राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७४ राजतरंगिणी त्रैलोक्यजीवितेनापि यो रक्ष्यो हेलयैव तम् । पृथिवीभोगसुभगं कथं कायमुपेक्षसे ॥ ४३ ॥ ४३. "त्रैलोक्य के प्राण से भी जो रक्षणीय है; पृथ्वी के उपभोग करने योग्य उस काया की आप योंही क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ? न मानं न यशो नार्थान्न दारान्न च बान्धवान् । न धर्मं न सुतान्नृपा रक्षन्ति प्राणतृष्णया¹ ॥ ४४ ॥ ४४. "नृप गण प्राण रक्षा हेतु मान, यश, अर्थ, दारा, बन्धु, धर्म एवं पुत्र की भी रक्षा नहीं करते । तत्प्रसीद प्रजानाथ मा वध्येऽस्मिन्कृपां कृथाः । शिशुश्चैष प्रजाश्चैता जीवन्तु त्वयि जीवति ॥ ४५ ॥ ४५. "प्रजानाथ ! प्रसन्न हों । उस वध्य पर कृपा न कीजिये । आपके जीवित रहने पर शिशु और प्रजा जीवित रहेगी ।" उपाजिहीर्षुरात्मानं दन्तद्योतार्घडम्बरैः । अर्चयन्निव चामुण्डामथोवाच स पार्थिवः ॥ ४६ ॥ ४६. "स्वयं उपहार बनने के लिये उत्सुक नृप ने दन्त प्रभा रूपी अर्घ पुञ्ज से मानो चामुण्डा¹ की अर्चना करते हुए कहा- पाठभेद : श्लोक संख्या ४३ में 'काय, का पाठभेद 'कार' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४४ (१) राजतरंगिणी मुक्ति संग्रह का ५६वाँ श्लोक है । ४६ (१) चामुण्डा : स्कन्द पुराण (५:१:३८) में उल्लेख मिलता है । शुंभ तथा निशुंभ ने देवी का वध करने के लिये चण्ड एवं मुण्ड नामक दो राक्षसों को भेजा था । देवी ने उनका वध किया । चण्ड एव मुण्ड के वध के पश्चात् देवी ने शुंभ एवं निशुंभ का वध किया । अतएव देवी का नाम चामुण्डा पड़ा । रक्तबीज एक असुर था । वह शुम्भ निशुम्भ के पक्ष का योद्धा था । रुद्र के वर प्रभाव से उसका एक बूंद रक्त पृथ्वी पर पड़ते रक्त बूंद के बीज स्वरूप एक असुर उत्पन्न हो जाता था । चामुण्डा बूंदों के गिरते ही रक्त चाट जाती थी । असुर उत्पन्न होने की नौबत ही नहीं आती थी । चामुण्डा ने रक्तबीज का नाश किया । (दे० भा० ५:२७-२९, मार्क० ८५, शिव० उमा ४७ ) चामुण्डा के सम्मुख नर बलि का वर्णन भवभूति ने 'मालती माधव' नाटक में किया है । नाटक के पंचम अंक में नायक ने नायिका की रक्षा करते समय अघोर घंट पुरोहित का वध किया था ।-