राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ राजतरंगिणी स्वयंभूमिश्च तीर्थैश्च पूतं भक्तिविभूषितः । स एव भोक्तुमज्ञासीत्प्राज्ञः कश्मीरमण्डलम् ॥ १३६ ॥ १३६. स्वयं भू¹ एवं तीर्थों से पवित्र कश्मीर मण्डल का उपभोग भक्ति विभूषित केवल वही जानता था। स्नातस्य निर्झराम्भोभिः पुष्पलिङ्गार्चनोत्सवैः । राज्ञस्तस्य वनोर्वीषु मासः पुष्पाकरो ययौ ॥ १३७ ॥ १३७. स्नात उस राजा का वसन्त¹ मास निर्झर जलों एवं पुष्ट लिंगार्चनोत्सवों² द्वारा वनभूमि में व्यतीत होता था।
समीपस्थ पर्वत से निकलता है, उसके पास माना जा सकता है। यहाँ अब एक मुस्लिम ज़ियारत है। दुर्गा सप्तशती में भीमा देवी के नाम की व्युत्पत्ति दी गयी है। देवी ने जब भीम रूप धारण कर मुनियों की रक्षा के लिए हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का भक्षण किया, उस समय देवी का नाम भीमा पड़ गया। दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति : पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले ॥११:५०॥ रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात् । तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥११:५१॥ भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति । यदा रुणारूपस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ॥११:५२॥ पाठभेद : श्लोक संख्या १३६ में 'विभूषितः' का 'विशेषितः' 'विशेषतः'; 'एव' का 'एवं;' 'प्राज्ञः' का 'प्राज्या' 'प्राप्य.' और 'कश्मीर' का पाठभेद 'काश्मीर' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १३६ (१) स्वयंभू : स्वयंभू तथा तीर्थों में अन्तर है। अपने रूप एवं विचित्रताओं के कारण पूजनीय माने जाते हैं। स्वयंभू प्रकृति द्वारा बन गये लिंगाकार शिलाखण्डादि माने जाते हैं। वे जलस्रोत भी स्वयंभू माने जाते हैं जिनमें कोई विशेषता एवं विचित्रता होती है। उन्हें भी स्वयंभू मानकर पूजा की जाती है। तीर्थस्थान मानव कृत होते हैं। कल्हण ने स्वयंभू लिंग का पुनः वर्णन रा० त० ८:२४३० में किया है। १३७ (१) वसन्तः : कल्हण इस श्लोक से षट् ऋतुओ मे होती हुई राजा की दिन चर्या का वर्णन आरम्भ करता है। वसन्त ऋतु प्रारम्भ होता है। पादपों में पत्तियां लगने लगती हैं। हिम तथा तुषार गल जाता है। पृथ्वी श्वेत चादर के स्थान पर हरी चादर ओढ़ने लगती हैं। निर्झर चलने लगते हैं। सूर्य किरण सुखदायी लगती है। अन्धड़ तथा पश्चिमी वायु का वेग कम हो जाता है। कलियाँ लगने लगती हैं। वृक्ष निखर आते हैं। कल्हण यहाँ कश्मीर के वसन्त का सर्वांगीण वर्णन नही करता। वह इतिहास लिख रहा था। प्रसंग के कारण उसने सन्धिमान आर्य राज की ऋतुचर्या का उल्लेख किया है। (२) लिंगार्चनोत्सव : कल्हण सन्धिमान के समय वसंत ऋतु में प्रचलित लिंगार्चनोत्सव का उल्लेख करता है। माघ मास के उत्तरार्ध में माघ शुक्ल फाल्गुन कृष्ण को १३ को महाशिवरात्रि का व्रत एवं उत्सव होता है। शिवरात्रि के समय उत्तरी भारत में आम में मञ्जरियां लग जाती हैं। नव चेतना का