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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

द्वितीय तरंग ४४५ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय स्वराज्यं भेदजर्जरम् । प्रतिचक्रे न शक्तोऽपि तस्थौ तु त्यक्तुमुत्सुकः ॥ १५२ ॥ १५२. भेद से जर्जरित¹ अपने राज्य को जानकर, उसे त्यागने के लिये उत्सुक वह आर्य राज समर्थ होते हुए भी प्रतिरोध न कर, स्थिर हो गया ।

की व्यवस्था का प्रश्न था। सन्धिमान इतना अधिक धर्म की ओर झुक गया था कि वह राज कार्य की ओर उतना ध्यान नहीं दे सका । जितनी की अपेक्षा हो सकती थी । उसे परलोक की चिन्ता हो गयी थी। मन्त्री लोक के थे। उन्हें लोक की चिन्ता थी। परलोक की चिन्ता सन्तो, साधुओं, महात्माओं तथा ब्राह्मणों को हो सकती थी । सन्धिमान ४७ वर्ष राज्य कर चुका था । उसके पूर्व वह मन्त्री रह चुका था । दश वर्ष जेल में था । जो कारावास तथा राज्य काल का समय जोड़ा जाय तो वही ५७ वर्ष का हो जाता है । यदि मान लिया जाय कि वह पचीस या तीस वर्ष की आयु में मन्त्री हुआ था तो राज्य त्याग के के समय उसकी आयु ८२ या ८७ वर्ष होनी चाहिए । वृद्धावस्था के कारण उसका झुकाव परलोक की ओर हो जाना स्वाभाविक था। यह ९६ वर्ष की अवस्था में दिवंगत हुआ था। इस प्रकार राज्य त्याग के पश्चात् ९ या १४ वर्ष तक जीवित रहा । पाठभेद : श्लोक संख्या १५२ में 'तु' का पाठ भेद 'तत्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १५२ (१) भेद जर्जरित : राज्य कार्य की व्यवस्था ठीक से देखने के कारण मन्त्रियों तथा भृत्यों का प्रबल होना स्वाभाविक था। राजा जब शक्ति हीन होता है तो उसके पार्षद, मन्त्री तथा भृत्यो की शक्ति वृद्धि होतो जाती है। मन्त्री, पार्षद, भृत्य एवं अन्य लोग परस्पर स्पर्धा शक्ति प्राप्ति के लिये करते हैं। इस स्पर्धा के कारण परस्पर अविश्वास तथा भेद उत्पन्न होता है। राजा के कुछ निर्णायक निश्चय न लेने पर वह और बढ़ता जाता है। यही अवस्था सन्धिमान के राज्य यन्त्र की हुई थी। दुर्बल राजा के कारण राज यन्त्र शिथिल हो गया था। यन्त्र ढीले हो गये थे। उन्हें कसने के अभाव में राज्य शरीर जर्जरित हो गया था। वह जर्जरता पारस्परिक भेदों में प्रकट होती है। एतदर्थ कल्हण यहाँ ठीक ही कहता है कि राजा भेद जर्जरित हो गया था। कल्हण सन्धिमान का चरित्र और महान् बना देता है। राजा अपनी स्थिति सम्हाल सकता था। उसके विरुद्ध आचरण दोष भ्रष्टाचार का दोष नहीं आरोपित किया जा सकता था। जनता में उसके अलौकिक शक्ति की धाक थी। प्रतिरोध करना चाहता तो वह कर सकता था। किन्तु यह दार्शनिक, आध्यात्मिक, निस्पृह राजा था। उसने राज्य की याचना नहीं की थी। राज्य जाने लगा उस समय भी चिन्ता नहीं की। वह अनायास मिला था। अनायास जा रहा था । राज्य के प्रति उसे इस लिये भी मोह नहीं रह गया था कि उसे कोई सन्तान नहीं थी। कल्हण के वर्णन से प्रकट नहीं होता कि उसे स्त्री था। रक्तज उत्तराधिकारी के अभाव में उसे यह कामना नहीं रह गयी थी कि राज्य उसके सन्तान किंवा वंशज को मिले। वह जनता का राज्य था। जनता से मिला था। जनता चाहे उसे ले ले। सन्धिमान ने वह दृष्टिकोण अपनाया था। सन्धिमान निसन्देह साधु राजा था। उसके समान विश्व इतिहास में शायद ही कोई उदाहरण मिल सके ।

४४६ राजतरंगिणी अचिन्तयच्च सत्यं मे संप्रीतो भूतभावनः । सिद्धिविघ्नानमूर्न्दीर्घानपाकर्तुं ममुद्यतः ॥ १५३ ॥ १५३. उसने विचार किया - 'वास्तव में इन महान् सिद्धि-विघ्नों का दूर करने के लिये समुद्यत भूतभावन मुझ पर प्रसन्न हो गये हैं।' कृत्येषु बहुनि निष्पाद्ये श्रमात्क्रोसीधमाश्रयन् । प्रावृषीवाध्वगो दिष्ट्या मोहितोऽगरेम न निद्रया ॥ १५४ ॥ १५४. "सौभाग्य से, अनेक निष्पाद्य कृत्यों के रहते, श्रम से आलस्य का आश्रय लेते हुए, वर्षा कालीन पथिक सदृश, मैं निद्रा द्वारा मोहित नहीं हुआ।" स्वकाले त्यजता लक्ष्मीं विरक्तां बन्धकीमिव । हठनिर्वासनक्रीडा दिष्ट्या नासादिता मया ॥ १५५ ॥ १५५. "सौभाग्य से, अपने काल में स्वैरिणी सदृश विरक्त, लक्ष्मी को त्यागते हुए, मैंने बलात् निर्वासन क्रीडा को नहीं प्राप्त किया।" शैलूषस्येव मे राजरङ्गेऽस्मिन् वल्गतश्चिरम् । निर्व्यूढावपि वैरस्यं दिष्ट्या न प्रेक्षका गताः ॥ १५६ ॥ १५६. "इस राज्य रूपी रंगमंच पर शैलूष (नट) सदृश, चिरकाल तक मैंने नृत्य किया। सौभाग्य से उनकी समाप्ति पर भी दर्शक विरस नहीं हुए।" दिष्ट्या सदैव वैमुख्यमुच्चैरुद्घोषयञ्श्रियः । त्यागक्षणे न भीतोऽस्मि विकत्थन इवाऽऽहवे ॥ १५७ ॥ १५७. सौभाग्य से, मैंने लक्ष्मी के प्रति विमुखता का सदैव उद्घोष किया, अतएव इसके त्याग काल में, युद्ध के मध्य डींग हाँकने वाले की तरह, भयभीत नहीं हुआ।" पाठभेद : स्यैव' 'विण्यूढावपि' का 'निर्व्यूढाम्' 'निर्व्यूडमपि' श्लोक संख्या १५४ में 'श्रयन्' का 'श्रयम्' और तथा 'वैरस्यं' का पाठभेद 'वैराज्यं' मिलता है। 'क्रोसीद्य' का पाठभेद 'कौसीद्य' मिलता है। पादटिप्पणियां : श्लोक संख्या १५५ में 'स्वकाले' का 'सुकाले' १५६ (१) निर्व्यूढ : निर्व्यूढ शब्द एक पारि- 'स्वकूले' तथा 'विरक्ता' का पाठभेद 'संरक्ता' भाषिक शब्द है। जिसका अर्थ होता है किसी कथावस्तु मिलता है। का विश्लेषण करना। इसका अर्थ संस्कृत शब्द वस्तु समान होता है। राजतरं० ३:१८६, ७:६०६ और श्लोक संख्या १५६ में 'शैलूषस्येव' का 'शैलूप- ७:२७०७ द्रष्टव्य है।

