राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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[बायाँ स्तम्भ] अतएव वरुण को 'सूर्यनेत्री' की संज्ञा दी गयी है। (ऋ. ७:६६) यह सुपाणि है। स्वर्णद्वायि एवं द्युतिमत् वस्त्र धारण करते हैं। (ऋ. १०:२५) इनका रथ सूर्य के समान द्युतिमान है। उसमे स्तम्भो के स्थान पर नाधियां लगी है। (ऋ. १:१२२) ब्राह्मण ग्रन्थ रचना काल मे इसके रूप की कल्पना श्वेत वर्णं, गंजा, पीत नेत्र, वृहद् पुरुष रूप में की गयी है। वरुण का भवन स्वर्ण निर्मित है। द्युलोक मे है। गृह में सहस्र द्वार है। वह भवन में बैठकर समस्त सृष्टि का अवलोकन करता है। (५:६७-६८, १:२५) सर्वदर्शी सूर्य अपने गृह से उदित होकर मानवों के कृत्यो की सूचना वरुण को देता है। (ऋ.:७:६०) ऋग्वेद में इसे सम्राट् कहा गया है। यह उपाधि इन्द्र को दी गयी है परन्तु इन्द्र से भी अधिक वरुण को प्रदान की गयी है। इसके सार्वभौम सत्ता किंवा छत्र का एवं शासक के नाते निर्देश किया गया है। (ऋ० १:१:१३२; ५: ८५) वरुण प्रकृति के नियमों का महान् अधिपति है। उसके कारण द्युलोक एवं पृथ्वी अलग अलग हुई। (ऋ० : ६: ७०; ८: ४२) इसने अग्नि की जल मे, सूर्य को आकाश में, एवं सोम की पर्वतों मे स्थापना की है। (ऋ. ५:८५) वायु मण्डल में भ्रमणशील वायु वरुण का श्वास है। (ऋ० :७.८) ऋग्वेद मे कितनी ही बार वरुण को असुर किंवा रहस्यमय व्यक्ति कहा गया है। (ऋ० : १: ३५ : ७; २ : ७ : १०, ७ : ६५ : २; ८ : ४२ : १) यह अपनी आसुरी माया के कारण मनुष्यो का सम्राट् बन गया था। उसे यक्षिन् भी कहा गया है। (ऋ० : ७: ८८.६) अथर्व वेद काल में वरुण की वह सत्ता नहीं मानी गयी है जो ऋग्वेद काल में थी। उसे केवल जल का नियंत्रक माना गया है। (अ. वे ३:३) ब्राह्मण ग्रंथों में उसे जल देवता रूप में चित्रित किया गया है। (तै. सं. २:१:२:१; श. ब्रा.
[दायाँ स्तम्भ] ४:४५:११; ऐ. ब्रा. ७:१५) वरुण शब्द की व्युत्पत्ति की गयी है। उसके अनुसार पापियों को परिवेष्टिन करने वाला कहा गया है। (१:८९) पापियो को अन्धकार की भांति आच्छादित करनेवाला भी कहा गया है। (तै० सं० २:१:७) महाभारत काल में वरुण के रूप मे और परि- वर्तन होता दिखायी पड़ता है। उसे अदिति का पुत्र तथा चौथा लोकपाल कहा गया है। जल निवासी देवता उसे बना दिया गया है। (म० आ० ५९:१५) इसको पश्चिम दिशा, जल एवं नागलोक का अधिपति कहा गया है। (म. स. ९:७; म. उ.:८६ : २०) देवताओ ने जलेश्वर रूप मे इसका अभिषेक किया था। वरुण का पुत्र श्रुतायुध था। उसे गदा प्रदान किया था। (म. द्रो. ६७:४९) इसकी ज्येष्ठ पत्नी का नाम ज्येष्ठा था। यह शुक्राचार्य की कन्या थी। उससे बल, अधर्म एवं पुष्कर नामक तीन पुत्र तथा सुरा नामक एक कन्या उत्पन्न हुई थी। (म. आ. ६०:५१-५२; म. उ. ९६:१२) इसकी एक ओर पत्नी थी। उसका नाम वारुणी था। उसे गौरी भी कहते हैं। उसे शौ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। (म. स. ९:१०८) इसकी तृतीय पत्नी का नाम चीत-तोया था। जनक सभा का सुविख्यात ऋषि वन्दिन् भी इसका पुत्र था। (म. व. १३४:२४) रुद्र के यज्ञ से उत्पन्न हुए भृगु, अंगिरस एवं कवि नामक तीन पुत्रो में से इसने भृगु को अपने पुत्र रूप में स्वीकार किया था। यह भृगु वारुणी नाम से प्रसिद्ध हुआ। (म० अनु० : १३२ । ३६) वरुण की पूजा का कश्मीर के धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। नीलमत पुराण (श्लोक 809-810) में वरुण का उल्लेख विष्णु, शक्र, सविता, ब्रह्मा एवं रुद्र के साथ किया गया है। वरुण का नीलमत पुराण में आदित्य, मरुत् तथा जलाधिपति के रूप में वर्णन किया गया