भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ४३५ सदाचारसुधास्वादे के भवन्तो वनौकसः । जाह्नवीमज्जनप्रीतिं न जानन्ति मरुस्थिताः ॥ ४७ ॥ ४७. 'सदाचार रूपी सुधा का स्वाद आप वनवासी कैसे जान सकते हैं ? मरुस्थल निवासी गंगा स्नान ( मज्जन ) के आनन्द को नहीं जानते । ध्रुवापायेन कायेन क्रीणतः कीर्तिमव्ययाम् । ममाभीष्टं प्रमाष्टुं ते मूढ रूढोऽयमाग्रहः ॥ ४८ ॥ ४८. 'हे मूढ ! अवश्यमेव नश्वर इस शरीर से अविनाश्वर कीर्ति का क्रय करते, मेरे अभीष्ट के नाश हेतु, तुम्हारा यह दुराग्रह ( क्यों ? ) बढ़ गया है । मा वोचः किंचिदपरं प्रहर्तुं चेद्घृणा तव । न किं निजः कृपाणो मे शक्तः प्रक्रान्तसिद्धये ॥ ४६ ॥ ४९. 'और कुछ मत कहो। यदि प्रहार करने में तुम्हें दया ( आती ) है, तो क्या मेरा कृपाण प्रस्तुत कार्य सिद्धि में समर्थ नहीं है ?' इत्युक्त्वा स स्वयं देहमुपहर्तुं समुद्यतः । खण्डनाय स्वमुण्डस्य विकोशं शस्त्रमादधे ॥ ५० ॥ ५०. ऐसा कहकर, देह को उपहार करने के लिये उद्यत वह स्वयं अपने मुण्ड के खण्डन हेतु कोश से शस्त्र निकालकूर, धारण कर लिया । ततः प्रहर्तुकामस्य तस्य द्युकुसुमैः शिरः । करश्च दिव्यवपुषा रुद्धः केनाप्यजायत ॥ ५१ ॥ ५१. प्रहारोत्सुक उनका शिर आकाश से गिरे पुष्पों से आच्छादित हो गया, और किसी दिव्य शरीरी ने हाथ को रुद्ध कर दिया ।१ अथापश्यत्तथाभूतः कश्चिद्दिव्याकृतिं पुरः । न चण्डिकां न तं वध्यं न किरातं न दारकम् ॥ ५२ ॥ ५२. तथाभूत उसने सम्मुख कोई दिव्याकृति देखी । ( किन्तु ) चण्डिका, किरात, दारक ( शिशु ) एवं वह वध्य दिखायी नहीं दिया । पादटिप्पणियाँ : ४०(१) राजतरंगिणी मृत्तिका ४७वाँ श्लोक है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४८ में 'भीष्टं' का 'भीष्टा' तथा 'रूढो' का पाठभेद 'मूढो' मिलता है । श्लोक संख्या ५० में 'दधे' का पाठभेद 'ददे' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५१ ( १ ) हाथ रुद्ध करना : बाइबिल में वर्णन आता है कि अब्राहम अपने पुत्र को बलि भगवान् पर चढ़ा रहा था। उसने प्रहार के लिये हाथ उठाया था कि ईश्वरीय शक्ति ने उसका हाथ रोक लिया । इस प्रकार के चमत्कारों से विश्व का पूरा साहित्य भरा पड़ा है । पाठभेद : श्लोक संख्या ५२ में 'पुरः' का पाठभेद 'पुनः' मिलता है ।