द्वितीय तरंग ४४७ इति संचिन्तयन्नन्तः सर्वत्यागोन्मुखो नृपः । मनोरज्यानि कुर्वाणो दरिद्र इव पिप्रिये ॥ १५८ ॥ १५८. सर्व त्यागोन्मुख नृप यह अन्तश्चिन्तन् करते हुए; मनो राज्य करते, दरिद्र तुल्य नितरां प्रसन्न हुआ । अन्येद्युः प्रकृतीः सर्वाः संनिपत्य सभान्तरे । ताभ्यः प्रत्य( त्या ) र्पयन्न्यासमिव राज्यं सुरक्षितम् ॥ १५९ ॥ १५९. दूसरे दिन सभा में सब लोगों को बुलाकर, न्यास तुल्य सुरक्षित राज्य, उन्हें अर्पित कर दिया । उज्झितं स्वेच्छया तच्च प्रयत्नेनापि नाऽशकत् । तं स्वीकारयितुं कश्चित्फणीन्द्रमिव कञ्चुकम् ॥ १६० ॥ १६०. स्वेच्छया, त्यक्त राज्य को फणीन्द्र के कंचुक तुल्य प्रयत्न पूर्वक भी कोई, उसे ग्रहण कराने में समर्थ नहीं हुआ । अर्चालिङ्गमुपादाय सोऽथ प्रायादुदङ्मुखः । धौतवासा निरुष्णीषः पद्धत्यामेव प्रजेश्वरः ॥ १६१ ॥ १६१. धौत¹ वस्त्र धारण किये, बिना उष्णीष के, उत्तरमुखी प्रजेश्वर पैदल ही अर्चा (पूजन) लिंग² लेकर गया । तस्य पादार्पितदृशो व्रजतो मौनिनः प्रभोः । पन्थानं जगृहुः पौरा निश्शब्दस्रवदश्रयः ॥ १६२ ॥ १६२. नत मस्तक हो गमन करते मौनी उस प्रभु के मार्ग को निःशब्द अश्रुपात करते पुरवासियों ने ग्रहण किया । पाठभेद : (२) अर्चालिंग—लिंगायत लोग शिवलिंग श्लोक संख्या १५९ में 'संनिपत्य' का 'संनिपात्य' सर्वदा अपने पास रखते है । चाँदी की मन्दिराकार पाठभेद मिलता है । डिबिया में दोनो ओर कोके लगे रहते है । उनमें : श्लोक संख्या १६० में 'तच्च' का पाठभेद यज्ञोपवीत की दोनों छोर दोनों ओर से बाँध देते हैं । 'तं च' तथा 'ते च' मिलता है । यज्ञोपवीत तुल्य उसे पहनते हैं । डिबिया को प्रतिदिन पादटिप्पणियाँ : खोलकर उसमें स्थित शिवलिंग की पूजा करते हैं । १६१ ( १ ) धौतवस्त्र : प्रो विल्सन ने इस लिंग को लिंगायत प्रति दिन अर्चा अर्थात् यहाँ पर धोती शब्द का प्रयोग किया है । (पृष्ठ ३२) पूजा करते हैं । यह सम्प्रदाय ग्यारहवी शताब्दी कल्हण ने धोती नहीं धौत अर्थात् उज्ज्वल वस्त्र का में दक्षिण में प्रचलित हुआ और बढ़ता गया । उल्लेख किया है । नीलमत में वस्त्र के अन्तर्गत उत्तर भारत में निसन्देह यह अति प्राचीन काल से प्रायः वस्त्र, अम्बर, वासा, वसन, संवित, चांलातुक प्रचलित था । आदि आ जाते हैं । ( श्लोक ५६२, ७८६, ८५१, पाठभेद : ४३५, १२७७, १३२८, ४३२, ४४२, ९२, ५७६ ) श्लोक संख्या १६२ में 'मौनिनः' का पाठभेद 'मानिनः' मिलता है ।

४४८ राजतरंगिणी स विलङ्घितगव्यूतिरूपविश्य तरोरधः । जनमेकैकमुद्बाष्पं न्यवर्तयत सान्त्वयन् ॥ १६३ ॥ १६३. एक गव्यूति¹ गमनानन्तर तरु तले बैठ कर के उसने अश्रु पूर्ण प्रत्येक जन को सान्त्वना देते हुए परावृत्त किया । पथि शिखरिणां मूले मूले विलम्ब्य जहज्जनान्- मितपरिकरो गच्छन्नूर्ध्वं क्रमात्समदृश्यत । गहनवसुधाः संपूयोच्चैर्ब्रजन्स निजात्पदा- ह्रद इव विनिर्यातः स्तोकैः कृतानुगमो जलैः ॥ १६४ ॥ १६४. मार्ग में शिखराणियों के मूल मूल में रुक कर, लोगों को परावृत्त करते मित परिकर वह, क्रम से ऊपर जाते हुए, गहरी भूमि को पूर्ण कर पुनः अपने स्थान से कोई जल के साथ सवेग गमनशील नद सदृश दिखाई पड़ा। निश्शेषं निकटात्स लोकमटवीमध्ये निरुन्धन्पदं शोकावेशसबाष्पगद्गदपदं संमान्य चोत्सार्य च । भूर्जत्वक्परिरोधमर्मरमरुन्निद्राणसिद्धाध्वग- श्रेणीमौलिमणिप्रभोज्ज्वलगुहागेहं जगाहे वनम् ॥ १६५ ॥ १६५. अटवी मध्य रुक कर, शोकावेश के कारण अश्रु पूर्ण एवं रुद्ध वाणी से युक्त, समस्त लोगों को अपने निकट से परावृत्त कर, संमान्य उसने वन में प्रवेश किया; जहां कि भूर्जपत्रों¹ के परिरोध के कारण मर्मर ध्वनि पूर्ण मरुत् से शयन करते, सिद्ध पथिक गण के मस्तक स्थित मणि की कान्ति से गुहा गृह² समुज्ज्वल हो रहे थे। पादटिप्पणियाँ : १६३ ( १ ) गव्यूति : यह माप का एक पारि- भाषिक शब्द है। एक गव्यूति की दूरी एक कोश होती है। यह कैल्टिक दाब्द लोग तथा आंग्लीसी नाप में २ मील तथा ७४३ गज होता है। पाठभेद : श्लोक संख्या १६४ में 'मित' का 'नित' तथा 'कृतानुगमो' का पाठभेद 'स्वोशानुगमो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १६४ (१) साहित्य दर्पण शमे सरिणी शब्द का उल्लेख दर्पण के लिये दिया गया है। शिखरिणी शङ्ख सु नाम हिमविश्वर, हिमविश्वाक्षममापकरोदयः। मुमुलि येन तवाधरपाटलं दिशति बिम्बरुक्षं शुकशायकः ॥ नदी का जल अत्यधिक बढ़कर तटों पर फैल जाता है तब भी जल की गति नदी के अधोभाग की ही ओर होती है। पाठभेद : श्लोक संख्या १६५ में 'निरुन्धन्' का 'निरुन्ध्यन्' 'निदध्यन्' 'निदन्धन्' 'निरुद्धयन्' 'भूर्ज त्वक' का 'मूर्द्धत्वक' 'मर्मर; का 'मंन्टर' 'मर्दुर' 'मर्जर' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १६५ ( १ ) भूर्ज : मूल संस्कृत शब्द का

९ द्वितीय तरंग

[बायाँ स्तम्भ]

आर्य भोजपत्र है। कश्मीर में यह बहुत होता है। जोजिला पास के समीप इसके वृक्ष खूब मिलते हैं। प्राचीन काल में यह कागज के स्थान पर प्रयुक्त किया जाता था। परन्तु गृह त्यागी संन्यासी अथवा मग्न गण इसका वस्त्र बनाकर भी पहनते थे। हवन के काम में भी इसका प्रयोग किया जाता है। यह पवित्र माना गया है। भोजपत्र के बने पहनने के साधनों को वल्कल कहा जाता था। भोजपत्र पर चन्दन तथा केसर से तान्त्रिक यन्त्र और कवच लिख कर ताबीज के ढंग पर पहनने की प्रथा थी, और है।

उर्ध्व काबुल उपत्यका में स्तूपों से भोजपत्र पर लिखे गये अभिलेख प्राप्त हुए हैं। सन् १८९२ ई० मे फ्रेंच अन्वेषक श्री दुवरिगुल डी रहिन को खोतान से बहुत दूर पर खरोष्ट्री भाषा में लिखे गये भोज पत्र पर अभिलेख मिले थे। वह पाण्डुलिपि धम्म पद की थी। प्राकृत भाषा में थी। मध्य एशिया में संस्कृत पाली, प्रकृति और कुशान भाषा में ये जर्मन रूसी तथा फ्रेंच विद्वानो को भोजपत्र पर लिखे लेखादि प्राप्त हुए थे।

भोजपत्र कश्मीर से मध्य एशिया में भेजा जाता था। भूर्जपत्र के वृक्ष लगभग १४००० फिट ऊंचाई पर पाये जाते हैं। इसका भी नर एवं मादा प्रकार होता है। नर शरद तथा मादा बसन्त ऋतु में प्रकट होता है। भोजपत्र अनेक प्रकार के होते हैं। उनमें कानू पीत, रक्त, कृष्ण, धूसर वर्ण के मुख्य होते हैं। कानू भूर्ज पत्र को श्वेत भूर्ज भी कहा जाता है। इसकी छाल श्वेत होती है। यह पतली होती है। लिखने के लिये उत्तम मानी गयी है। इस छाल से आभूषण, टोकरियाँ, प्यालो, तश्तरी आदि बनाया जाता है। इसका सूगदो से जूते के साँचे तथा फरमे भी बनाये जाते हैं। हिमालय के अतिरिक्त उत्तरी अमेरिका, कनाडा तथा उत्तरी यूरोप में मिलता है। ५७


[दायाँ स्तम्भ]

पीत भूर्ज पत्र को रजत भूर्ज पत्र भी कहते हैं वृक्ष के वयस्क होने पर इसकी छाल धुंधले-धूसर वर्ण की हो जाती है। यह लकड़ी का फर्नीचर, खेती के औजार तथा गृहस्थी के कार्यों के लिये अच्छा होता है। रक्त भूर्ज पत्र जलाशयों के समीप मिलता है। इसे नदी भूर्ज पत्र भी कहते हैं। दल- दली भूमि, सरोवरों, नदो के तटों पर वृक्ष उगते हैं। इसके छाल का वर्ण पहले गुलाबी होता है। तत्पश्चात् काला हो जाता है। इसके वृक्ष ५० से ६० फिट ऊँचे होते हैं। दक्षिण अमेरिका में विशेषतया प्राप्त होता है।

कृष्णभूर्ज पत्र का वृक्ष ६० से ८० फिट ऊंचा होता है। इसका शीर्ष शोभनीय होता है। शाखायें पतली तथा टहनियाँ कोमल होती हैं। इसकी लकड़ी कृष्ण वर्ण तथा कठोर होती है। फर्नीचर आदि तथा गृहों के सजाने के लिये इसकी लकड़ी अच्छी होती है। धूसर भूर्ज पत्र का वृक्ष ४० फिट से अधिक ऊंचा नही होता। अमेरिका के अनेक राज्यों में इसके वृक्ष मिलते हैं। छाल कड़ी और परतें एक दूसरे के साथ मजबूती से चिपकी रहती हैं। यह जलाने के काम में आता है। इसके साँचे बनाये जाते हैं।

गुहागेह से इस स्थान पर बुमजू की गुफाओं की ओर संकेत होता है। स्टीन ने बुमजू की गुफाओं को इन गुहा गेहों को मानने में सन्देह किया है। यह ठीक है। किन्तु हसन ने बुमजू ही की गुफा माना है।

मेरा मत है कि यह स्थान भ्रूज होम अथवा ब्रजहोम है। इस स्थान पर खनन कार्य भारतीय पुरातत्त्व विभाग की तरफ से हो रहा है। श्री त्रिलोक नाथ खजाञ्ची कार्य कर रहे हैं। ब्रूज होम एक छोटी सी पहाड़ी है। उसके प्रायः तीन तरफ पर्वत माला है। श्रीनगर उत्तर दिशा में पड़ता है।

४५० राजतरंगिणी राजा सन्धिमति उत्तर दिशा की ओर चलता हुआ भूर्ज पत्तों के मर-मर से पूर्ण गुहागेह में रहने वाले सिद्ध जनो के स्थान पर पहुँचता है । वहाँ से वह पुनः नन्दि क्षेत्र की तरफ जाता है । नन्दि- क्षेत्र हर मुकुट पर्वत पर है । हरिमुकुट की यात्रा वे गन्ध अर्थात् सिन्ध वैलो होने पुनः हरमुकुट गंगा का मार्ग पकड़ते हुए नारायण बल होते, गंगाबल पहुँचते हैं । इस समय यहाँ की यात्रा कर श्रीनगर आदि होते, नारायण बल की तरफ से लौटते है । मैने ब्रूजहोम की गुफाएं देखी है । आजकल भी भारतवर्ष के कितने ही स्थानों पर साधु इस प्रकार की गुफाओं में रहते है । मै समझता हूँ ब्रूजहोम का नाम भूर्ज वृक्ष के आधार पर पड़ा है। इन गुफाओ में कौन रहते थे । उनमे मानव कंकाल ६॥ फुट लम्बे तक के मिले हैं। गाड़ने की प्रथा हिन्दुओ मे नही थी। केवल साधु संन्यासी अथवा सिद्ध गण समाधि लेते थे । तत्कालीन समय में यहाँ केवल हिन्दू रहते थे । अतएव सन्धिमान सिद्धजनो के स्थान में पहुँचता नन्दि पर्वत गया था । यह स्थान नन्दि पर्वत यात्रा के मार्ग में है । अतएव यही स्थान गुहागेह निवासियो का है । १ गव्यूती : हरकन में टाइल्स मिली है जिनमें लोगो के उँकड़ू बैठे हुए दिखाया गया है । यही आसन समाधि में मिले दो चार कंकालों का मैने देखा है। वे लम्बे सुला कर नही गाडे गए थे । उँकडू अधिक मिले हैं। समाधि देने की प्रथा है कि पद्मासन लगाकर समाधि में रख देते थे, एक प्रकार और था । खड़ी शव समाधि में सड़ाकर ऊपर से मिट्टी डाल देते थे । यहाँ खड़े शव पद्मासन रूप में रखा गया होगा । कालान्तर में एक पैर खुल गया और पृष्ठ भाग गड्ढे में पीछे लग गया । यही रूप खडे शव का है । यहाँ पर ईंटें भी मिली हैं । इन ईंटों का आकार नारायण नाग में मिली ईंटों से मिलता है । स्टाइन सन्धिमति का काल १०४४१ वर्ष देता है । चाहे यह समय बिल्कुल ठीक भी न हो परन्तु सन्धिमति का समय २ हजार वर्ष पूर्व ही ठहरता है । यदि वैज्ञानिक शोधन से यह शव दो हजार वर्ष पूर्व का ठहरता है तो मेरा अनुभव ठीक है। यहाँ मैने एक शव और देखा । जिसके मस्तक की हड्डियाँ टूटी थीं । एक प्रथा थी शव समाधि में रखने पर मूर्धापर नारियल अथवा ऐसी चीज से मारते थे कि मूर्धा भग्न होजाय । यही कार्य कपाल क्रिया के रूप मे श्मशान में की जाती है । मस्तक तोड़ दिया जाता है । पत्थर के सामान यहाँ मिलते हैं। साधुओं को धातु स्पर्श निषेध किया गया है। आज कल भी संन्यासी लोग पत्थर के बर्तनों में भोजन करते हैं । सभी गृहस्थों के यहाँ चटनी आदि खाने तथा खट्टा और दही आदि चीज रखने के लिए पथरी रखी जाती है। इसका अर्थ यह नही है कि हम पत्थर युग में हैं। हड्डियों की सुइयों के विषय में यही कहना अलम है कि धातु की सुई बनाना वर्जित था । पर मूर्तियाँ जो निकली हैं वे हिन्दू काल की हैं उन्हें लोहे छेनी से गढ़ा गया है। वे हड्डियों तथा पत्थरो के औजारों से नही बन सकती थी अतएव उस समय लोहा का आविष्कार हो चुका था। जब लोहा प्राप्त था तो हड्डियों की सुई क्यों बनाई गयी । इसका एक मात्र कारण यही है कि धातु का स्पर्श वर्जित था । मेरा उक्त मत केवल अनुमान पर आधारित है। गुहागेह का शब्दार्थ इस बात की ओर लक्ष करता है कि गुफा प्रकार के घरों मे लोग निवास करते है। अफगानिस्तान के बामियान स्थान में पर्वत में सैकड़ो से भी अधिक गुफा मैने स्वयं देखी हैं यहाँ भिक्षु तथा वहाँ रहने वाले उन गुफाओ में रहते थे । इस समय अनेक गुहागृह ध्वस्त हो गये हैं । परन्तु अत्यधिक अपना रूप कायम किये हैं। यह पहाड़ पत्थर के नही सख्त मिट्टी के हैं । इस लिये गुफायें बहुत नष्ट हो गयी हैं अथवा गिर गयी है।

