राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 592, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४४७ इति संचिन्तयन्नन्तः सर्वत्यागोन्मुखो नृपः । मनोरज्यानि कुर्वाणो दरिद्र इव पिप्रिये ॥ १५८ ॥ १५८. सर्व त्यागोन्मुख नृप यह अन्तश्चिन्तन् करते हुए; मनो राज्य करते, दरिद्र तुल्य नितरां प्रसन्न हुआ । अन्येद्युः प्रकृतीः सर्वाः संनिपत्य सभान्तरे । ताभ्यः प्रत्य( त्या ) र्पयन्न्यासमिव राज्यं सुरक्षितम् ॥ १५९ ॥ १५९. दूसरे दिन सभा में सब लोगों को बुलाकर, न्यास तुल्य सुरक्षित राज्य, उन्हें अर्पित कर दिया । उज्झितं स्वेच्छया तच्च प्रयत्नेनापि नाऽशकत् । तं स्वीकारयितुं कश्चित्फणीन्द्रमिव कञ्चुकम् ॥ १६० ॥ १६०. स्वेच्छया, त्यक्त राज्य को फणीन्द्र के कंचुक तुल्य प्रयत्न पूर्वक भी कोई, उसे ग्रहण कराने में समर्थ नहीं हुआ । अर्चालिङ्गमुपादाय सोऽथ प्रायादुदङ्मुखः । धौतवासा निरुष्णीषः पद्धत्यामेव प्रजेश्वरः ॥ १६१ ॥ १६१. धौत¹ वस्त्र धारण किये, बिना उष्णीष के, उत्तरमुखी प्रजेश्वर पैदल ही अर्चा (पूजन) लिंग² लेकर गया । तस्य पादार्पितदृशो व्रजतो मौनिनः प्रभोः । पन्थानं जगृहुः पौरा निश्शब्दस्रवदश्रयः ॥ १६२ ॥ १६२. नत मस्तक हो गमन करते मौनी उस प्रभु के मार्ग को निःशब्द अश्रुपात करते पुरवासियों ने ग्रहण किया । पाठभेद : (२) अर्चालिंग—लिंगायत लोग शिवलिंग श्लोक संख्या १५९ में 'संनिपत्य' का 'संनिपात्य' सर्वदा अपने पास रखते है । चाँदी की मन्दिराकार पाठभेद मिलता है । डिबिया में दोनो ओर कोके लगे रहते है । उनमें : श्लोक संख्या १६० में 'तच्च' का पाठभेद यज्ञोपवीत की दोनों छोर दोनों ओर से बाँध देते हैं । 'तं च' तथा 'ते च' मिलता है । यज्ञोपवीत तुल्य उसे पहनते हैं । डिबिया को प्रतिदिन पादटिप्पणियाँ : खोलकर उसमें स्थित शिवलिंग की पूजा करते हैं । १६१ ( १ ) धौतवस्त्र : प्रो विल्सन ने इस लिंग को लिंगायत प्रति दिन अर्चा अर्थात् यहाँ पर धोती शब्द का प्रयोग किया है । (पृष्ठ ३२) पूजा करते हैं । यह सम्प्रदाय ग्यारहवी शताब्दी कल्हण ने धोती नहीं धौत अर्थात् उज्ज्वल वस्त्र का में दक्षिण में प्रचलित हुआ और बढ़ता गया । उल्लेख किया है । नीलमत में वस्त्र के अन्तर्गत उत्तर भारत में निसन्देह यह अति प्राचीन काल से प्रायः वस्त्र, अम्बर, वासा, वसन, संवित, चांलातुक प्रचलित था । आदि आ जाते हैं । ( श्लोक ५६२, ७८६, ८५१, पाठभेद : ४३५, १२७७, १३२८, ४३२, ४४२, ९२, ५७६ ) श्लोक संख्या १६२ में 'मौनिनः' का पाठभेद 'मानिनः' मिलता है ।