राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ | राजतरंगिणी अन्येद्युर्विधिवदुपास्य पूर्वसंध्या- मासन्ने नलिनसरस्यपास्तनिद्रः । क्ष्मापालः परिचितसोदराम्बुतीर्थं नन्दीशाध्युषितमवाप भूतभर्तुः ॥ १६९ ॥ १६९. दूसरे दिन पार्श्ववर्ती नलिन सरसी में अपनी निद्रा तिरोहित कर (स्नानकर) राजा ने पूर्व सन्ध्योपासन किया अनन्तर नन्दीश समीपस्थ भूतभर्ता१ (भूतेश्वर) परिचित सोदर२ तीर्थ में पहुँचा। नन्दिक्षेत्रे त्रिभुवनगुरोः सोऽग्रतस्तत्र याव- त्तस्थौ तावत्स्वयमभिमतावाप्तये जायते स्म । भस्मस्मेरः सुघटितजटाजूटबन्धोऽक्षसूत्री रुद्राक्षाङ्को जरठमुनिभिः सस्पृहं वीक्ष्यमाणः ॥ १७० ॥ १७०. भस्म स्मेर सुघटित, जटाजूट बन्ध से युक्त, अक्ष सूत्री, रुद्राक्ष अंकित एवं वृद्ध मुनियों से सस्पृह वीक्ष्यमाण वह नन्दिक्षेत्र१ में त्रिभुवन गुरु के सम्मुख जब तक स्थित रहा तब तक उसके अभिलषित की प्राप्ति हुई। भ्राम्यञ्श्रीकण्ठदत्तव्रतजनितमहासत्क्रियो भैक्षहेतो- र्भिक्षादानोद्यतासु प्रतिमुनिनिलयं संभ्रमात्तापसीषु । वृक्षैर्भिक्षाकपाले शुचिफलकुसुमस्रेणिभिः पूर्यमाणे मान्यो वैराग्ययोगेऽप्यनुपनतपरप्रार्थनालाघवोऽभूत् ॥ १७१ ॥ १७१. श्रीकण्ठव्रत के कारण अत्यधिक संस्कृत यह जब भिक्षा हेतु प्रत्येक मुनि गृह में जाता तो तपस्विनियों सोत्साह स्पर्धा पूर्वक भिक्षा देने के लिये उद्यत रहती थीं। किन्तु वृक्षों द्वारा पवित्र पुष्प फल से कपाल (भिक्षापात्र) के पूर्ण हो जाने से, मान्य उसने वैराग्य योग में भी याचना लाघव को नहीं प्राप्त किया १६९ (१) भूतेश्वर : पृष्ठ १४९ द्रष्टव्य है। १७० (१) नन्दिप्रवेश क्षेत्रः पृष्ठ ७६ द्रष्टव्य यात्रा में भूतेश्वर दर्शन का उल्लेख कल्हण ने पूर्व हैं। भस्म की उज्ज्वल वर्ण की उपमा कल्हण ने श्लोक संख्या २:१२३ में किया है। नीलमत पुराण स्मित दन्त पंक्ति के उज्ज्वल वर्ण से दिया है। श्लोक 1047, 1118, 1242, 1335, द्रष्टव्य हैं। पाठभेद : (२) सोदर : पृष्ठ १४५ द्रष्टव्य है। नीलमत श्लोक संख्या १७१ में 'भ्राम्यञ्श्री' का 'भ्राम्य- पुराण श्लोक, 1330, 486, 1113, 1115, ष्ट्री', 'योगे' का 'योगो' तथा 'नुपनत' का पाठभेद 1325, 1330 भी द्रष्टव्य हैं। 'नुदतन' 'नुदनत' 'नपतन' मिलता है।