द्वितीय तरंग ४५१ अथ वनसरसीतटद्रुमाधः पुटकघटोदरसंभृताम्बुपूराम् । वसतिमकृत वासरावसाने शुचितरपल्लवकल्पितोन्नतल्पाम् ॥ १६६ ॥ १६६. दिवस के अवसान में वन सरसी ( सरोवर ) तटपर तरु तले जल पूर्ण पुटक¹ घट के साथ पवित्र तरु पल्लवों से तल्प निर्मित कर निवास किया । शृङ्गासक्तमितातपाः शवलितच्छायाभुवः शाद्वलै- रुत्फुल्लामलमह्लिकालतमिलत्सुप्तव्रजस्त्रीजनाः । सध्वाना वनपालवेणुरणितोन्मिश्रैः प्रपाताम्बुभिः श्रान्तं दृक्पथमागतास्तमनयन्निद्रामदूराद्रयः ॥ १६७ ॥ १६७. दृष्टिगोचर निकटवर्ती उस पर्वत ने श्रान्त उसको निद्रित कर दिया, जिसकी शिखरों पर मित आतप पड़ रहा था, जहाँ हरी-हरी घासों में छाया भू चित्रित तथा उत्फुल्ल अमल मल्लिका तले, व्रजस्त्री-जन प्रसुप्त थी और जो वनपालों के वेणु ध्वनि से पूर्ण निर्झर जल द्वारा निनादित हो रहा था । वनकरिरसितैः पदे पदे स प्रतिभटतां पटहध्वनेर्दधानैः । अमनुत रटितैश्च कर्करेटोः परिगलितां गमनोन्मुखस्त्रियामाम् ॥ १६८ ॥ १६८. गमनोन्मुख उसने पद पद पर, पटह ध्वनि, सदृश वन गज गर्जनों एवं काक ध्वनियों से रात्रि को परिगलित समझा ।¹ पाठभेद : श्लोक संख्या १६६ में 'तल्पाम्' का पाठभेद 'तल्पम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : कल्हण ने पुटक का उल्लेख तरंग १:२१३ श्लोक में भी किया है । यहां उसने पुनः उसको दोहराया है । पाठभेद : श्लोक संख्या १६७ में 'मितातपाः' का 'सितातपाः' 'इत्फुल्ला' का 'ल्लासा' तथा 'पालवेणु' का पाठभेद, 'पालरेणु' मिलता है । श्लोक संख्या १६८ में 'वनकरि' का 'वनहरि' तथा 'घनेर्द' का पाठभेद 'घ्यनेर्द' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १६८ ( १ ) वनवर्णन, वन गमन वर्णन कल्हण ने यहाँ पुरा. कवियों की शैली पर किया है ।

[४५०] राजतरंगिणी


[बायाँ स्तम्भ]

राजा सन्धिमति उत्तर दिशा की ओर चलता हुआ भुज पत्तों के मर-मर से पूर्ण गुहागेह में रहने वाले सिद्ध जनों के स्थान पर पहुँचता है। वहाँ से वह पुनः नन्दि क्षेत्र की तरफ जाता है। नन्दि- क्षेत्र हर मुकुट पर्वत पर है। हरिमुकुट की यात्रा वे गन्ध अर्थात् सिन्ध वैलो होने पुनः हरमुकुट गंगा का मार्ग पकड़ते हुए नारायण बल होते, गंगाबल पहुँचते हैं। इस समय यहाँ की यात्रा कर श्रीनगर आदि होते, नारायण बल की तरफ से लौटते हैं। मैंने ब्रूजहोम की गुफाएँ देखी हैं। आजकल भी भारतवर्ष के कितने ही स्थानों पर साधु इस प्रकार की गुफाओं में रहते हैं। मै समझता हूँ ब्रूजहोम का नाम भूर्ज वृक्ष के आधार पर पड़ा है। इन गुफाओ में कौन रहते थे । उनमें मानव कंकाल ६॥ फुट लम्बे तक के मिले हैं। गाड़ने की प्रथा हिन्दुओं मे नहीं थी। केवल साधु संन्यासी अथवा सिद्ध गण समाधि लेते थे। तत्कालीन समय में यहाँ केवल हिन्दू रहते थे। अतएव सन्धिमान सिद्धजनों के स्थान में पहुँचता नन्दि पर्वत गया था। यह स्थान नन्दि पर्वत यात्रा के मार्ग मे है। अतएव यही स्थान गुहागेह निवासियो का है।

१ गव्यूती : हुरकन में टाइल्स मिली है जिनमें लोगो के उँकडू बैठे हुए दिखाया गया है। यही आसन समाधि में मिले दो चार कंकालो का मैने देखा है। ये लम्बे सुला कर नही गाड़े गए थे। उँकडू अधिक मिले हैं। समाधि देने की प्रथा है कि पद्मासन लगाकर समाधि में रख देते थे, एक प्रकार और था। खड़ी शव समाधि में खड़ाकर ऊपर से मिट्टी डाल देते थे। यहाँ खड शव पद्मासन रूप में रखा गया होगा। कालान्तर में एक पैर खुल गया और पृष्ठ भाग गड्ढे में पीछे लग गया। यही रूप खड़े शव का है।

यहाँ पर ईंटें भी मिली हैं। इन ईंटों का आकार नारायण बाग में मिली ईंटों से मिलता है। स्टाइन सन्धिमति का काल १०४४। वर्ष देता


[दायाँ स्तम्भ]

है। चाहे यह समय बिलकुल ठीक भी न हो परन्तु सन्धिमति का समय २ हजार वर्ष पूर्व ही ठहरता है। यदि वैज्ञानिक शोधन से यह शव दो हजार वर्ष पूर्व का ठहरता है तो मेरा अनुभव ठीक है। यहाँ मैने एक शव और देखा। जिसके मस्तक की हड्डियाँ टूटी थीं। एक प्रथा थी शव समाधि में रखने पर मूर्धापर नारियल अथवा ऐसी चीज से मारते थे कि मूर्धा भग्न होजाय। यही कार्य कपाल क्रिया के रूप मे श्मशान में की जाती है। मस्तक तोड दिया जाता है। पत्थर के सामान यहाँ मिलते हैं। साधुओ को धातु स्पर्श निषेध किया गया है। आज कल भी संन्यासी लोग पत्थर के बर्तनों में भोजन करते हैं। सभी गृहस्थो के यहाँ चटनी आदि खाने तथा खट्टा और दही आदि चीज रखने के लिए पथरी रखी जाती है। इसका अर्थ यह नही है कि हम पत्थर युग में हैं। हड्डियों की सुइयो के विषय में यही कहना अलम है कि धातु की सुई बनाना वर्जित था। पर मूर्तियाँ जो निकली हैं वे हिन्दू काल की हैं उन्हें लोह छेनी से गढा गया है। वे हड्डियो तथा पत्थरों के ओजारो से नही बन सकती थी अतएव उस समय लोहा का आविष्कार हो चुका था। जब लोहा प्राप्त था तो हड्डियो की सुई क्यों बनाई गयी। इसका एक मात्र कारण यही है कि धातु का स्पर्श वर्जित था। मेरा उक्त मत केवल अनुमान पर आधारित है। गुहागेह का शब्दार्थ इस बात की ओर लक्ष करता है कि गुफा प्रकार के घरों में लोग निवास करते हैं। अफगानिस्तान के बामियान स्थान में पर्वत में सैकड़ों से भी अधिक गुफा मैने स्वयं देखी है जहाँ भिक्षु तथा वहाँ रहने वाले उन गुफाओं में रहते थे। इस समय अनेक गुहागृह ध्वस्त हो गये हैं। परन्तु अत्यधिक अपना रूप कायम किये हैं। यह पहाड़ पत्थर के नही सख्त मिट्टी के हैं। इस लिये गुफायें बहुत नष्ट हो गयी हैं अथवा गिर गयी हैं।

द्वितीय तरंग ४५१ अथ वनसरसीतटद्रुमाधः पुटकघटोदरसंभृताम्बुपूरम् । वसतिमकृत वासरावसाने शुचितरुपल्लवकल्पितोद्यतल्पाम् ॥ १६६ ॥ १६६. दिवस के अवसान में वन सरसी (सरोवर) तटपर तरु तले जल पूर्ण पुटक१ घट के साथ पवित्र तरु पल्लवों से तल्प निर्मित कर निवास किया । शृङ्गासक्तमितासपाः शवलितच्छायाभुवः शाद्वलै- रुत्फुल्लामलमल्लिकातलमिलत्सुप्तव्रजस्त्रीजनाः । सध्वाना वनपालवेणुरणितोन्मिश्रैः प्रपाताम्बुभिः श्रान्तं दृक्पथमागतास्तमनयन्निद्रामदूराद्रयः ॥ १६७ ॥ १६७. दृष्टिगोचर निकटवर्ती उस पर्वत ने श्रान्त उसको निद्रित कर दिया, जिसकी शिखरों पर मित आतप पड़ रहा था, जहाँ हरी-हरी घासों में छाया भू चित्रित तथा उत्फुल्ल अमल मल्लिका तले, व्रजस्त्रीजन प्रसुप्त थी और जो वनपालों के वेणु ध्वनि से पूर्ण निर्झर जल द्वारा निनादित हो रहा था । वनकरिरसितैः पदे पदे स प्रतिभटतां पटहध्वनेर्दधानैः । अमनुत रटितैश्च कर्करेटोः परिगलितां गमनोन्मुखस्त्रियामाम् ॥ १६८ ॥ १६८. गमनोन्मुख उसने पद पद पर, पटह ध्वनि, सदृश वन गज गर्जनों एवं काक ध्वनियों से रात्रि को परिगलित समझा ।१ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या १६६ में 'तल्पाम्' का पाठभेद श्लोक संख्या १६७ में 'मिताउपा:' का 'सिता- 'तल्पम्' मिलता है । तपाः' 'उत्फुल्ला' का 'स्फाया' तथा 'पालवेणु' का पाठभेद 'पालेरेणु' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १६८ में 'वनकरि' का 'वनहरि' तथा 'ध्वनेर्' का पाठभेद 'ध्वनेंद्वं' मिलता है । कल्हण ने पुटक का उल्लेख तरंग १:२१३ पादटिप्पणियाँ : श्लोक में भी किया है। यहां उसने पुनः उसको १६८ (१) वनवर्णनः इस दृश्य वर्णन दोहराया है । कल्हण ने यहाँ पुरू. कवियों की शैली पर किया है ।

४५२ | राजतरंगिणी अन्येद्युर्विधिवदुपास्य पूर्वसंध्या- मासन्ने नलिनसरस्यपास्तनिद्रः । क्ष्मापालः परिचितसोदराम्बुतीर्थं नन्दीशाध्युषितमवाप भूतभर्तुः ॥ १६९ ॥ १६९. दूसरे दिन पार्श्ववर्ती नलिन सरसी में अपनी निद्रा तिरोहित कर (स्नानकर) राजा ने पूर्व सन्ध्योपासन किया अनन्तर नन्दीश समीपस्थ भूतभर्ता१ (भूतेश्वर) परिचित सोदर२ तीर्थ में पहुँचा। नन्दिक्षेत्रे त्रिभुवनगुरोः सोऽग्रतस्तत्र याव- त्तस्थौ तावत्स्वयमभिमतावाप्तये जायते स्म । भस्मस्मेरः सुघटितजटाजूटबन्धोऽक्षसूत्री रुद्राक्षाङ्को जरठमुनिभिः सस्पृहं वीक्ष्यमाणः ॥ १७० ॥ १७०. भस्म स्मेर सुघटित, जटाजूट बन्ध से युक्त, अक्ष सूत्री, रुद्राक्ष अंकित एवं वृद्ध मुनियों से सस्पृह वीक्ष्यमाण वह नन्दिक्षेत्र१ में त्रिभुवन गुरु के सम्मुख जब तक स्थित रहा तब तक उसके अभिलषित की प्राप्ति हुई। भ्राम्यञ्श्रीकण्ठदत्तव्रतजनितमहासत्क्रियो भैक्षहेतो- र्भिक्षादानोद्यतासु प्रतिमुनिनिलयं संभ्रमात्तापसीषु । वृक्षैर्भिक्षाकपाले शुचिफलकुसुमस्रेणिभिः पूर्यमाणे मान्यो वैराग्ययोगेऽप्यनुपनतपरप्रार्थनालाघवोऽभूत् ॥ १७१ ॥ १७१. श्रीकण्ठव्रत के कारण अत्यधिक संस्कृत यह जब भिक्षा हेतु प्रत्येक मुनि गृह में जाता तो तपस्विनियों सोत्साह स्पर्धा पूर्वक भिक्षा देने के लिये उद्यत रहती थीं। किन्तु वृक्षों द्वारा पवित्र पुष्प फल से कपाल (भिक्षापात्र) के पूर्ण हो जाने से, मान्य उसने वैराग्य योग में भी याचना लाघव को नहीं प्राप्त किया १६९ (१) भूतेश्वर : पृष्ठ १४९ द्रष्टव्य है। १७० (१) नन्दिप्रवेश क्षेत्रः पृष्ठ ७६ द्रष्टव्य यात्रा में भूतेश्वर दर्शन का उल्लेख कल्हण ने पूर्व हैं। भस्म की उज्ज्वल वर्ण की उपमा कल्हण ने श्लोक संख्या २:१२३ में किया है। नीलमत पुराण स्मित दन्त पंक्ति के उज्ज्वल वर्ण से दिया है। श्लोक 1047, 1118, 1242, 1335, द्रष्टव्य हैं। पाठभेद : (२) सोदर : पृष्ठ १४५ द्रष्टव्य है। नीलमत श्लोक संख्या १७१ में 'भ्राम्यञ्श्री' का 'भ्राम्य- पुराण श्लोक, 1330, 486, 1113, 1115, ष्ट्री', 'योगे' का 'योगो' तथा 'नुपनत' का पाठभेद 1325, 1330 भी द्रष्टव्य हैं। 'नुदतन' 'नुदनत' 'नपतन' मिलता है।

