भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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४४८ राजतरंगिणी स विलङ्घितगव्यूतिरूपविश्य तरोरधः । जनमेकैकमुद्बाष्पं न्यवर्तयत सान्त्वयन् ॥ १६३ ॥ १६३. एक गव्यूति¹ गमनानन्तर तरु तले बैठ कर के उसने अश्रु पूर्ण प्रत्येक जन को सान्त्वना देते हुए परावृत्त किया । पथि शिखरिणां मूले मूले विलम्ब्य जहज्जनान्- मितपरिकरो गच्छन्नूर्ध्वं क्रमात्समदृश्यत । गहनवसुधाः संपूयोच्चैर्ब्रजन्स निजात्पदा- ह्रद इव विनिर्यातः स्तोकैः कृतानुगमो जलैः ॥ १६४ ॥ १६४. मार्ग में शिखराणियों के मूल मूल में रुक कर, लोगों को परावृत्त करते मित परिकर वह, क्रम से ऊपर जाते हुए, गहरी भूमि को पूर्ण कर पुनः अपने स्थान से कोई जल के साथ सवेग गमनशील नद सदृश दिखाई पड़ा। निश्शेषं निकटात्स लोकमटवीमध्ये निरुन्धन्पदं शोकावेशसबाष्पगद्गदपदं संमान्य चोत्सार्य च । भूर्जत्वक्परिरोधमर्मरमरुन्निद्राणसिद्धाध्वग- श्रेणीमौलिमणिप्रभोज्ज्वलगुहागेहं जगाहे वनम् ॥ १६५ ॥ १६५. अटवी मध्य रुक कर, शोकावेश के कारण अश्रु पूर्ण एवं रुद्ध वाणी से युक्त, समस्त लोगों को अपने निकट से परावृत्त कर, संमान्य उसने वन में प्रवेश किया; जहां कि भूर्जपत्रों¹ के परिरोध के कारण मर्मर ध्वनि पूर्ण मरुत् से शयन करते, सिद्ध पथिक गण के मस्तक स्थित मणि की कान्ति से गुहा गृह² समुज्ज्वल हो रहे थे। पादटिप्पणियाँ : १६३ ( १ ) गव्यूति : यह माप का एक पारि- भाषिक शब्द है। एक गव्यूति की दूरी एक कोश होती है। यह कैल्टिक दाब्द लोग तथा आंग्लीसी नाप में २ मील तथा ७४३ गज होता है। पाठभेद : श्लोक संख्या १६४ में 'मित' का 'नित' तथा 'कृतानुगमो' का पाठभेद 'स्वोशानुगमो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १६४ (१) साहित्य दर्पण शमे सरिणी शब्द का उल्लेख दर्पण के लिये दिया गया है। शिखरिणी शङ्ख सु नाम हिमविश्वर, हिमविश्वाक्षममापकरोदयः। मुमुलि येन तवाधरपाटलं दिशति बिम्बरुक्षं शुकशायकः ॥ नदी का जल अत्यधिक बढ़कर तटों पर फैल जाता है तब भी जल की गति नदी के अधोभाग की ही ओर होती है। पाठभेद : श्लोक संख्या १६५ में 'निरुन्धन्' का 'निरुन्ध्यन्' 'निदध्यन्' 'निदन्धन्' 'निरुद्धयन्' 'भूर्ज त्वक' का 'मूर्द्धत्वक' 'मर्मर; का 'मंन्टर' 'मर्दुर' 'मर्जर' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १६५ ( १ ) भूर्ज : मूल संस्कृत शब्द का