राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 616, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४६७ पुनर्द्वित्रैर्दिनैस्तस्य निर्गतस्याग्रतस्ततः । अभवन्नभयार्थिन्यो द्वित्रा दिव्यप्रभाः स्त्रियः ॥ १८ ॥ १८. पुनः दो या तीन दिन पश्चात् जब वह ( राजा ) बाहर जा रहा था, सम्मुख अभयार्थिनी एवं दिव्य प्रभामयी दो या तीन स्त्रियां उपस्थित हो गयीं । ताः संश्रुतेप्सितास्तेन रुद्धाश्वेन कृपालुना । अभ्यभाषन्त सीमन्तपुञ्जिताञ्जलयो वचः ॥ १९ ॥ १९. कृपालु उस ( राजा ) ने अश्व रोक कर, उन्हें अभय दान दिया । अभीप्सित को सुनकर, वे शिर पर बद्धांजलि करके बोलीं— देव दिव्यप्रभावेन भुवने भवता धृते । अपरस्माद्भयं जातु कस्य स्यात्करुणानिधे ॥ २० ॥ २०. “देव ! करुणानिधे ! ! आपके दिव्य प्रभाव से भुवन को धारण करते, दूसरो से किसी को भय कैसे होगा ? ” तदानीं तोयदा भूत्वाच्छादयन्तो नभस्तलम् । अकाण्डकरकापातशङ्किभिः कार्पकैर्मृषा ॥ २१ ॥ २१. “उस समय नाग¹ मेघ होकर, नभस्थल को आच्छादित कर लिया, तब कृषकों को असमय में करकापात² की मिथ्या शंका हुई ।³ पाठभेद : श्लोक संख्या २० मे 'वेन' का पाठभेद 'वेण' मिलता है । श्लोक संख्या २१ मे 'भूत्वाच्छा' का 'भूत्वा छा' तथा 'कार्पकै' का पाठभेद 'कृपकै', और 'कार्षिकै' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २१ ( १ ) नाग : पृष्ठ ४३ से ६३ तक द्रष्टव्य है । वृष्टि के सम्बन्ध में नाग का एक अर्थ मेघ होता है । नागों का नीलमत पुराण के अनुसार वर्षा पर नियन्त्रण एवं अधिकार था । उनका तूफानों तथा हिमपात पर भी अधिकार था । ( नी० 351, 985-986 ) पुरातन भारतीय साहित्य में जल पर नागों का नियन्त्रण था इससे सम्बन्धित अनेक आख्यान तथा प्रसंग मिलते हैं । 'सर्पबलि' पर्व वर्षा ऋतु के प्रथम मास से आरम्भ होकर अन्तिम मास तक चलता है। महा० आदि० २१: ६; भविष्यत् पुराण: २२; ( २ ) करका : उपल किंवा ओला वृष्टि को करकापात कहते हैं। तुहिन तथा करकापात में अन्तर है । तुहिनपात बर्फ गिरने को कहते हैं । तुहिनपात अस्पष्ट शीत काल में होता है । करका- पात किसी भी ऋतु में हो सकता है। यह भारत के किसी भाग में वर्षा और अन्धड़ के साथ हो सकता है। परन्तु तुहिनपात केवल शीत कटिबन्ध और हिमालय में तापमान की न्यूनता जहाँ होती है वहीं होता है । ( ३ ) श्री स्टीन तथा श्री रनजीत सीताराम पण्डित तथा प्रायः सभी अनुवादकर्ताओं ने चार श्लोकों ( २१-२४ ) का अनुवाद एक साथ ही किया है । कल्हण इन्हें कुलकम् में नही रखा है किन्तु कुछ पाण्डुलिपि में इसके लिये 'चवरूलक' शब्द का प्रयोग किया गया है। श्री स्टीन द्वारा वीना की राजकीय