राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 600, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४५३ इति श्रीकाश्मीरिकमहामात्यचम्पकप्रभुसूनोः कल्हणस्य कृतौ राजतरङ्गिण्यां द्वितीयस्तरङ्गः ॥ इस प्रकार काश्मीर के महामात्य चम्पक प्रभु के पुत्र कल्हण विरचित राजतरंगिणी में, द्वितीय तरंग समाप्त हुआ । इति पाठ में 'चप्पक' का पाठभेद 'चम्पक' शतद्वये वत्सराणामष्टाभिः परिवर्जिते । तथा 'वप्पक' मिलता है । अस्मिन्द्वितीये व्याख्याताः षट् प्रख्यातगुणा नृपाः ॥ एशियाटिक सोसायटी बंगाल से प्रकाशित सन् १८३५ ई० की प्रति में इति पाठ के पश्चात् एक सौ बानवे वर्ष में इस द्वितीय तरंग कथित निम्नलिखित पाठ और दिया गया है । पृष्ठ ३१ प्रख्यात गुण वाले ६ नृप हुए । श्री स्तीन ने प्रथम किन्तु इसका अनुवाद श्री स्तीन तथा श्रो पण्डित ने भाग परिशिष्ट एक के पृष्ठ १३५ पर द्वितीय तरंग नहीं दिया है । अन्य अनुवादकों ने इसका अनुवाद की काल गणना इसी श्लोक के आधार पर दी है । दिया है मैं यहाँ मूल तथा अनुवाद दोनों देता हूँ । उनका वर्णित १९२ इस श्लोक में यथावत् है ।