राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४३५ थेदां च भीमादेवीं च देशांश्चान्यान्पदे पदेः । स मठप्रतिमालिङ्गैर्हर्म्यैनिन्ये महार्घताम् ॥ १३५ ॥ १३५. उसने थेदा१, भीमा देवी२ एवं अन्य देशों (स्थानों) को पद-पद पर मठों, प्रतिमा-लिंगों एवं हर्म्यों में महार्घ बनाया।
[बायाँ स्तम्भ] कही जाती हैं। यहाँ पर प्राचीन मन्दिर का अवशेष केवल उक्त नाम मात्र के टूहे के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। श्रीनगर के समीप तथा मुख्य चलती सडक पर होने के कारण स्थान की उन्नति तथा विकास किया जा सकता है। मैंने पता लगाना आरम्भ किया यहाँ पर कौन पूजा वगैरह करता है। मुसलमान दूकानदार कुछ बता नहीं सके। ईशावर के समीप ही एक बाल ब्रह्मचारी श्री लक्ष्मण जी का स्थान। सड़क के पार्श्व में हैं। उनका यहाँ पर आश्रम है। साधना करते हैं। सप्ताह में रविवार के दिन प्रातः ८ बजे से ११ बजे तक त्रिक तथा शैव दर्शन पर विचार विनिमय तथा सिद्धान्तो पर प्रकाश डालते हैं। मैं उनके पास दो बार गया था। स्थान तथा आश्रम सुन्दर हैं। ईशावर स्थान प्राचीन काल में सुरेश्वरी के समान पवित्र माना जाता रहा है। वर्तमान ईशावर नाम पुराने नाम इशेश्वर का बिगड़ा रूप हैं। श्वोर शब्द देवी के अर्थ में कश्मीर में प्रयुक्त होता रहा हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या १३५ में 'येदा' का 'ध्वेदा' तथा 'महार्घ' का पाठभेद 'महार्क' का मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १३५ (१) येदा-थेदा : इसे थेदा देवी भी कहते हैं। वर्तमान थीड ग्राम डल के उत्तर तटपर जेथर से एक मील उत्तर है। अबुल फजल लिखता है—'थिड गाँव बड़ा रमणीक ग्राम है। वहीं सात स्रोत आकर मिलते हैं। उनके चारों ओर पत्थरों की इमारतें प्राचीन काल के गौरव का स्मरण दिलाती हैं।'
[दायाँ स्तम्भ] इस तीर्थ को सप्त पुण्यकरिणी तीर्थ कहा गया गया है हरचरित चिन्तामणि (४:४०) में उल्लेख है कि यहाँ पार्वती ने तपस्या की थी। श्रो स्तीन ने यहाँ की यात्रा उन्नीसवीं शताब्दी में की थी। परन्तु अबुल फजल वर्णित प्राचीन देवस्थान के टूटे शिलाखण्ड एवं मन्दिर किंवा भवनों के आकार श्रोस्तीन को नहीं मिले। वहाँ सातों जल- स्रोत अभी भी चलते हैं। मैंने यहाँ जलस्रोतों को चलते देखा। क्योंकि उन्हें समाप्त करना सम्भवतः मानवीय शक्ति एवं विध्वंस के परे की बात थी। यह स्थान श्रीनगर से जो सड़क डल लेक के तट से होती शालीमार की तरफ जाती है उसी के समीप चश्मा शाही से थोड़ी दूर उत्तर-पश्चिम की तरफ पड़ता है। (२) भीमा देवी : भीमा देवी का स्थान वर्तमान 'ब्रान' ग्राम माना गया है। डल के तट से १ १/२ मील और उत्तर जाने पर मिलता है। नील- मत पुराण इस स्थान का पता बताता है। इस समय बाबा गोलम दीन के जियारत के उत्तर पश्चिम है। भीमा देवी के उत्तर पश्चिम ईशेश्वर अर्थात् ईशावर पड़ता है। ईशेश्वर से उत्तर- पूर्व शुतेश्वरी तथा भीमा देवी के मध्य प्राचीन श्री- द्वार का क्षेत्र है। भीमादेवीं तथा दृष्ट्वा प्रियमाप्नोत्यनुत्तमाम् । तथा कापिंजलीं देवीं तथा देवीं सुरेश्वरोम् ॥११८४॥ हरचरित चिन्तामणि के अनुसार भीमा देवी में पार्वती ने तपस्या की थी। (४:४७) भीमा देवी का तीर्थ अब प्रायः लुप्त हो गया है। यह स्थान एक सुन्दर जलस्रोत जो दामपोर गाँव के