राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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४४० राजतरंगिणी जुगोप गोपादित्याख्यं कश्मीरेन्द्रजिगीषया । युधिष्ठिरप्रपौत्रं हि गान्धाराधिपतिस्तदा ॥ १४५ ॥ १४५. उस समय गान्धाराधिपति ने कश्मीरेन्द्र को जीतने की इच्छा से ही युधिष्ठिर के प्रपौत्र गोपादित्य को अपने यहाँ संरक्षित किया । वसन्नप्राप्तसाम्राज्यः स तत्र तनयं क्रमात् । अवाप लक्षणैर्दिव्यैरमोघं मेघवाहनम् ॥ १४६ ॥ १४६. बिना साम्राज्य प्राप्त किये, यहाँ निवास करते समय, उसने दिव्य लक्षण युक्त, अमोघ मेघवाहन नामक पुत्र प्राप्त किया । स युवा पितुरादेशाद्वैष्णवान्वयजन्मनः । राष्ट्रं प्राग्जोतिपेन्द्रस्य ययौ कन्यास्वयंवरे ॥ १४७ ॥ १४७. वह युवक पिता के आदेश पर, वैष्णव¹ कुलोत्पन्न, प्राग्ज्योतिपेन्द्र² के राष्ट्र में उसकी कन्या के स्वयंवर में गया । पाठभेद : श्लोक संख्या १४५ में 'दित्याख्यं' का 'दित्याख्यः' और 'कश्मीरेन्द्र' का 'वाश्मीरेन्द्र' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १४५ ( १ ) गान्धारः परिशिष्ट द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १४६ में 'प्राप्त' का पाठभेद 'पास्त' मिलता है । श्लोक संख्या १४७ में 'युवा' का पाठभेद 'तत्र' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १४७( १ ) वैष्णव : वैष्णव प्रभाव मणिपुर आसाम में था और आज भी है । कल्हण के समय में भी भारत के इस धुर पूर्वीय अंचल में वैष्णव सम्प्र- दाय प्रबल था । आज भी वहाँ प्रबल है । यद्यपि ईसाई मिशनरियों के कारण नागा, नेफा, आदि क्षेत्रों में ईसाई धर्म का प्राबल्य हो गया है । गरीब पर्वतीय जाति को ईसाई धर्म को दीक्षित करने में विदेशी मिशनरी सफल हुई है । मणिपुर, त्रिपुरा तथा आसाम के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में वैष्णव प्रभाव आज भी दिखायी पड़ता है । कल्हण को तत्कालीन भारतीय स्थिति का ज्ञान था । उसके इस वर्णन से स्पष्ट होता है । ( २ ) प्राग्ज्योतिष : एक प्राच्य जनपद था । यह अति प्राचीन जनपद था । महाभारत में कुछ स्थानों पर इसको म्लेच्छ स्थान कहा गया है । वामन पुराण के अनुसार यह पूर्व का एक जनपद है । ( वा. पु. १३:४५ ) वहाँ का राजा भगदत्त था। उसकी प्रशंसा की गयी है। इसे दानवराज नरकासुर का देश कहा गया है । नरकासुर का नाम भौम भी था । उसका पुत्र भगदत्त था । नरक राजा का उल्लेख कल्हण ने ( रा. त. २:१५० में ) उल्लेख किया है । विष्णु पुराण के अनुसार यह राजधानी थी । ( वायु : ४५ : १२२, मार्कण्डेय : ५७ : ४४, मत्स्य ११४ : ४४ भाग० १० : ५९ रा : २, ३१; वामन : ८:१२, ४३:५९ ) महाभारत में प्राग्ज्योतिष का उल्लेख मिलता है । उसे एक अति प्राचीन नगर कहा गया है । भौमासुर की राजधानी था । ( म. स : ३८) भौमा- सुर के पश्चात् उसका पुत्र भगदत्त वहाँ का राजा हुआ था । यहाँ पर नरकासुर निवास करता था ।