भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 619

४६८ राजतरंगिणी पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः । नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥ २२. "पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये । तैऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् । श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥ २३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब (उसे) सुनकर, आप क्रोध से -'बाँध लो-बोले । तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिता । प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥ २४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना, हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।" तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः । सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥ २५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोज्ज्वल आनन राजा बोले-"वे सब नाग बन्धन मुक्त कर दिये जाँय ।" तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः । प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥ २६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये । अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये । स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥ दिग्विजय' २७. निर्व्याज धर्माचारी वह (नृप) राजाओं की हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।" पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियां : है । मैने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोको २४ (१) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चवक्त- का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है। अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद : अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्मा' पाठभेद : मिलता है। श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियां : तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि तं' मिलता है। २७ (१) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास) · पृष्ठ 619, कुल 984 में से · BharatKosha