राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४४५ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय स्वराज्यं भेदजर्जरम् । प्रतिचक्रे न शक्तोऽपि तस्थौ तु त्यक्तुमुत्सुकः ॥ १५२ ॥ १५२. भेद से जर्जरित अपने राज्य को जानकर, उसे त्यागने के लिये उत्सुक वह आर्य राज समर्थ होते हुए भी प्रतिरोध न कर, स्थिर हो गया । की व्यवस्था का प्रश्न था । सन्धिमान इतना अधिक धर्म की ओर झुक गया था कि वह राज कार्य की ओर उतना ध्यान नहीं दे सका । जितनी की अपेक्षा हो सकती थी । उसे परलोक की चिन्ता हो गयी थी । मन्त्री लोक के थे । उन्हें लोक की चिन्ता थी । परलोक की चिन्ता सन्तों, साधुओ, महात्माओ तथा ब्राह्मणों को हो सकती थी । सन्धिमान ४७ वर्ष राज्य कर चुका था । उसके पूर्व वह मन्त्री रह चुका था । दश वर्ष जेल में था । जो कारावास तथा राज्य काल का समय जोड़ा जाय तो वही ५७ वर्ष का हो जाता है । यदि मान लिया जाय कि वह पचीस या तीस वर्ष की आयु में मन्त्री हुआ था तो राज्य त्याग के के समय उसकी आयु ८२ या ८७ वर्ष होनी चाहिए । वृद्धावस्था के कारण उसका झुकाव परलोक की ओर हो जाना स्वाभाविक था । वह ९६ वर्ष की अवस्था में दिवंगत हुआ था । इस प्रकार राज्य त्याग के पश्चात् ९ या १४ वर्ष तक जीवित रहा । पाठभेद : श्लोक संख्या १५२ मे 'तु' का पाठ भेद 'तत्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५२ (१) भेद जर्जरित : राज्य कार्य की व्यवस्था ठीक से देखने के कारण मन्त्रियों तथा भृत्यो का प्रबल होना स्वाभाविक था । राजा जब शक्ति हीन होता है तो उसके पार्षद, मन्त्री तथा भृत्यों की शक्ति वृद्धि होती जाती है । मन्त्री, पार्षद, भृत्य एवं अन्य लोग परस्पर स्पर्धा शक्ति प्राप्ति के लिये करते हैं । इस स्पर्धा के कारण परस्पर अविश्वास तथा भेद उत्पन्न होता है । राजा के कुछ निर्णायक निश्चय न लेने पर वह और बढ़ता जाता है । यही अवस्था सन्धिमान के राज्य यन्त्र की हुई थी । दुर्बल राजा के कारण राज यन्त्र शिथिल हो गया था । यन्त्र ढीले हो गये थे । उन्हें कसने के अभाव में राज्य शरीर जर्जरित हो गया था । वह जर्जरता पारस्परिक भेदो में प्रकट होती है । एतदर्थ कल्हण यहाँ ठीक ही कहता है कि राजा भेद जर्जरित हो गया था । कल्हण सन्धिमान का चरित्र और महान् बना देता है । राजा अपनी स्थिति सम्हाल सकता था । उसके विरुद्ध आचरण दोष भ्रष्टाचार का दोष नहीं आरोपित किया जा सकता था । जनता में उसके अलौकिक शक्ति की धाक थी । प्रतिरोध करना चाहता तो वह कर सकता था । किन्तु यह दार्शनिक, आध्यात्मिक, निस्पृह राजा था । उसने राज्य की याचना नहीं की थी । राज्य जाने लगा उस समय भी चिन्ता नहीं की । वह अनायास मिला था । अनायास जा रहा था । राज्य के प्रति उसे इस लिये भी मोह नही रह गया था कि उसे कोई सन्तान नहीं थी । कल्हण के वर्णन से प्रकट नहीं होता कि उसे स्त्री था । रक्तज उत्तराधिकारी के अभाव में उसे यह कामना नही रह गयी थी कि राज्य उसके सन्तान किंवा वंशज को मिले । वह जनता का राज्य था । जनता से मिला था । जनता चाहे उसे ले ले । सन्धिमान ने वह दृष्टिकोण अपनाया था । सन्धिमान निस्सन्देह साधु राजा था । उसके समान विश्व इतिहास में शायद ही कोई उदाहरण मिल सके ।