राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजतरंगिणी ४६१ कल्याणिना प्राणिवधे तेन राष्ट्रान्निवारिते । निष्पापां प्रापिता वृत्तिं स्वकोशात्सौनिकादयः ॥ ६ ॥ ६. राष्ट्र में प्राणी वध बन्द हो जाने पर, उस कल्याणी नृप ने स्व कोश से सौनिक (कसाई) आदि को निष्पाप वृत्ति प्रदान की । तस्य राज्ये जिनस्येव मारविद्वेषिणः प्रभोः । ऋतौ घृतपशुः पिष्टपशुर्भूतबलावभूत् ॥ ७ ॥ ७. जिन (बुद्ध) तुल्य मार१ (हिंसा) विद्वेषी उस प्रभु के राज्य में घृत पशु एवं पिष्ट पशु की बलि२ यज्ञ में होती थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ६ मे 'निष्पापा'का; निष्पाया' 'निष्पापा' 'निष्पापं' 'प्रापिता' का 'प्रापिता' तथा 'शार्सौ' का पाठभेद'शात्सो' 'पात्शो' तथा 'शात्सो' मिलता है । श्लोक संख्या ७ में 'राज्ये' का पाठभेद 'राज्यं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ७ (१) मार : मार तीन प्रकार के होते हैं—(१) क्लेश मार (२) मृत्यु मार (३) देव पुत्र मार । क्लेश दश हैं—(१) लोभ (२) द्वेष (३) मोह (४) मान (५) दृष्टि (६) विचिकित्सा (७) स्त्यान (८) औद्धत्य (९) अह्री (१०) अन्—अपत्रपा अर्थात् असंकोच । इनको क्लेश मार कहा जाता है । जिस समय तथा जिस हेतु से प्राणियों की मृत्यु होती है उसे मरण मार कहते हैं । देवपुत्र मार कामावचर के छठे देवलोक पर निर्मित वशवर्ती में रहता है । द्रोही राजकुमार की भाँति यहाँ एक प्रादेशिक शासक होता है । उससे सब भयभीत रहते हैं । क्योंकि यह कुशल कर्मों का विरोधी है । अधिकांश मार देवपुत्र च्युत होकर नरक में पडते है । दूपी आदि मारा की दुर्गति यहाँ द्रष्टव्य है । (२) बलि : कल्हण ने यहाँ 'क्रतो' शब्द का प्रयोग किया है । ऋतु का अर्थ यज्ञ होता है । वेद में उल्लेख मिलता है —आनो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः । अहिंसा के प्रचार के पश्चात् पुराण तथा स्मृति वर्णित विहित पशु बलि के स्थान पर घृतादि या पिष्ट पशु बनाकर उनकी बलि की जाने लगी थी । पंच यज्ञ का पुराणों तथा स्मृतियों में प्रचुर उल्लेख मिलता है । भूत बलि दिवंगत के लिये दी जाती है । कश्मीरी शैव मतानुयायी आज भी आटा अन्न तथा घृतादि की पशु प्राकृति बनाकर बलि देते हैं । यह है पुरानी प्रथा की स्मृति, बलि प्रथा को हिंसक रूप दिया गया है । बलि एवं उपहार : कल्हण ने बलि एवं उपहार दोनों शब्दों का प्रयोग किया है । दोनों में अन्तर है । बलि का अर्थ आत्मसमर्पण होता है । बलि कर्त्ता स्वयं अपना बलि न कर, अपने प्रतिनिधि स्वरूप मनुष्य, पशु, पक्षी, फल आदि की बलि चढ़ाता है । परन्तु उपहार में प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं उत्पन्न होता । किसी भी वस्तु को उपहार, भेंट, पूजा स्वरूप इष्ट देव को चढ़ाया जाता है । यह नैवेद्य स्वरूप प्रसाद हो जाता है । दोनों की प्रक्रियाओं में अन्तर है ।