द्वितीय तरंग ४५३ इति श्रीकाश्मीरिकमहामात्यचम्पकप्रभुसूनोः कल्हणस्य कृतौ राजतरङ्गिण्यां द्वितीयस्तरङ्गः ॥ इस प्रकार काश्मीर के महामात्य चम्पक प्रभु के पुत्र कल्हण विरचित राजतरंगिणी में, द्वितीय तरंग समाप्त हुआ । इति पाठ में 'चप्पक' का पाठभेद 'चम्पक' शतद्वये वत्सराणामष्टाभिः परिवर्जिते । तथा 'वप्पक' मिलता है । अस्मिन्द्वितीये व्याख्याताः षट् प्रख्यातगुणा नृपाः ॥ एशियाटिक सोसायटी बंगाल से प्रकाशित सन् १८३५ ई० की प्रति में इति पाठ के पश्चात् एक सौ बानवे वर्ष में इस द्वितीय तरंग कथित निम्नलिखित पाठ और दिया गया है । पृष्ठ ३१ प्रख्यात गुण वाले ६ नृप हुए । श्री स्तीन ने प्रथम किन्तु इसका अनुवाद श्री स्तीन तथा श्रो पण्डित ने भाग परिशिष्ट एक के पृष्ठ १३५ पर द्वितीय तरंग नहीं दिया है । अन्य अनुवादकों ने इसका अनुवाद की काल गणना इसी श्लोक के आधार पर दी है । दिया है मैं यहाँ मूल तथा अनुवाद दोनों देता हूँ । उनका वर्णित १९२ इस श्लोक में यथावत् है ।

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अथ श्री कल्हण कृतायां राजतरङ्गिण्याम् तृतीयस्तरङ्गः

तृतीय तरंग के राजा गोनन्द वंश पुनरस्थापित नाम राजा राज्यकाल वर्ष लौकिक संवत् ( १ ) मेघवहन ३४ ३०८८ ( २ ) श्रेष्ठसेन-प्रवरसेन (तुञ्जीन द्वितीय) १२ ( ३ ) हिरण्य-तोरमाण ( ४ ) मातृ गुप्त २-० ( ५ ) प्रवरसेन द्वितीय १-११ ( ६ ) युधिष्ठिर द्वितीय १-१ ( ७ ) लग्न नरेन्द्रादित्य -१ ( ८ ) रणादित्य (तुंजीन तृतीय) ( ९ ) विक्रमादित्य ( १० ) बालादित्य

अथ तृतीयस्तरङ्गः मुञ्चेभाजिनमस्य कुम्भकुहरे मुक्ताः कुचाग्रोचिताः किं भालज्वलनेन कज्जलमतः स्वीकार्यमक्ष्णोः कृते । संधाने वपुरर्धयोः प्रतिवदन्नेवं निषेधेऽप्यहेः कर्तव्ये प्रियोत्तरानुसरणोद्युक्तो हरः पातु वः ॥ १ ॥ १. 'गज चर्म त्याग दे' इसके कुम्भ कुहर में (तुम्हारे) कुचाग्रोचित मुक्ता होते हैं,' 'भालस्थ' ज्वलन (अग्नि) से क्या लाभ ?" 'इससे नेत्रों के लिये कज्जल प्राप्त होते हैं।' अर्धाङ्ग विषयक प्रश्न का उत्तर देकर, इसी प्रकार प्रिया के अहि का निषेध करने पर, उत्तर अन्वेषण में उद्यत, शिव आप लोगों की रक्षा करें।' अथोल्लसत्पृथुश्लाघमानिन्युर्मेघवाहनम् । गान्धारविषयं गत्वा सचिवाधिष्ठिताः प्रजाः ॥ २ ॥ मेघवाहन१ २. मन्त्रियों के नियन्त्रण में प्रजा गान्धार देश२ जाकर, मेघवाहन को ले आयी, जिसकी प्रचुर प्रशस्ति फैल रही थी । पाठभेद : (१) २ श्री विलसन मेघवाहन का अभिषेक 'श्री गणेशाय नमः' से भी तरंग का आरम्भ काल सन् २३ ई० ३ मास तथा राज्य काल ३४ होता है । वर्ष देते है । पादटिप्पणियाँ : श्री एस पी. पण्डित यह समय सन् २४ ई० (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५३ वाँ तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं। श्लोक है। उक्त पद का भावार्थ निम्नलिखित होगा । थोस्तोन अभिषेक काल लौकिक संवत् ३०८८ देहार्ध द्वय मिलन समय पार्वती ने जिज्ञासा की तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं । 'गजाजिन परित्याग कर दीजिये ।' महादेव ने श्री वाली ने यह काल सप्तर्षि संवत् ३९७९ उत्तर दिया-'इसके कुम्भ के मध्य में तुम्हारे तथा सन् २०६ ई० देते हैं। पयोधर भूषण के उपयुक्त मुक्ता राशि निहित है। अबुल फजल आइने अकबरी में मेघवाहन का पार्वती ने पुनर्जिज्ञासा की-ललाट स्थित अनल नाम मगदहन देता है । का प्रयोजन क्या है ? महादेव ने उत्तर दिया- ट्रापर यह समय सन् २४ ईस्वी तथा ९ मास 'वहाँ से तुम्हारा लोचन भूषण कज्जल प्राप्त होगा।' देते हैं। कनिघम यह समय सन् ३८३ ई. मानते हैं। इस प्रकार प्रत्युत्तर देकर प्रियतमा के सर्प निषेध हसन लिखता है-'राजा मेघवाहन राजा सूचक प्रश्न के चिन्तन अनुसरण उद्यत हर आप अरीराय (सन्धिमत) के इस्तीफा देने के बाद लोगो की रक्षा करें । संवत् ३४ में तुरन्त सल्तनत पर अलवागर ५८

तृतीय तरंग के राजा गोनन्द वंश पुनरस्थापितः नाम राजा राज्यकाल वर्ष लौकिक संवत ( १ ) मेघव हन ३४ ३०८८ ( २ ) श्रेष्ठसेन-प्रवरसेन (तुञ्जीन द्वितीय) ३० ३१२२ ( ३ ) हिरण्य-तोऱमाण ३०-२-० ३१५२ ( ४ ) मातृ गुप्त ४-९-१ ३१८२-२-० ( ५ ) प्रवरसेन द्वितीय ६० ३१८६-१-११ ( ६ ) युधिष्ठिर द्वितीय ३९-२-० ३२४६-११-१ ( ७ ) लखन नरेन्द्रदित्य १३ ३२८६-२-१ ( ८ ) रणादित्य ( तुञ्जीन तृतीय) ३०० ३२९९-२-१ ( ९ ) विक्रमादित्य ४२ ३५९९-२-१ ( १० ) बालादित्य ३६-८-० ३६४१-२-१ ५८६-१०-१

