राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 590, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४४५ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय स्वराज्यं भेदजर्जरम् । प्रतिचक्रे न शक्तोऽपि तस्थौ तु त्यक्तुमुत्सुकः ॥ १५२ ॥ १५२. भेद से जर्जरित¹ अपने राज्य को जानकर, उसे त्यागने के लिये उत्सुक वह आर्य राज समर्थ होते हुए भी प्रतिरोध न कर, स्थिर हो गया ।
की व्यवस्था का प्रश्न था। सन्धिमान इतना अधिक धर्म की ओर झुक गया था कि वह राज कार्य की ओर उतना ध्यान नहीं दे सका । जितनी की अपेक्षा हो सकती थी । उसे परलोक की चिन्ता हो गयी थी। मन्त्री लोक के थे। उन्हें लोक की चिन्ता थी। परलोक की चिन्ता सन्तो, साधुओं, महात्माओं तथा ब्राह्मणों को हो सकती थी । सन्धिमान ४७ वर्ष राज्य कर चुका था । उसके पूर्व वह मन्त्री रह चुका था । दश वर्ष जेल में था । जो कारावास तथा राज्य काल का समय जोड़ा जाय तो वही ५७ वर्ष का हो जाता है । यदि मान लिया जाय कि वह पचीस या तीस वर्ष की आयु में मन्त्री हुआ था तो राज्य त्याग के के समय उसकी आयु ८२ या ८७ वर्ष होनी चाहिए । वृद्धावस्था के कारण उसका झुकाव परलोक की ओर हो जाना स्वाभाविक था। यह ९६ वर्ष की अवस्था में दिवंगत हुआ था। इस प्रकार राज्य त्याग के पश्चात् ९ या १४ वर्ष तक जीवित रहा । पाठभेद : श्लोक संख्या १५२ में 'तु' का पाठ भेद 'तत्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १५२ (१) भेद जर्जरित : राज्य कार्य की व्यवस्था ठीक से देखने के कारण मन्त्रियों तथा भृत्यों का प्रबल होना स्वाभाविक था। राजा जब शक्ति हीन होता है तो उसके पार्षद, मन्त्री तथा भृत्यो की शक्ति वृद्धि होतो जाती है। मन्त्री, पार्षद, भृत्य एवं अन्य लोग परस्पर स्पर्धा शक्ति प्राप्ति के लिये करते हैं। इस स्पर्धा के कारण परस्पर अविश्वास तथा भेद उत्पन्न होता है। राजा के कुछ निर्णायक निश्चय न लेने पर वह और बढ़ता जाता है। यही अवस्था सन्धिमान के राज्य यन्त्र की हुई थी। दुर्बल राजा के कारण राज यन्त्र शिथिल हो गया था। यन्त्र ढीले हो गये थे। उन्हें कसने के अभाव में राज्य शरीर जर्जरित हो गया था। वह जर्जरता पारस्परिक भेदों में प्रकट होती है। एतदर्थ कल्हण यहाँ ठीक ही कहता है कि राजा भेद जर्जरित हो गया था। कल्हण सन्धिमान का चरित्र और महान् बना देता है। राजा अपनी स्थिति सम्हाल सकता था। उसके विरुद्ध आचरण दोष भ्रष्टाचार का दोष नहीं आरोपित किया जा सकता था। जनता में उसके अलौकिक शक्ति की धाक थी। प्रतिरोध करना चाहता तो वह कर सकता था। किन्तु यह दार्शनिक, आध्यात्मिक, निस्पृह राजा था। उसने राज्य की याचना नहीं की थी। राज्य जाने लगा उस समय भी चिन्ता नहीं की। वह अनायास मिला था। अनायास जा रहा था । राज्य के प्रति उसे इस लिये भी मोह नहीं रह गया था कि उसे कोई सन्तान नहीं थी। कल्हण के वर्णन से प्रकट नहीं होता कि उसे स्त्री था। रक्तज उत्तराधिकारी के अभाव में उसे यह कामना नहीं रह गयी थी कि राज्य उसके सन्तान किंवा वंशज को मिले। वह जनता का राज्य था। जनता से मिला था। जनता चाहे उसे ले ले। सन्धिमान ने वह दृष्टिकोण अपनाया था। सन्धिमान निसन्देह साधु राजा था। उसके समान विश्व इतिहास में शायद ही कोई उदाहरण मिल सके ।