भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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४६२ तृतीय तरंग स मेघवननामानमग्रहारं विनिर्ममे । मयुष्टग्रामकृत्पुण्यज्येष्ठं मेघमठं तथा ॥ ८ ॥ ८. मयुष्टग्राम निर्माता, उसने मेघवन नामक अग्रहार एवं पुण्य में अग्रणी मेघमठ१ का निर्माण किया (कराया)। भोगाय देश्यभिक्षूणां वल्लभाऽस्याऽमृतप्रभा । विहारमुच्चैरमृतभवनाख्यमकारयत् ॥ ९ ॥ ९. उसकी प्रियतमा अमृतप्रभा ने देशीय१ भिक्षुओं के भोग हेतु अमृत भवन२ नामक उच्च विहार बनवाया। पाठभेद : श्लोक संख्या ८ में 'मयुष्ट' का 'सयुष्ट' 'ज्येष्ठं का 'ज्येष्ठो' और 'तथा' का पाठभेद 'तदा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८ (१) मयुष्ट, मेघवन, मेघमठ : इन तीनों स्थानो का निश्चित पता नहीं चलता। उक्त तीनों स्थानो का उल्लेख पुनः नहीं मिलता। पाठभेद : श्लोक संख्या ९ में 'देश्य' का पाठभेद 'चैत्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ९ (१) देशीय : राजतरंगिणी में कश्मीर मण्डल के बाहर के रहने वालो के लिये देश्य, दैशिक, दैशिका, शब्दों का व्यवहार किया गया है। दैशिक : देशीय भिक्षु भी इसी अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। कश्मीरी भिक्षुओं के लिये देशीय शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। यह गैर कश्मीरी भिक्षुओं के लिये व्यवहृत किया गया है। जोन राज ने श्रीकण्ठ चरित का ग्रंथ के भाष्य में (१५:१०२) उल्लेख किया है। (२) अमृत भवन : इसका पाली एवं प्राकृत नाम अपभ्रंश होकर वर्तमान बिगड़ा नाम अमित भवन था आमित भवन हो गया था। इसका वर्तमान बिगडा अन्त भवन अन्त भवन अथवा अन्तभवन है। यह श्रीनगर से तीन मील दूर उत्तर दिशा में विचार नाग के समीप है। श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा जून सन् १८९५ ई० में की थी। वहाँ पर उन्हें एक खुले मैदान और लक्षम कुल (लक्ष्मी कुल्या) के मध्य एक ध्वन्सावेषोप स्थान मिला था। यह अमृत भवन विहार का अवशेष था। एक ठोस गोलाकार टीला लगभग २० फिट ऊँचा था। उसकी बनावट स्तूप से मिलती थी। एक आयताकार शिलाखण्ड से टूटा घिरा स्थान भी वहाँ था। यहाँ से ३० गज के अन्तर पर पूर्व तरफ सरोवर जैसा छिछला कुण्ड प्राचीन शिलाबण्डीय प्राकार से घिरा है। वहाँ के स्थानीय निवासी कहते हैं कि महाराज के राज्य काल में मन्दिर तथा भवन बनवाने के लिये यहाँ के शिलाखण्ड उठवा लिये गये थे। ग्राम के अनेक मकानों में यहाँ के अलंकृत पत्थरो का उपयोग किया गया है। चीनी पर्यटक ओ कुग ने इस विहार का वर्णन "ओमितियो वान" विहार नाम से किया है। विचार नाग तथा श्रीनगर के मध्य मन्दिरो तथा विहारों की श्रृंखला थी। उन्हें ज़ियारत तथा इमारतों में परिणत कर लिया गया है।