राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४४३ तेन तस्य निमित्तेन वृद्धिमागामिनीं जनाः । अजानन्नम्बुवाहस्य पाश्चात्येनेव वायुना ॥ १४९ ॥ १४९. इन लक्षणों से जनता ने उसके उन्नत भविष्य को पश्चिमी वायु चलने पर जलद आने के समान जान लिया । राज्ञा हि नरकेणैतद्वरुणादुष्णवारणम् । आनीतमकरोच्छायां न विना चक्रवर्तिनम् ॥ १५० ॥ १५०. राजा नरक द्वारा वरुण से लाया गया वह छत्र चक्रवर्ती के अतिरिक्त और किसी पर छाया नहीं किया था।
है। ये नरक देवता रूप में भी चित्रित किये गये हैं। (श्लोक 619, 607, 384, 1381 तथा 1004- 1006)। कातिक में वरुण पूजा का विधान भी नीलमत पुराण करता है। वरुण पंचमी पूजा का मुख्य दिन रखा गया है (श्लोक 755) नीलमत वरुण लोक का भी उल्लेख करता है। (868, 282-284, 1262,676,1001,1232,1221, 1286, 1299) (२) अमृतप्रभा—विर्दउद्दीन मेघवाहन की प्राग्ज्योतिष को राजकन्या का नाम 'खोता' देता है। पुनः कहता है कि वह खोत के राजा की कन्या थी। लेखक का आधार केवल परसियन अनुवाद राजतरंगिणी का है। मेघवाहन की दूसरी रानी खादना को ही शायद खोता लिखा है। कल्हण ने किसी खोता रानी का वर्णन नहीं किया है यद्यपि उसने मेघवाहन की पाँच रानियों का नाम दिया है। ये अमृतप्रभा, यूक देवी, इन्द्र देवी, खादना तथा सम्मा है। (रा. त. ३:१०) १४९ राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५२ वा श्लोक है। (१) पश्चिमी वायु : पश्चिमी यहाँ दो अर्थ उपस्थित करता है। कश्मीर में पश्चिमी वायु चलने पर वर्षा होती है। उत्तर भारत में भी पुरवा हवा अर्थात् पूर्वीय वायु चलने के पश्चात् जब पछुआ अर्थात् पश्चिमो वायु चलने लगती है, तो ग्रामीण समझ जाते हैं कि वर्षा होगी। उत्तर भारत में आसाम से लेकर हिमाचल तक वर्षा ऋतु में मानसून से वर्षा होने का यही लक्षण माना जाता है। बंगाल की खाड़ी से मानसून उठता है। वह पश्चिम उत्तर की ओर चलता है। वहाँ हिमालय उसे तिब्बत में तथा और आगे बढ़ने से रोक देता है। वह वायु टक्कर खाकर लौटती है। उसकी गति पश्चिम से, पूर्व उत्तर से पूर्व और दक्षिण की ओर हो जाती है। इसी से वृद्धि होती है। आसाम के लोगों ने मेघवाहन को पश्चिम से आया जानकर उसकी उपमा पश्चिमी वायु जनता के लिये वर्षा सहित उज्ज्वल भविष्य उपस्थित करती है। उसी प्रकार पश्चिम का मेघवाहन अपने उज्ज्वल भविष्य के साथ पूर्व आसाम में आया था। उसका लक्षण देखकर लोगों ने उसका भविष्य आँका था। १५० (१) नरकः राजा नरक प्राग्- ज्योतिष का राजा था। पृथ्वी का पुत्र होने के कारण इसकी संज्ञा भौम भी थी। इसकी माता भू देवी ने तपस्या की थी। विष्णु ने प्रसन्न होकर उसे वैष्णवास्त्र दिया था। उस अस्त्र के कारण यह अजेय हो गया था। इस अस्त्र को उसने अपने पुत्र भगदत्त को दे दिया था। (म० द्रो० २८) नरक का राज नोल समुद्र के तट पर था।