भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 589

तमन्तिकं पितुः प्राप्तं पत्न्या लक्ष्म्या च संश्रितम् । भुवा निमन्त्रयामासुर्मन्त्रिणो वंशयोग्यया ॥ १५१ ॥

१५१. पत्नी एवं लक्ष्मी से युक्त वह जब पिता के पास पहुँचा तब उसे मन्त्रियों ने वंशानुरूप भूमि द्वारा आमन्त्रित किया ।

उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिष थी । इसका नाम मूर्ति लिंग भी आया है । इसके पाँच राज्यपाल 'हयग्रीव, निशंभु, पंचजन, विरूपाक्ष एवं मुर थे । यह इतना प्रबल हो गया था कि इन्द्र से उच्चैःश्रवा अश्व एवं ऐरावत हाथी छीन लाया था । देवमाता आदि के कुण्डलों का भी हरण कर लिया था । ( म. स. ३८ ) माता अदिति के कुण्डल को प्राप्ति का देवताओं ने प्रयास किया । किन्तु विफल हो गये । प्राग्ज्योतिष में असुरों का एक सुदृढ़ दुर्ग था । अजेय था । नर- कासुर यहाँ निवास करता था । निर्मोचन नगर में नरक तथा श्री कृष्ण का युद्ध हुआ । नरक पराजित हो गया । ( म. उ. ४८:८०—८४ ) कृष्ण ने उसके पुत्र को राज्यसिंहासन पर बैठाया ( भा०:१०:५९ ) नरक ने पृथ्वी का अपहरण किया था । उसने सम्पत्ति तथा अपहृत नारियों को मणिपर्वत पर औदका नामक स्थान में रखा था । श्री कृष्ण तथा नरक की कथा हरिवंश पुराण में दूसरे ढंग से दी गयी है । युद्ध प्रारम्भ पूर्व श्री कृष्ण ने पांचजन्य शंख घोष किया । शंख घोष सुनते ही नरक क्रुद्ध हो गया । क्रोध पूर्वक संवेग युद्धार्थ रथारूढ़ हो निकला । नरक का रथ अत्यंत विस्तृत मूल्यवान तथा अजय था । नरक का मस्तक चक्र से भगवान् ने काट दिया । अदिति का कुण्डल तथा प्राग्ज्योतिष का राज्य दोनों मुक्त हुए । ( ह० व० २:६३, भा० १०:५९ ) श्री कृष्ण ने बन्दी रखी नारियों को मुक्त किया (पद्म : उ० : २८८) पद्म पुराण में भी यह कथा दी गयी है । उसमें 'नरक चतुर्दशी' का विशेष वर्णन किया गया है । यह दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को पड़ता है । उसने कृष्ण से वर माँगा था । उसकी मृत्यु के दिन अर्थात् नरक चतुर्दशी को सूर्योदय के पूर्व जो मंगल स्नान करे उन्हें नरक की यातना न दी जाय । नीलमत पुराण में यह कथा अत्यन्त संक्षेप में दी गयी है । वरुण की सभा में नरकासुर को अत्यंत सम्माननीय स्थान प्राप्त था । उसे वहाँ पर पृथ्वीपति कहा गया है । ( म. स. ९:१२ ) नरक को यहीं पर छत्र प्राप्त हुआ था । उसी वरुण के छत्र का उल्लेख कल्हण यहाँ करता है । प्राग्- ज्योतिष में वह छत्र आया था । प्राग्ज्योतिष का राजा उसका वंशज था । अतएव उसके कुल में वह छत्र था । पाठभेद : श्लोक संख्या १५१ में 'वंश' का 'वंश्य' तथा 'योग्यया' का 'योग्य या' और 'योग्यवान' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५१ ( १ ) मन्त्री-शक्ति—कल्हण यहाँ एक और उदाहरण कश्मीर की शक्तिशाली मन्त्री परिषद् किंवा मन्त्री मण्डल का देता है । सन्धिमान राजा था । उसके राजा रहते हुए कश्मीर के मन्त्रियों ने मेघवाहन को कश्मीर की भूमि देने का निश्चय किया । उसे कार्यान्वित भी किया । औपचारिक रूप से मन्त्रियों ने उसे उसके पूर्वजों के राज्य ग्रहण करने का निवेदन किया । मन्त्रिपरिषद् की शक्ति कश्मीर में कितनी शक्ति- शाली थी यह इसी से प्रकट होता है । उन्हें किंचित् मात्र संकोच नहीं हुआ कि सन्धिमान के मन्त्री होते भी वे उसे राज्यच्युत करने का प्रयास कर रहे थे । मन्त्रियों के सम्मुख जनता हित तथा राज्य