भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 608

राजतरंगिणी ४५९ रक्तप्रजस्य भर्त्तुः पश्चाल्लोकानुरञ्जनम् । तस्याज्ञायि जनैर्धौतक्षौमक्षालनसंनिभम् ॥ ३ ॥ ३. प्रजानुरक्त उस राजा के लोकानुरंजन को स्वच्छ क्षौम वस्त्र के क्षालन सदृश तत्पश्चात् ( प्रजा ने ) जाना। १ स पुनर्बोधिसत्त्वानामति सत्त्वानुकम्पिनाम् । चर्यामुदात्तचरितैरत्यशेत् महाशयः ॥ ४ ॥ ४. उस महाशय ने अपने उदात्त चरितों से प्राणियों पर अनुकम्पा करने वाले बोधि सत्त्वों १ की चर्या का भी अतिक्रमण कर दिया ।

जिसमे बहुत से घोड़े और हाथी भी थे गैबी मोकल को इजाज़त समुन्दर को पार कर गया और बहुत जल्द ही जज़ीरा सिंहल द्वीप को फतह कर लिया । वहाँ के राजा विभीषण ने फरमा बरदारी का तौक गले में डाल लिया । और हैवानों को न क़त्ल करने का हुक्म अपनी तमाम क़लमरो में दे दिया । और अपने मुल्क के बहुत से तोहफे, तहायफ़ के साथ राजा मेघवाहन को रुखसत किया । राजा मज़कूर कमाल शान व शौकत से अपने वतन कश्मीर फरमा हुआ ।”

२ (२) गान्धार देश : पृष्ठ १०६ टिप्पणी गान्धार, ३०७ १:६८, ३०७, ३१४, २: १४४ द्रष्टव्य है ।

( १ ) ३ राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५४ वाँ श्लोक है ।

इसका भावार्थ यह भी हो सकता है। 'जिस प्रकार स्वच्छ क्षौम वस्त्र के घुल जाने पर उसका स्वच्छ रूप प्रकट होता है, उसी प्रकार प्रजानुरक्त उस राजा के लोकानुरंजन को प्रजा ने उसके कार्यों से बाद में जाना ।'

इसका एक और भावार्थ निम्नलिखित हो सकता है : 'जिस प्रकार विशुद्ध क्षौम का वर्ण धोने पर जाना जा सकता है, उसी प्रकार जनगण प्रजानुरक्त नृपति का लोकानुराग तत्पश्चात् लोगो ने जाना।'

४(१) बोधिसत्त्व : बादशाह जैनुल आबदीन (सन् १४२० ई.) के समय तक भगवान् बुद्ध तथा उनका उल्लेख तत्कालीन साहित्य में श्रद्धापूर्वक किया गया है । श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी १:२६ में भगवान् बुद्ध का उल्लेख किया है। इससे प्रकट होता है । बौद्ध धर्म तथा बुद्ध को शेष भारत में प्रायः लोग भूल गये थे । उस समय भी किसी न किसी रूप में उनका कश्मीर में अस्तित्व था । विशेष रा. त. १.१३४, १३५, १३७, १३८, पृष्ठ १९४-१९५ द्रष्टव्य है । बोधिसत्त्व की धर्मता के विषय में मिलिन्द प्रश्न में कहा गया है—बोधिसत्त्वों के माता पिता, किस वृक्ष के नीचे तपस्या करेंगे-स्थान, प्रधान शिष्य, पुत्र, भिक्षु सेवक पूर्व से ही निश्चित रहते हैं । तुषित लोक में निवास करते समय आठ बातो को देख लेते हैं, (१) जन्म का उचित काल (२) जन्मस्थान द्वीप (३) जन्मस्थान (४) कुल (५) माता (६) गर्भ रहने का समय (७) जन्म का मास तथा (८) महाभिनिष्क्रमण काल । (मिलिन्द प्रश्न : ४:४:३५) बोधिसत्त्व चार बातों में एक दूसरे से भिन्न होते हैं—(१) कुल (२) स्थान, समय (३) आयु तथा ४ ऊँचाई में । किन्तु सभी बोधिसत्त्व रूप, शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति