त तपस्वियों में उस पृथ्वोपत्ति की सभा शिव की सभा तुल्य शोभित हुई। शिवलिङ्गसहस्रस्य प्रतिष्ठाक्रमेणि प्रभोः । प्रतिज्ञा प्रत्यहं तस्य नाऽभूद्विघटिता क्वचित् ॥ १२८ ॥ १२८. उसकी प्रति दिन सहस्रों' शिवलिङ्ग प्रतिष्ठा कर्म की प्रतिज्ञा कहीं भी विघटित (भंग) नहीं हुई। प्रमादात्तदनिर्वृत्तौ शिलामुत्कीर्य कल्पिता । सहस्रलिङ्गी तद्भृत्यैः सर्वतोऽद्याऽपि दृश्यते ॥ १२९ ॥ १२९. प्रमाद से कभी उसके न होने पर भृत्यों द्वारा शिला पर' उत्कीर्ण सहस्र शिव लिंग चारों ओर आज भी दिखायी पड़ते हैं। लिंग पूजा अत्यन्त प्राचीन है। मोहेन्दो जोरो में मृत्तिका टेबलेट् पर लिंग, शक्ति तथा पृथ्वी उत्कीर्ण प्राप्त हुए हैं। विश्व में लिंग पूजा चार हजार वर्षों से भी प्राचीन है। पाठभेद : श्लोक संख्या १२९ में 'प्रमादा' का पाठभेद 'प्रसादा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १२९ (१) शिला—शिव लिंग = कश्मीर में शैव सम्प्रदाय प्रचलित था। शिव की पूजा का वहाँ के जीवन में प्रमुख स्थान था। आज भी कश्मीरी शिव भक्त हैं। आधुनिक काल में स्वर्गीय महाराज रणवीर सिंह कश्मीर नरेश ने ईशावर में एक सहस्र पाषाण शिव लिंग स्थापित करने तथा जम्मू में रण-वीरेश्वर मन्दिर में कोटि लिंग विभिन्न रूपों के स्थापित करने का विचार किया था। शिव लिंग गंगा की मिट्टी अथवा चींटी द्वारा चाली हुई मिट्टी अथवा शुद्ध मिट्टी से बनाते हैं। पार्थिव पूजा करने वाले पूजन के व्रत का आजन्म पालन करते हैं। पूजन के पूर्व अन्न ग्रहण अथवा किसी प्रकार का कार्य नही करते। महेन्दो जोरो में भी मिट्टी के वस्तु पर लिंग- शक्ति तथा पृथ्वी उत्तीर्ण मिले हैं। स्पष्ट है कि शिव लिंग पूजा अत्यन्त प्राचीन है। १२८ (१) सहस्र लिंग—कश्मीर में सहस्र लिंग प्रतिष्ठा तथा पूजा का विशेष महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। यह प्रथा अब भी प्रचलित है। पूर्णिमादि पर एक सहस्र लिंग मृत्तिका के बनाये जाते हैं। और शंकराचार्य पर्वत की मूल से प्राप्त मिट्टी से शिव लिंग प्रातः काल प्रतिष्ठित किये जाते हैं। सायं काल वितस्ता किंवा समीपस्थ स्रोतस्विनियों अथवा सरोवरों में उनका विसर्जन कर दिया जाता है। शिवरात्रि के दिन काशी में कुछ लोग अब भी एक सहस्र शिव लिंग गंगा की मिट्टी से बनाते हैं। तथा पूजन पश्चात् उनका गंगा में विस- र्जन किया जाता है। यहाँ पर अर्थ पार्थिवपूजन ही लगाना चाहिए। सहस्र लिंग की प्रति दिन राजा प्राण-प्रतिष्ठा करता था। पूजन करता था। वह दृढ़ निश्चयी था। कभी प्रतिज्ञा भंग नहीं हुई।