अथ तृतीयस्तरङ्गः मुञ्चेभाजिनमस्य कुम्भकुहरे मुक्ताः कुचाग्रोचिताः किं भालज्वलनेन कज्जलमतः स्वीकार्यमक्ष्णोः कृते । संधाने वपुरर्धयोः प्रतिवदन्नेवं निषेधेऽप्यहेः कर्तव्ये प्रियोत्तरानुसरणोद्युक्तो हरः पातु वः ॥ १ ॥ १. 'गज चर्म त्याग दे' इसके कुम्भ कुहर में ( तुम्हारे ) कुचाग्रोचित मुक्ता होते हैं' 'भालस्थ' ज्वलन ( अग्नि ) से क्या लाभ ?' 'इससे नेत्रों के लिये कज्जल प्राप्त होते हैं।' अर्द्धाङ्ग विषयक प्रश्न का उत्तर देकर, इसी प्रकार प्रिया के अहि का निषेध करने पर, उत्तर अन्वेषण में उद्यत, शिव आप लोगों की रक्षा करें ।' अथोल्लसत्पृथुरलाघमानिन्युर्मेघवाहनम् । गान्धारविषयं गत्वा सचिवाधिष्ठिताः प्रजाः ॥ २ ॥ मेघवाहन१ २. मन्त्रियों के नियन्त्रण में प्रजा गान्धार देश२ जाकर, मेघवाहन को ले आयी, जिसकी प्रचुर प्रशस्ति फैल रही थी । पाठभेद : 'श्री गणेशाय नमः' से भी तरंग का आरम्भ होता है । पादटिप्पणियाँ : (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५३ वाँ श्लोक है। उक्त पद का भावार्थ निम्नलिखित होगा । देहार्ध द्वय मिलन समय पार्वती ने जिज्ञासा की 'गजाजिन परित्याग कर दीजिये।' महादेव ने उत्तर दिया—'इसके कुम्भ के मध्य में तुम्हारे पयोधर भूषण के उपयुक्त मुक्ता राशि निहित है । पार्वती ने पुनजिज्ञासा की—ललाट स्थित अनल का प्रयोजन क्या है ? महादेव ने उत्तर दिया— 'वहाँ से तुम्हारा लोचन भूषण कज्जल प्राप्त होगा।' इस प्रकार प्रत्युत्तर देकर प्रियतमा के सर्प निषेध सूचक प्रश्न के चिन्तन अनुसरण उद्यत हर आप लोगों की रक्षा करें । ५८ ( १ ) २ प्रो विल्सन मेघवाहन का अभिषेक काल सन् २३ ई० ३ मास तथा राज्य काल ३४ वर्ष देते हैं । श्री एस. पी. पण्डित यह समय सन् २४ ई० तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं । थोस्तीन अभिषेक काल लौकिक संवत् ३०८६ तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं । श्री बालो ने यह काल सप्तर्षि संवत् ३९७९ तथा सन् २०६ ई० देते हैं । अबुल फजल आइने अकबरी में मेघवाहन का नाम मगदहन देता है । ट्रायेर यह समय सन् २४ ईस्वी तथा ९ मास देते हैं । कनिंघम यह समय सन् ३८३ ई. मानते हैं । हसन लिखता है—'राजा मेघवाहन राजा प्ररोराय (सन्धिमत) के इस्तीफा देने के बाद संवत् ३४ में तुरन्त सल्तनत पर जलवागर

४५८ तृतीय तरंग

हुआ। और इन्तहाई अदल और इन्साफ़ के साथ कश्मीर के चमन को तर व ताज़गी बख्श दी। आस पास के मुमालिक को अपने क़ब्ज़ा इक़्तदार में ले आया। परिन्दों हैवानों के गोश्त के खाने वालो को नाहक़ खून बहाने की कत्तईयन मुमानियत कर दी। शिकारियो और कसाबों को गुज़र औकात के लिये जागीरें दी। उसकी हकूमत में किसी जानवर को तकलीफ़ नही पहुँची। बल्कि उसकी हुस्ननबीयत के पेश नज़र हशरात-भी आपस में एक दूसरे को एज़ार सानी पर क़ादिर न हुए। रात को भेष बदल कर शहर की गश्त किया करता था। फ़क़ीरों और बे वसीला लोगों को चोरी छिपे घर पर माल व दौलत भेजा करता। मंगावन, मनोया गाय और मेघमठ के दिहात आबाद किये। इसी असना में खबर सुनी कि हिन्दुस्तान में जानदारों को एज़ाज़ पहुँचाते हैं। चुनांचे ऐसा करने से रोकने के लिये एक बड़ी भारी फ़ौज इस तरफ रवाना की। हिन्दुस्तान के बहुत से राजों को अपना मतीय व फ़रमा वरदार बना लिया। जिसके नतीजे में उन्होंने जानदारों के इज़ाए तकलीफ़ की दस्तबरदारी अख्तियार कर ली। जिसने उसके हुक्म की तामील से सरताबी की उसकी हकूमत तबाह व बरबाद हो गयी। आहिस्ता आहिस्ता यह राजा फ़तह करते करते दरियाये शोर पर पहुँच गया।

एक दिन अपने अराकीने सल्तनत माय दरयाए शोर के अहूर करने पर मशविरा कर रहा था कि एकाएक दूर से यह आवाज़ सुनायी दी कि राजा मेघवाहन की अमलदारी में लोग मुझे मार रहे हैं। राजा इस फ़रियाद को सुनते ही ग़ैज़ व ग़ज़ब से भर गया। इस सदा की तलाश में दूर तक दौड़ कर गया। क्या देखता है कि एक आदमी है जिसे पाँच छः आदमी ज़ोर से जकड़ा हुआ ले जा रहे हैं। राजा ने हक़ीक़त हाल पूछा। उनमें से एक बोला कि हमारा एक प्यारा बेटा है। बीमारी के बायस क़रीबुल मर्ग है। इसके साथ हमारे पड़ोस में एक मन्दिर है। जहाँ से लोग ग़ैब की बातें सुनते हैं। वहाँ हमने अपनी बीमारी के मुताल्लिक सुना है कि इसके खातिर जब तक इन्सानी कुरबानी न दी जायगी तब तक वह अच्छा न होगा। अब यह अज़ल रशीदह हमारे पास पहुँचा है। इसको जान हम अपने लड़के के लिये कुरबान करेंगे।

राजा ने कहा मेरे अहद हकूमत में जब हैवानो का क़त्ल ममनू है। तो तुम्हारी क्या ताक़त है कि तुम बेगुनाह आदमी को क़त्ल करो। उन आदमियों ने जवाब दिया कि उस लड़के के वफ़ात से लोग बे जान होजायेंगे। जब आपको एक आदमी का मरना पसन्द नहीं है तो इतने आदमियों का मरना आपको किस तरह पसन्द होगा। और फिर ख़ुदा को आप क्या जवाब देंगे। राजा बोला कि यह मुसाफ़िर है। बे गुनाह है। इसको छोड़ दो। इसके बदले मेरी जान अपने बेटे पर कुरबान कर दो।

लोगों ने इसे मजाक समझा। लेकिन राजा ने अमलन तलवार निकाल कर अपने मार डालने का इकद्दाम किया। उसी वक्त राजा पर फूल आसमान से बरसने लगे। अचानक ग़ैब से एक रूहानी इन्सान नमूदार हुआ। और राजा का हाथ पकड़ कर उसे खुदकशी से रोका। उस वक्त तमाम लोग राजा की नज़रों से गायब हो गये। राजा हैरत के भँवर में फँस गया। और उस फ़िरिश्ता से इस जमायत की कैफ़ियत दरियाफ्त की। वह बोला कि यह जमायत ग़ैब से तेरी आज़माइश के लिये आयी थी। मैं समुद्रों और लहरों का मोकल हूँ। तेरा ख़ल्क खुदा पर तेरी शुजाअत और शफ़क़त देखकर मैं तेरा मुती व फ़रमा बरदार होता हूँ। और अब अपना मतलब मुझसे कह। राजा ने कहा। मैं तुझसे जज़ीरा सिंहल द्वीप और ज़ज़ीरा लंका की फ़तह में मदद माँगना चाहता हूँ। उस शख़्स ने जवाब दिया कि मैं ख़ुदा की बारगाह से तेरी मआनु-मत के लिये मुक़र्रर किया गया हूँ। इसके बाद मेघ गशलत बादशाह एक अज़ीमुशान फ़ौज के हमराह

राजतरंगिणी ४५९ रक्तप्रजस्य भर्त्तुः पश्चाल्लोकानुरञ्जनम् । तस्याज्ञायि जनैर्धौतक्षौमक्षालनसंनिभम् ॥ ३ ॥ ३. प्रजानुरक्त उस राजा के लोकानुरंजन को स्वच्छ क्षौम वस्त्र के क्षालन सदृश तत्पश्चात् ( प्रजा ने ) जाना। १ स पुनर्बोधिसत्त्वानामति सत्त्वानुकम्पिनाम् । चर्यामुदात्तचरितैरत्यशेत् महाशयः ॥ ४ ॥ ४. उस महाशय ने अपने उदात्त चरितों से प्राणियों पर अनुकम्पा करने वाले बोधि सत्त्वों १ की चर्या का भी अतिक्रमण कर दिया ।

