राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 618, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४६९ अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः । स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥ २८. उसका यह विजयोद्यम जिन१ ( बुद्ध ) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा । प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् । अर्णसां पत्युरभ्यर्णमगापावर्णवजितः ॥ २९ ॥ २९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित कर, अर्णस्पति१ ( सागर ) के समीप पहुँचा । तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः । युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥ ३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे । द्वीपान्तर ( अन्य द्वीप पर ) आक्रमण करने के लिये क्षण भर ( उसने ) मनमें विचार किया । अथ वेलावनोपान्ताच्चेनार्ताक्रन्दितध्वनिः । मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥ ३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन के राज्य में भी यह ( मैं ) मारा गया ।" नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध में धीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र प्रयास—।' पाठभेद : श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभून'; 'जिन- स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद 'स्वदीय' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ( १ ) जिन : अनेक लेखको ने जिन और जैन शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरो को विजेता किंवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरूनी ने १:२४३ में इसी मत का प्रतिपादन किया है । जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त० १:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८: २२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ठ १३६ हैं । २९( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र है । नदियो का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ पालन किया है । पाठभेद : श्लोक सख्या ३० में 'सैनिक:' का 'सैनिकै:' तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है । श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पाग्ते ते' तथा 'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।