राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग १४१ तत्र तं वारुणं छत्रं छायया राजसंनिधौ । भेजे वरस्रजा राजकन्यका चामृतप्रभा ॥ १४८ ॥ १४८. वहाँ राजा की संनिधि में उसे वरुण छत्र¹ ने छाया से और राजकन्या अमृत- प्रभा² ने वरमाला से सम्मानित किया ।
( म० उद्योग ४८:८० ) भगदत्त के पश्चात् यहाँ का राजा वज्रदत्त हुए थे । ( म. आश्वः ७५:१ ) ( ३ ) कन्यास्वयंवर : भारतीय एकता भारत की भिन्नता में अभिन्नता का बड़ा ही उत्तम उदाहरण मेघवाहन का स्वयंवर उपस्थित करता है । मेघवाहन गान्धार अर्थात् सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रदेश जो काबुल उपत्यका तक फैला था वहाँ से भारत के धुर पूर्वीय प्रदेश प्राग्ज्योतिष पहुँचता है। स्वयंवर में भारतीय राजा आमन्त्रित किये जाते थे । भारत को एक ईकाई के रूप में भारतीय देखते थे । स्मरणीय बात है। स्वयंवर में केवल हिन्दू ही भाग लेते थे । भारत की सीमा पर स्थित यवन म्लेच्छ राजा भाग नहीं लेते थे । हिन्दुओं एवं भारत की एकता का यह सजीव उदाहरण है । भारत के किसी कोने में रहनेवाला भारतीय अपने को एक ही कुल की सन्तान समझता था । एक दूसरे को भाई मानता था । मेघवाहन २ हजार मील की यात्रा कर प्राग्- ज्योतिष पहुँचा था । गान्धार की भाषा एवं आसाम की भाषा में जमीन आसमान का अन्तर था । एक दूसरे की भाषा नहीं समझते थे । एक दूसरे का रंग नहीं मिलता था । अंग विन्यास नहीं मिलता था, खानपान नहीं मिलता था । रहन सहन नहीं मिलता था । जलवायु नहीं मिलती थी । तथापि जैसे उनमें भिन्नता नहीं थी । सब एक परिवार के प्राणी थे । वह परिवार विशाल भारत था । वह परिवार रक्त से नहीं अपितु धर्म, संस्कृति एवं सभ्यता से जुड़ा था । घुल मिल गया था । सुदूर पूर्व के मनीषियों की यह कल्पना थी । जो साकार थी । गान्धार के होते भी वह आसाम में अपरिचित समझा गया । राजकन्या ने दो हजार मील दूर रहने वाले को चुनने में किंचित् मात्र संकोच नहीं किया । उसके पिता ने संकोच नहीं किया कि मेघवाहन एक राज्यच्युत वंश का वंशज मात्र था । वह राजा किंवा राज्य का उत्तराधिकारी नहीं था। राजा ने उसे राजकन्या देने में किंचित् मात्र संकोच नहीं किया । वह दूर जाने वाली थी। उसका पुनः दर्शन दुर्लभ हो सकता था । कन्या अमृतप्रभा ने भी निसंकोच मेघवाहन का वरण किया । वह था आदर्श । यह थी भारतीय संस्कृति की अमोघ शक्ति जिसने भारत को अनेक आघातों, ताड़नाओं के होते भी एक में बाँध रखी थी । कल्हण भारत की इस सांस्कृतिक एकता की अविच्छिन्न धारा से परिचित था । और उसने बड़ी सुन्दरता से उसे वहाँ उदाहरण स्वरूप उपस्थित कर दिया है । १४८ ( १ ) वरुण छत्र : वरुण छत्र किस प्रकार प्राग्ज्योतिष के राजा के पास आया इसका उल्लेख कल्हण ने स्वयं तरंग ३ के श्लोक ५३ से ७० तक में किया है । उस वर्णन से प्रतीत होता है कि मेघवाहन ने अमृतप्रभा तथा वरुण का छत्र दोनों प्राप्त किया था । मेघवाहन ने यह छत्र वरुण के माँगने पर पुनः लौटा दिया था । वैदिक साहित्य में वरुण सृष्टि के नैतिक एवं भौतिक प्रतिपालक रूप में चित्रित किये गये हैं । वैदिकोत्तर साहित्य में वरुण का श्रेष्ठत्व क्रमशः क्षीण होता गया है। उसका प्रभुत्व केवल जल ही पर शेष माना जाने लगा है। वह सहस्र नेत्रों से मानव जाति का अवलोकन करते हैं। (ऋ० ७:२४:८८ )
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