जिसमे बहुत से घोड़े और हाथी भी थे गैबी मोकल को इजाज़त समुन्दर को पार कर गया और बहुत जल्द ही जज़ीरा सिंहल द्वीप को फतह कर लिया । वहाँ के राजा विभीषण ने फरमा बरदारी का तौक गले में डाल लिया । और हैवानों को न क़त्ल करने का हुक्म अपनी तमाम क़लमरो में दे दिया । और अपने मुल्क के बहुत से तोहफे, तहायफ़ के साथ राजा मेघवाहन को रुखसत किया । राजा मज़कूर कमाल शान व शौकत से अपने वतन कश्मीर फरमा हुआ ।”

२ (२) गान्धार देश : पृष्ठ १०६ टिप्पणी गान्धार, ३०७ १:६८, ३०७, ३१४, २: १४४ द्रष्टव्य है ।

( १ ) ३ राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५४ वाँ श्लोक है ।

इसका भावार्थ यह भी हो सकता है। 'जिस प्रकार स्वच्छ क्षौम वस्त्र के घुल जाने पर उसका स्वच्छ रूप प्रकट होता है, उसी प्रकार प्रजानुरक्त उस राजा के लोकानुरंजन को प्रजा ने उसके कार्यों से बाद में जाना ।'

इसका एक और भावार्थ निम्नलिखित हो सकता है : 'जिस प्रकार विशुद्ध क्षौम का वर्ण धोने पर जाना जा सकता है, उसी प्रकार जनगण प्रजानुरक्त नृपति का लोकानुराग तत्पश्चात् लोगो ने जाना।'

४(१) बोधिसत्त्व : बादशाह जैनुल आबदीन (सन् १४२० ई.) के समय तक भगवान् बुद्ध तथा उनका उल्लेख तत्कालीन साहित्य में श्रद्धापूर्वक किया गया है । श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी १:२६ में भगवान् बुद्ध का उल्लेख किया है। इससे प्रकट होता है । बौद्ध धर्म तथा बुद्ध को शेष भारत में प्रायः लोग भूल गये थे । उस समय भी किसी न किसी रूप में उनका कश्मीर में अस्तित्व था । विशेष रा. त. १.१३४, १३५, १३७, १३८, पृष्ठ १९४-१९५ द्रष्टव्य है । बोधिसत्त्व की धर्मता के विषय में मिलिन्द प्रश्न में कहा गया है—बोधिसत्त्वों के माता पिता, किस वृक्ष के नीचे तपस्या करेंगे-स्थान, प्रधान शिष्य, पुत्र, भिक्षु सेवक पूर्व से ही निश्चित रहते हैं । तुषित लोक में निवास करते समय आठ बातो को देख लेते हैं, (१) जन्म का उचित काल (२) जन्मस्थान द्वीप (३) जन्मस्थान (४) कुल (५) माता (६) गर्भ रहने का समय (७) जन्म का मास तथा (८) महाभिनिष्क्रमण काल । (मिलिन्द प्रश्न : ४:४:३५) बोधिसत्त्व चार बातों में एक दूसरे से भिन्न होते हैं—(१) कुल (२) स्थान, समय (३) आयु तथा ४ ऊँचाई में । किन्तु सभी बोधिसत्त्व रूप, शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति

४६० [विशेष: मध्य-संरेखित] तृतीय तरंग तस्याभिषेक एवाज्ञां धारयन्तोऽधिकारिणः । सर्वतोऽमारमर्यादः पटहानुदघोषयन् ॥ ५ ॥ ५. उसके अभिषेक काल में ही, आज्ञाकारी अधिकारियों ने अहिंसा मर्यादा का पटह¹ घोष करवा दिया ।

विमुक्ति ज्ञान या साक्षात्कार, चार वैशारद्य, दश बुद्ध बल, छः असाधारण ज्ञान, चौदह बुद्ध ज्ञान, अठारह बुद्ध, धर्म, तथा बुद्ध को दूसरी बातों में समान होते हैं । सभी बुद्ध, बुद्ध के गुणों में बराबर होते हैं । ( मिलिन्द प्रश्न ४:८:७३ ) भगवान् बुद्ध के सम्बन्ध में अशोक से ललिता- दित्य तक प्रायः एक विचारधारा थी । ललिता- दित्य के समय में भगवान् बुद्ध के सम्बन्ध में जो श्रद्धा भक्ति तथा उनके विचारों के प्रति आदर था वह क्रमशः भविष्य में कम होता गया । भगवान् बुद्ध का तत्कालीन विचार हिन्दू धर्म विरोधी नहीं माना जाता था । क्षेमेन्द्र, वरदराज, जयस्थ और कल्हण का बुद्ध के प्रति यह भाव प्रगट नहीं होता जो नीलमत पुराण में प्रतिपादित है । शंकरा- चार्य के पश्चात् तो पूर्व विचारों में आमूल परिवर्तन हो गया । इस परिप्रेक्ष्य में कश्मीर में बुद्ध प्रभाव का विश्लेषण करना चाहिए । भगवान् बुद्ध की उषाकर आदि की जो मूर्तियाँ प्राप्त हुई है उनका काल चौथी तथा पांचवी शताब्दी है । उनमें एक आसनस्थ, दूसरी दो खड़ी हैं। इसी प्रकार पण्डरेथन अर्थात् पुराणाधिष्ठान से बोधिसत्त्व, अवलोकितेश्वर, भगवान् बुद्ध के जन्म का दृश्य आदि उपस्थित करती मिली है । जिनका काल छठी शताब्दी पूर्व कहा जाता है । स्कन्द पुराण काशी खण्ड में भगवान् बुद्ध का रूप खींचा गया है उसमे जटा-जूट एवं गैरिक परिधान धारी वह दिखाये गये है। स्कन्द पुराण का वर्णन भगवान् बुद्ध के परम्परा गत बनती मूर्तियों से नहीं मिलता । कश्मीर में अब तक जटाजूट, एवं गैरिक वस्त्र धारी मूर्तियाँ नहीं मिली हैं ।

नीलमत पुराण बुद्ध को विष्णु का अवतार मानता है तथा उनके जन्म दिवस पर उत्सव की विधि उपस्थित करता है । बुद्ध जन्म एक पर्व की तरह मनाया जाता था । यह दिवस वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाया जाता था । आज भी विश्व में बुद्ध पूर्णिमा इसी दिन को कहते हैं । इस दिन भगवान् बुद्ध की मूर्ति को स्नान, आभूषण आदि से अलंकृत, तापसी के स्थान, घोर, चैत्यों के दीवारों, की सफेदी कर उन्हें पवित्र करना चाहिये । बौद्धों को पुस्तक, वस्त्र, खाद्य पदार्थों का दान और नर्तकियों तथा वादकों से समन्वित उत्सव मनाना चाहिये । भगवान् बुद्ध की पूजा नैवेद्य, वस्त्र, दरिद्रों को दान देकर तीन दिन तक करना चाहिये । ( नी० 684-692 ) पाठभेद : श्लोक संख्या ५ में 'मार' का पाठभेद 'सार' तथा 'मान' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ५ (१) पटहः इस शब्द का अर्थ नगाड़ा, डंका, ढोल, ढुग्गी होता है। जैसे, प्राचीन पटह घोष अर्थात् ढुग्गी पीटने के अर्थ में प्रयोग किया गया है । ढुग्गी पीटने वाले को पटह घोषक कहते थे । शहनाई के साथ भी कश्मीर में इसे बजाते हुए हमने देखा है। वेद तथा जातक कथाओ में पटह का उल्लेख नहीं मिलता । महाभारत में कहीं-कहीं इसका उल्लेख बहुत कम मिलता है । रामायण (५:१०:अ) में निसन्देह इसका बहुत उल्लेख किया गया है । वीणा वादन के प्रसंग में नीलमत पुराण ने इसका उल्लेख किया है । यथा 'वीणापटहनादितम्' । ( नी० ३२) तथा 'वीणापटह शब्देश्च' ( नी० 413)