भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

तृतीय तरंग ४६५ अथेन्द्रदेवीभवनपेन्द्रदेव्यभिधा व्यधात् । विहारं सचतुःशालं स्तूपं भूपप्रियाऽपरा ॥ १३ ॥ १३. राजा की अपरा (दूसरी) इन्द्र देवी नाम्नी प्रिया ने इन्द्रदेवी भवन नामक चतुःशाल युक्त विहार तथा एक स्तूप बनवाया । अन्याभिः खादनासम्माप्रमुखाभिर्निजाख्यया । देवीभिस्तस्य महिता विहारा बहवः कृताः ॥ १४ ॥ १४. उसकी अन्य खादना १, सम्मा आदि प्रमुख देवियों ने अपने अपने नामों से अनेकों दिव्य विहारों को बनवाया ।


की आदेशना करते थे, और उन पर उचित प्राय- श्चित्त एवं दण्ड की व्यवस्था की जाती थी । वर्षा वास के नियम थे। उसके अनंतर प्रवारणा नामक पर्व होता था । एकत्रित भिक्षु संघ में एकमत, उद्ग्राहिका, शलाका ग्रहण, किंवा बहुमत से किसी निश्चय पर पहुँचा जाता था ।

ईसाई रहते थे । उनके ग्रन्थों के पढ़ने से पता चलता है कि दासी तथा बहु पत्नी रखने का उनमें आम रिवाज् था । कुराम शरीफ के पढ़ने से उस समय की सामाजिक स्थिति का जो ज्ञान प्राप्त होता है उससे प्रकट होता है कि अनेक विवाह करना तथा छोडना साधारण बातें थीं। दासी को पत्नीवत् रखना फैशन था । इन व्याप्त कुरीति को दूर करने के लिये पैगम्बर मुहम्मद साहब ने विवाहित स्त्री रखने की सीमा चार कर दी थी । हिन्दुओं में बहुपत्नी प्रथा वर्जित नहीं थी तथापि एक पत्नी से अधिक रखना अच्छा नहीं समझा जाता था ।

पादटिप्पणियाँ : १३ ( १ ) इन्द्रदेवी भवन विहार : इसका उल्लेख कल्हण ने पुनः भिक्षाचर के संघर्ष के सम्बन्ध में किया है। (रा. त. ८:११७२ ) यह स्थान श्रीनगर में होना चाहिए । कयूत अर्थात् काठिला जिसका उल्लेख कल्हण ने (राः तः ८:११६० ) में किया है उसके समीप इसकी स्थिति प्रतीत होती है। ( २ ) बहुपत्नी प्रथा : अब तक कश्मीर के राजा प्रतीत होता है एक पत्नी प्रथा का पालन करते थे । मेघवाहन पहला राजा है जिसकी ५ पत्नियों का उल्लेख कल्हण करता है । मेघवाहन के पश्चात् होने वाले राजाओं की बहुपत्नियों का उल्लेख मिलने लगता है। बहु पत्नी प्रथा मैं समझता हूँ मेघवाहन के समय कश्मीर में प्रचलित हुई और जड़ जमाती चली गयी । मैं समझता हूँ यह पश्चिम के शामी अर्थात् सेमैटिक जाति का प्रभाव था । मेघवाहन गान्धार तथा अफगानिस्तान में रहा था । अफगानिस्तान से सीरिया अर्थात् भूमध्य सागर तक यहूदी और ५९

पाठभेद : श्लोक संख्या १४ में 'सम्मा' का 'मम्मा', 'भस्मा' तथा 'महिता' का पाठभेद 'सहिता मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १४ ( १ ) खादना तथा सम्मा : इन दोनो विहारों के निश्चित स्थान का पता नही मिलता । खादन पार स्थान बारहमूला के ४ मिल वितस्ता के अधोभाग में दक्षिण तट पर इस स्थान की सम्भावना की जाती है । वितस्ता माहात्म्य में इस स्थान को 'खादना हार' कहा गया है। किन्तु सम्मा विहार कहाँ था ? इस पर गवेषण की आवश्यकता है । खादना तथा सम्मा शब्द अप्रचलित प्रतीत होते