राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 606, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयस्तरङ्गः मुञ्चेभाजिनमस्य कुम्भकुहरे मुक्ताः कुचाग्रोचिताः किं भालज्वलनेन कज्जलमतः स्वीकार्यमक्ष्णोः कृते । संधाने वपुरर्धयोः प्रतिवदन्नेवं निषेधेऽप्यहेः कर्तव्ये प्रियोत्तरानुसरणोद्युक्तो हरः पातु वः ॥ १ ॥ १. 'गज चर्म त्याग दे' इसके कुम्भ कुहर में ( तुम्हारे ) कुचाग्रोचित मुक्ता होते हैं' 'भालस्थ' ज्वलन ( अग्नि ) से क्या लाभ ?' 'इससे नेत्रों के लिये कज्जल प्राप्त होते हैं।' अर्द्धाङ्ग विषयक प्रश्न का उत्तर देकर, इसी प्रकार प्रिया के अहि का निषेध करने पर, उत्तर अन्वेषण में उद्यत, शिव आप लोगों की रक्षा करें ।' अथोल्लसत्पृथुरलाघमानिन्युर्मेघवाहनम् । गान्धारविषयं गत्वा सचिवाधिष्ठिताः प्रजाः ॥ २ ॥ मेघवाहन१ २. मन्त्रियों के नियन्त्रण में प्रजा गान्धार देश२ जाकर, मेघवाहन को ले आयी, जिसकी प्रचुर प्रशस्ति फैल रही थी । पाठभेद : 'श्री गणेशाय नमः' से भी तरंग का आरम्भ होता है । पादटिप्पणियाँ : (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५३ वाँ श्लोक है। उक्त पद का भावार्थ निम्नलिखित होगा । देहार्ध द्वय मिलन समय पार्वती ने जिज्ञासा की 'गजाजिन परित्याग कर दीजिये।' महादेव ने उत्तर दिया—'इसके कुम्भ के मध्य में तुम्हारे पयोधर भूषण के उपयुक्त मुक्ता राशि निहित है । पार्वती ने पुनजिज्ञासा की—ललाट स्थित अनल का प्रयोजन क्या है ? महादेव ने उत्तर दिया— 'वहाँ से तुम्हारा लोचन भूषण कज्जल प्राप्त होगा।' इस प्रकार प्रत्युत्तर देकर प्रियतमा के सर्प निषेध सूचक प्रश्न के चिन्तन अनुसरण उद्यत हर आप लोगों की रक्षा करें । ५८ ( १ ) २ प्रो विल्सन मेघवाहन का अभिषेक काल सन् २३ ई० ३ मास तथा राज्य काल ३४ वर्ष देते हैं । श्री एस. पी. पण्डित यह समय सन् २४ ई० तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं । थोस्तीन अभिषेक काल लौकिक संवत् ३०८६ तथा राज्यकाल ३४ वर्ष देते हैं । श्री बालो ने यह काल सप्तर्षि संवत् ३९७९ तथा सन् २०६ ई० देते हैं । अबुल फजल आइने अकबरी में मेघवाहन का नाम मगदहन देता है । ट्रायेर यह समय सन् २४ ईस्वी तथा ९ मास देते हैं । कनिंघम यह समय सन् ३८३ ई. मानते हैं । हसन लिखता है—'राजा मेघवाहन राजा प्ररोराय (सन्धिमत) के इस्तीफा देने के बाद संवत् ३४ में तुरन्त सल्तनत पर जलवागर