भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ४७३ उपहारीकरोम्येष चण्डिकायै स्वविग्रहम् । मयि प्रहर निश्शङ्कं जीवत्वेतज्जनद्वयम् ॥ ४० ॥ ४०. "मैं अपने शरीर को चण्डिका के लिये उपहार¹ में दे रहा हूँ। तुम मुझ पर निःशंक होकर प्रहार करो। वे दोनों जन जीवित होवें।" तदद्भुतमहासत्त्वचित्तेरुदात्यविस्मितः । उन्मिषद्रोमहर्षस्तं ततः स शबरोऽभ्यधात् ॥ ४१ ॥ ४१. तदनन्तर यह शबर उस महासत्त्व के चित्त की उदात्तता से विस्मित एवं रोमांचित हो गया और उनसे बोला— अतिकारुण्यनिपतस्तवायं पृथिवीपते । कश्चिन्मतिविपर्यांसप्रकारो हृदि रोहति ॥ ४२ ॥ ४२. पृथिवीपते ! आपके हृदय में अति कारुण्य के कारण किसी प्रकार का मति विपर्यय (बुद्धि भ्रम) उत्पन्न हो गया है। वाल्मीकि रामायण में किरातों की नारियों के जूड़ा का वर्णन है। उनके वर्ण की सुवर्ण से उपमा दी गयी है। (किष्किन्धा काण्ड : ४०;२७) महाभारत कर्ण पर्व (७३:१९-२०) में उन्हें बर्बर अनार्य जाति तुषार, यवन, खस, आंध्रक, पुलिन्द, म्लेच्छों के साथ रखा गया है। उन्हें पर्वतीय जाति कहा गया है। द्रोण पर्व (४.७) में उन्हें हिमालय पर्वत में निभृत कहा गया है। सभा पर्व (५२:१-१२) में किरात लोग युधिष्ठिर को भेंट लेकर आते हुए देखे जाते हैं। उन्हें क्रूरकर्मी कहा गया है। फल-मूलभोजी, चर्मवस्त्रधारी तथा भयंकर शस्त्र चलाने वाला कहा गया है। कालान्तर में किरात लोग समस्त भारत में फैल गये थे। खारवेल के अभिलेख में चीन तथा किरात दोनों का एक साथ उल्लेख किया गया है। सांची के एक स्तूप पर एक किरात भिक्षु के दान का उल्लेख अंकित है। नागार्जुनोय कोंड के एक अभिलेख में किरातों का उल्लेख है। ६० महाभारत के उपायन पर्व में किरात के चन्दन लेकर भेंट में आने का उल्लेख है। अतएव किरात दक्षिण में थे। ललितादित्य का उनसे समुद्रतट पर भेंट होना वास्तविकता की ओर संकेत करता है। मनु ने किरातों की गणना व्रात्य क्षत्रियों में की है। (मनु० १०:४३-४४) पाठभेद : श्लोक संख्या ४० में 'स्ववि' का पाठभेद 'सुवि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४० (१) उपहार : कल्हण ने उपहार शब्द का प्रयोग यहाँ किया है। बलि तथा उपहार में स्पष्ट अन्तर कल्हण ने किया है। बलि किसी भी व्यक्ति अथवा पशु की उसकी इच्छा अथवा अनिच्छा होने पर भी जबर्दस्ती बलिकर्त्ता अपने प्रतिनिधि रूप में कर देता था। परन्तु उपहार से यह ध्वनि नहीं निकलती। अपना उपहार नैवेद्य अथवा भोग लगाने की तरह देवता को चढ़ाया जाता है।